दिल्ली दौड़ेगी बिजली पर
दिल्ली की ईवी नीति 2.0 के मसौदे में दुपहिया को पूरी तरह पेट्रोल से इलेक्ट्रिक पर शिफ्ट किए जाने का प्रस्ताव. साथ ही व्यापक स्तर पर विद्युतीकरण पर जोर. लेकिन चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर की खस्ता हालत इस महत्वाकांक्षी कदम का रास्ता रोके खड़ी.

दिल्ली की सड़कें अपनी क्षमता से ज्यादा वाहन-बोझ पहले से ही झेल रही हैं. राष्ट्रीय राजधानी में 87.6 लाख चलायमान रजिस्टर्ड वाहन हैं—यानी हर 1,000 निवासियों पर 500 से ज्यादा—और इस आंकड़े में आस-पास के जिलों से रोजाना दिल्ली आने वाले वाहनों की संख्या शामिल नहीं है.
सर्दियों में वाहनों की इस भीड़ का असर हवा में साफ नजर आता है: वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के प्रदूषण में वाहनों के धुएं का योगदान 23 प्रतिशत है और यह प्रदूषण का इकलौता सबसे बड़ा स्रोत है.
यही वह मुख्य मसला है जो दिल्ली सरकार की 2026-2030 की इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) नीति 2.0 के मसौदे के केंद्र में है.
अभी तो यह बदलाव शुरू हुआ ही है. छह साल पहले, अगस्त 2020 में पहली ईवी नीति आने के बाद से दिल्ली में 4,70,104 ईवी रजिस्टर हुए हैं—जो कुल गाड़ियों का 5 फीसद से थोड़ा ही ज्यादा हैं. मसौदा नीति का मकसद प्रतिबंधों और टाइम-बाउंड प्रोत्साहनों के जरिए इस हिस्सेदारी को तेजी से बढ़ाना है.
अगर यह पॉलिसी इसी रूप में लागू हो गई तो 1 अप्रैल, 2028 से दिल्ली में पेट्रोल वाले दोपहिया का रजिस्ट्रेशन नहीं होगा. कमर्शियल ऑपरेटरों के पास कम समय है: एग्रीगेटर भी बीएस-6 दुपहिया वाहनों को सिर्फ 2026 के आखिर तक ही अपने बेड़े में शामिल कर सकते हैं, लेकिन उन्हीं को जो भारत के सबसे सख्त उत्सर्जन मानकों का पालन करते हैं.
(एग्रीगेटरों पर इस साल 1 जनवरी से किसी भी नई पेट्रोल/डीजल कार या माल ढुलाई के छोटे वाहन शामिल करने पर रोक पहले से ही लगी हुई है.) इसी तरह 1 जनवरी, 2027 से उन्हीं तिपहियों के नए रजिस्ट्रेशन होंगे जो इलेक्ट्रिक होंगे. पॉलिसी बनाने से जुड़े एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी कहते हैं, ''हमारा मकसद प्रदूषण से लड़ना और लोगों को परिवहन के ज्यादा साफ-सुथरे तरीके अपनाने के लिए बढ़ावा देना है. हमें यकीन है कि पॉलिसी में शामिल प्रोत्साहन प्रस्ताव लोगों को सहजता से इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने में मदद करेंगे.’’
इलेक्ट्रिक दुपहिया खरीदने वाले लोग पहले साल में 30,000 रुपए तक की सब्सिडी पा सकते हैं, जो दूसरे साल में घटकर 20,000 रुपए और तीसरे साल में 10,000 रुपए रह जाएगी. इलेक्ट्रिक ऑटो और माल ढुलाई के छोटे वाहनों को ज्यादा मदद मिलेगी (देखें: समझिए प्रस्तावित ईवी पॉलिसी 2.0 को). एक फायदा स्क्रैपेज इंसेंटिव का है: अगर आप दिल्ली में रजिस्टर्ड बीएस-4 या उससे पुराने वाहन को किसी अधिकृत सेंटर पर जमा करके छह महीने के भीतर कोई ईवी खरीदते हैं, तो आपको अतिरिक्त राशि मिलेगी. कुछ मामलों को छोड़ दें तो रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस नहीं लगेगी.
