जेपीएससी परीक्षा: प्रूफ रीडिंग तक नहीं

झारखंड राज्य की सबसे बड़ी परीक्षा में प्रश्नपत्र और आंसर-की में वर्तनी की बीसियों अटपटी गलतियों ने झारखंड लोक सेवा आयोग को शर्मसार किया

रांची में जेपीएससी का दफ्तर

धनबाद जिले के निचितपुर गांव के रहने वाले राकेश कुमार 19 अप्रैल को गिरिडीह कॉलेज सेंटर पर झारखंड पब्लिक सर्विस कमिशन की तरफ से आयोजित सहायक वन संरक्षक मुख्य परीक्षा देने पहुंचे. प्रश्नपत्र देखते ही वे उलझन में पड़ गए. सामान्य अध्ययन के दूसरे पेपर में सर्वोच्च न्यायालय जैसे संवैधानिक शब्द को 'सर्वोच न्यायातक' लिखा पाया.

थोड़ी देर उलझन में रहने के बाद उन्होंने दूसरे प्रश्नों की तरफ ध्यान लगाया. यहां उन्हें 'टिप्पणी' की जगह 'रिप्पणी' लिखा मिला. अगले प्रश्न में उन्हें झारखंड के अमर शहीद सिदो-कान्हू का नाम 'सिडो-कान्हु' लिखा मिला. राज्य की सबसे बड़ी परीक्षा में लापरवाही का आलम यह है कि प्रश्नपत्र और जारी किए गए उत्तर में ऐसी एक नहीं, बल्कि 75 से ज्यादा भाषाई अशुद्धियां मिली. 

चौदहवें जेपीएससी की इस परीक्षा में 'राष्ट्रीय' को 'रार्ष्ट्रीय' और 'ऐतिहासिक' को 'इतिहासिक' बना दिया गया. इसके अलावा 'प्रश्न' को 'प्रशन', 'पुस्तक' को 'पुस्तख', 'टिप्पणी' को 'रिप्पणी' और 'महत्वपूर्ण' को 'महत्वपूर्न' लिखा गया. इन त्रुटियों ने न सिर्फ भाषा की शुद्धता पर सवाल उठाए, बल्कि कई सवालों का आशय भी बदल दिया, जिससे परीक्षार्थियों में भ्रम की स्थिति बनी रही.

सबसे गंभीर बात यह रही कि प्रश्नपत्र में झारखंड के गौरव और अस्मिता से जुड़े नामों को भी गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया. अमर शहीद सिदो-कान्हू का नाम 'सिडो-कान्हु' छापा गया, जबकि 'आंदोलन' को 'आंदोलना' और 'सांस्कृतिक' को 'सांस्क्रृतिक' लिखा गया. एक तो 2015 से 2022 तक जेपीएससी की परीक्षाएं ही नहीं हुईं, अब जब बीते तीन साल से हो रही हैं तो प्रश्नपत्र में गलतियों/अशुद्धियों की सीमा नहीं.

मामला यहीं नहीं रुका. 19 अप्रैल को झारखंड संयुक्त असैनिक सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025 के लिए आयोग ने 20 अप्रैल को जो मॉडल आंसर-की जारी की, वह सही उत्तरों की सूची नहीं, बल्कि गलतियों का पहाड़ था. जिन सवालों के जवाब कक्षा आठवीं के बच्चों को जुबानी याद हैं, वहां भी जेपीएससी के विशेषज्ञ औंधे मुंह गिरे. यहां भी एक नहीं कुल 75 जवाब गलत थे. सीओपी30 सम्मेलन: जेपीएससी की आंसर-की के अनुसार यह अमेरिका में हुआ, जबकि यह ब्राजील में आयोजित हुआ था.

मानवाधिकार दिवस पूरी दुनिया 10 दिसंबर को मनाती है, लेकिन जेपीएससी की दुनिया में यह 8 मार्च को मनाया जाता है. 2023 का मणिपुर संकट मुख्य रूप से किन दो समुदायों के बीच झड़पों से संबंधित था? सही जवाब है मैतेई और कुकी समुदाय, जबकि जेपीएससी के अनुसार मैतेई और गारो के बीच हिंसक झड़प हुई. हालांकि चार घंटे बाद सही आंसर-की जरूर अपलोड कर दी गई.

लापरवाही यहीं खत्म नहीं होती. जेपीएससी की ओर से ही 26 अप्रैल को आयोजित झारखंड पात्रता परीक्षा (जेट) में भी अव्यवस्था का माहौल रहा. बोकारो जिले के एक परीक्षा केंद्र पर शिक्षा विषय के 32 प्रश्नपत्र कम पड़ गए. वहीं रांची में बांटे गए ओड़िया विषय के प्रश्नपत्र पढ़ने योग्य नहीं थे, तो एक सेंटर में 120 प्रश्नपत्र कम मिले. इस वजह से आयोग ने दोनों विषयों की परीक्षा रद्द कर दी है. नागपुरी विषय के प्रश्नपत्र में भी कई अशुद्धियां थीं.

प्रश्नपत्र में डॉ. गिरधारी राम गौझू की जगह डॉ. गिरधारी सय गांझ लिखा गया. इसी तरह अशोक अकेला को शोक अकेला लिखा गया है. एक प्रश्न में 'भइर' को 'महर' लिखा गया. चुआड विद्रोह की जगह चुहाड़ विद्रोह लिख दिया गया. हरूवाय को हस्वाय लिखा गया है. एक प्रश्न में 'सगे' को 'संघे' लिखा गया है. राज्य के छह जिलों रांची, हजारीबाग, जमशेदपुर, धनबाद, देवघर और बोकारो में 430 केंद्रों पर लगभग डेढ़ लाख अभ्यर्थी परीक्षा में शामिल हुए, लेकिन कई केंद्रों पर प्रश्नपत्रों की कमी और प्रबंधन की लापरवाही ने पूरी व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है.  