सरकारी विभागों को, चाहे उनके वाहन किराए के हों या लीज पर, नोटिफिकेशन जारी होने के छह महीने के अंदर ईवी अपनाना होगा. नीति के बाद से दिल्ली परिवहन निगम में शामिल सभी नई बसें इलेक्ट्रिक ही होंगी. स्कूलों को भी अपने वाहनों के बेड़े को धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक में बदलना होगा.
एस ऐंड पी ग्लोबल मोबिलिटी में लाइट व्हीकल प्रोडक्शन फोरकास्ट (भारतीय उपमहाद्वीप) के एसोसिएट डायरेक्टर गौरव वंगाल कहते हैं, ''अगर भारत को 2070 तक कार्बन का शून्य लक्ष्य हासिल करना है, तो दिल्ली को इसकी अगुआई करनी होगी और उसे कम से कम 2050 तक यह लक्ष्य पा लेना होगा. इसके लिए सरकार को 2035 तक दिल्ली में सिर्फ ईवी की राह बनाने में लग जाना चाहिए.’’
इस बदलाव के केंद्र में हैं दुपहिया वाहन. इनकी संख्या 59.3 लाख है और ये दिल्ली के कुल सक्रिय वाहनों का 67 फीसद हैं. इनका इस्तेमाल रोजाना की आवाजाही से डिलिवरी पहुंचाने तक के लिए होता है. इसी वजह से हवा की स्वच्छ गुणवत्ता के लिए यह सेगमेंट सबसे तेज और आसान तरीका है. गाड़ी कबाड़ में देने पर प्रोत्साहन यानी स्क्रैपेज इंसेंटिव का मकसद महज स्वच्छ वाहन बढ़ाना नहीं बल्कि प्रदूषण की पुरानी समस्या दूर करना है. फिलहाल, दिल्ली में पेट्रोल वाहनों को 15 साल तक और डीजल को 10 साल तक चलने की इजाजत है. इसके बाद उनका पंजीकरण खत्म करवाना जरूरी होता है.
बदलाव की सीमाएं
खरीदारों के लिए यह बदलाव अक्सर एक ही बात पर निर्भर करता है: चार्जिंग. इलेक्ट्रिक दुपहिया के पक्ष में मजबूत तर्क हैं, लेकिन यह शुरुआती कीमत से कहीं ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि चार्जिंग भरोसेमंद, आसानी से उपलब्ध और तेज है या नहीं. इस मामले में पॉलिसी के प्रस्ताव उस बड़े बदलाव के मुकाबले कमजोर लगते हैं, जिसे वह करना चाहती है.
दिल्ली ट्रांसको लिमिटेड को सार्वजनिक चार्जिंग और बैटरी-अदला बदली सुविधा की योजना बनाने और उसे लागू करने का काम सौंपा गया है. साथ ही चार्जिंग स्टेशन चलाने वालों के लिए एक ही जगह सभी तरह की मंजूरियों का प्रस्ताव भी किया गया है. ईवी डीलरों को कम से कम एक सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन लगाना होगा, जिसमें दुपहिया और तिपहिया के लिए कम से कम तीन चार्जिंग पॉइंट और कारों के लिए दो पॉइंट जरूरी हैं. लेकिन दिल्ली की ईवी पॉलिसी के मसौदे में इसके लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है.
दिल्ली में लगभग 3,100 ईवी चार्जिंग स्टेशन हैं—जहां कुल मिलाकर 10,000 से भी कम चार्जिंग पॉइंट हैं—और करीब 893 बैटरी स्वैपिंग स्टेशन हैं. 18,000 चार्जिंग पॉइंट के शुरुआती लक्ष्य के मुकाबले यह कम से कम 8,000 पॉइंट की कमी है. इसके अलावा, उपलब्धता और विश्वसनीयता भी एक जैसी नहीं है. सीआर पार्क के निवासी प्रदीप जालान, जो एक महंगी बीवाइडी इलेक्ट्रिक कार चलाते हैं, बताते हैं कि उन्हें ज्यादा मुश्किल नहीं होती. ''ज्यादातर चार्जिंग रात में घर पर और बाकी ऑफिस में हो जाती है. अगर कभी मुझे पब्लिक चार्जर की जरूरत पड़ती भी है, तो दिल्ली में काफी चार्जर उपलब्ध हैं.’’