छात्र समीर उरांव कहते हैं, ''जब हम परीक्षा देने बैठे, प्रश्नपत्र देखने के बाद लगा कि हम ये तो पढ़े ही नहीं. लगता है मेरी तैयारी ही कमजोर थी, इतना सोचने के बाद जिन प्रश्नों में उलझा वहां तुक्का मार कर निकल आए.'' 2007 के बाद यह दूसरी बार जेट परीक्षा आयोजित की गई, लेकिन इतने लंबे अंतराल के बावजूद आयोग की तैयारी अधूरी नजर आई.

अभ्यर्थियों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि 17 साल बाद आयोजित इस महत्वपूर्ण परीक्षा में भी ऐसी लापरवाही अस्वीकार्य है. परीक्षा रद्द होने से सैकड़ों अभ्यर्थियों पर मानसिक और आर्थिक बोझ बढ़ गया है. उन्हें दोबारा परीक्षा देने के लिए अतिरिक्त समय और संसाधन खर्च करने होंगे. साल 2007 में आयोजित पहली जेट परीक्षा भी विवादों में रही थी, जिसकी जांच आज तक सीबीआइ कर रही है.

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रश्नपत्र तैयार होने के बाद उसकी मॉडरेशन यानी जांच प्रक्रिया अनिवार्य होती है. अगर विषय विशेषज्ञों ने प्रश्नपत्र को एक बार भी ध्यान से पढ़ा होता, तो इतनी बड़ी चूक संभव नहीं थी. जानकारों के मुताबिक, यह लापरवाही सीधे तौर पर आयोग की कार्यप्रणाली और जिम्मेदारी पर सवाल खड़े करती है. वर्षों से इस परीक्षा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को अब इस गलती का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. यह केवल टाइपिंग की गलती नहीं, बल्कि राज्य के इतिहास और जनभावनाओं के प्रति संवेदनहीनता को दर्शाता है.

उनका यह भी कहना है कि जिस साख की चिंता जेपीएससी को होनी चाहिए, उसकी जगह समाज और छात्र चिंता कर रहे हैं. यह गलती हर बार दुहराई जाती है क्योंकि इसे ठीक करने का आज तक कोई मैकेनिज्म नहीं बनाया गया. किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया. प्रश्नपत्र भले ही कोई निजी एजेंसी छापती हो, लेकिन साख तो जेपीएससी की खराब होती है.

आयोग की लापरवाही
पूरी स्थिति पर जेपीएससी के चेयरमैन और राज्य के पूर्व मुख्य सचिव एल ख्यांगते ने अभी तक न तो कोई प्रतिक्रिया दी है और न ही मीडिया और छात्रों के सवालों का कोई जवाब दिया है. हालांकि राज्य के पेयजल और स्वच्छता मंत्री योगेंद्र प्रसाद पूरी स्थिति पर चिंता जाहिर करते हैं. उनके शब्दों में, ''यह जेपीएससी की लापरवाही है. जिलाधिकारियों से मामले की रिपोर्ट लेकर सरकार के संज्ञान में दिया जाएगा. मामला गंभीर है.''

मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने एक बार फिर हेमंत सोरेन सरकार की कार्यप्रणाली को निशाने पर लिया है. पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी कहते हैं, ''झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है. यह दर्शाता है कि परीक्षा आयोजन को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा. हर परीक्षा में नई गड़बड़ियां सामने आना चिंताजनक प्रवृत्ति बन चुकी है.''

वे यह भी कहते हैं, ''जेपीएससी के अयोग्य और नाकारा चेयरमैन को हटा देना चाहिए. ऐसे बेईमान और नाकारा लोगों ने जेपीएससी को लूट का अड्डा बनाकर रख दिया है. इनका मुख्य काम परीक्षा संचालन के आउटसोर्सिंग से लेकर सारे ठेके-पट्टे,  सप्लाइ में कमिशन खाने से और नौकरी तक की बोली लगाकर पहले से बेच देने का बन के रह गया है.'' वहीं कांग्रेस भी बाबूलाल की बात से सहमति जताती है.

पार्टी के प्रदेश महासचिव आलोक दुबे का कहना है, ''राज्य में बार-बार परीक्षाओं का स्थगित होना, प्रश्नपत्र लीक होने की अफवाहों का फैलना और परीक्षा केंद्रों पर अव्यवस्था की स्थिति बनना बेहद चिंताजनक है. इससे न केवल आयोग, बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे है. अगर अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्हें पद छोड़ देना चाहिए.''

यह कोई पहली बार नहीं जब ऐसी गलतियों के कारण जेपीएससी विवादों में रहा है. पूरे 26 साल में कुल 9 बार जेपीएससी ने परीक्षाएं आयोजित की हैं. इसमें पहली परीक्षा साल 2003 में आयोजित हुई और विवाद तथा सीबीआइ जांच की शुरुआत भी वहीं से हो गई थी. दूसरी परीक्षा पर भी सीबीआइ की जांच चली. हालांकि अब दोनों मामलों में सीबीआइ ने क्लोजर रिपोर्ट जमा कर दी है. इस बीच छात्रों को कभी परीक्षा के लिए सालों इंतजार करना पड़ा तो कभी नतीजों के लिए. पहले तैयारी, फिर परीक्षा के लिए आंदोलन, उसके बाद गिरफ्तारी और कोर्ट कचहरी का चक्कर. रगड़ते-घिसते फिर परिणाम के लिए आंदोलन. जब परिणाम आए तो उस पर सवाल, जेपीएससी की यही नियति बन गई है. 

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