लेकिन दूसरों को कमियां ज्यादा नजर आती हैं. संगम विहार के रहने वाले राधेश्याम प्रसाद कहते हैं, ''चार्जर बहुत ही कम हैं और जब आपको उनकी जरूरत होती है, तो उनमें से कई काम नहीं करते.’’ प्रसाद एक फूड एग्रीगेटर के डिलिवरी एजेंट हैं और एक राइड-शेयर प्लेटफॉर्म के लिए अपनी इलेक्ट्रिक बाइक भी चलाते हैं. प्रसाद को 'दिन में कई बार’ चार्जर की जरूरत पड़ती है और उन्हें अक्सर इस बात की चिंता रहती है कि कहीं वे ''किसी बिना चार्जर वाले इलाके में फंस न जाएं.’’
बुनियादी सुविधाओं की बात छोड़ भी दें तो यह सवाल बरकरार है कि इलेक्ट्रिफिकेशन से क्या हल हो सकता है—और क्या नहीं. आइआइटी दिल्ली में टीआरआइपीपी-ट्रिप (ट्रांसपोर्टेशन रिसर्च ऐंड इंज्युरी प्रिवेंशन सेंटर) की चेयर प्रोफसर गीतम तिवारी कहती हैं, ''हालांकि स्थानीय प्रदूषण कम करने के नजरिए से ईवी बहुत अच्छे हैं, लेकिन ज्यादा निजी वाहन—खासकर कारें—होने का मतलब है कि भीड़भाड़.
इनसे स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी दूर नहीं हो पातीं. और बड़े फलक पर बात करें तो जब तक हम स्वच्छ विद्युत का इस्तेमाल शुरू नहीं करते, भारत में ईवी ज्यादा होंगी तो कोयले से पैदा बिजली में इजाफा होगा.’’ इससे भी ज्यादा बुनियादी बात यह है कि इलेक्ट्रिफिकेशन सिर्फ यह बदलता है कि वाहन किससे चलाया जाना है, यह नहीं कि सड़क पर कितने वाहन हैं. हालांकि इस नीति में बसों को इलेक्ट्रिक बनाने के कदम शामिल हैं, लेकिन नीति यात्रियों को निजी वाहनों से दूर नहीं करती. तिवारी का निष्कर्ष एकदम साफ है: ''कारों को अपनाना लंबे समय का हल नहीं है. सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल शुरू करना ही असली समाधान है.’’
दूसरे राज्यों की तुलना में, दिल्ली का तरीका निर्देश जैसा ज्यादा है, जिसमें अपनाने का कोई साफ लक्ष्य तय किए बिना धीरे-धीरे प्रतिबंध लगाने पर निर्भरता है. महाराष्ट्र की 2025-2030 की नीति का लक्ष्य 2030 तक ईवी की पैठ 30 फीसद बढ़ाना है और इसमें इंटरनल कम्बशन इंजन (आइसीई) वाली नई गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन पर रोक के बजाए इंसेंटिव पर ज्यादा जोर दिया गया है. कर्नाटक ने रोड टैक्स में सबसे पहले छूट दी थी और उसने अप्रैल 2026 से ईवी पर एक ग्रेडेड लाइफटाइम टैक्स यानी वाहन की कीमत के आधार पर टैक्स लागू किया है.
नॉर्वे, जिसे अक्सर बेंचमार्क माना जाता है और जिसने प्रतिबंधों का रास्ता नहीं चुना है, में वाहन अपनाने की दर बढऩे के साथ ही प्रोत्साहनों को कम किया जा रहा है. इसके उलट, दिल्ली की योजना धीरे-धीरे पेट्रोल ऑप्शन हटाने की है और उसे उम्मीद है कि बाजार इस हिसाब से ढल जाएगा. इस तरीके से बदलाव तेज हो सकता है, लेकिन यह बेढंगा होगा—और इस प्रस्ताव को मसौदा नीति पर जारी बहस के दौरान कसौटी पर कसा जाएगा.