राजस्थान में 'कागजी वारिसों' का राज
बंटवारे और जंग के बाद भारत से पाकिस्तान गए लोगों की जमीन को फर्जी कागजों के सहारे भूमाफिया ने हथिया लिया, बेसुध सरकार को कार्रवाई के लिए किसका इंतजार है?

राजस्थान की सरहद पर ऐसी जमीनों की कहानी छिपी है जिनके असली मालिक सरहद पार चले गए और यहां 'कागजी वारिस' पैदा हो गए. यह खेल उन जमीनों पर कब्जा करने का है जिनके असली मालिक 1947 के भारत-पाक विभाजन और 1965 तथा 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद पाकिस्तान चले गए थे. पीछे बची जमीन पर प्रशासनिक ढिलाई, कमजोर रिकॉर्ड और भूमाफिया के गठजोड़ ने ऐसा तंत्र खड़ा कर दिया जो 'फर्जी वारिस' पैदा करते रहे.
राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार, बीकानेर के पूगल तहसील के जालवाली गांव के रहीम बख्श 1955 में अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए थे. रहीम बख्श की नूरसर गांव में 140 बीघा 15 बिस्वा जमीन थी. यह जमीन वर्षों तक सरकारी रिकॉर्ड में शत्रु संपत्ति के नाम से दर्ज रही, मगर 3 अक्तूबर, 2001 को आरोपियों ने रहीम बख्श का एक फर्जी मृत्यु प्रमाण-पत्र बनवाया जिसमें उनकी मृत्यु 27 जुलाई, 1976 दिखाई गई.
इसके बाद जन्नत खातून नाम की महिला को रहीम की पोती घोषित कर जमीन को खुर्द-बुर्द करने की साजिश रच दी गई. राजस्व विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से नामांतरण कर जमीन जन्नत खातून के नाम चढ़ा दी गई. इस पूरे षड्यंत्र में तत्कालीन सरपंच, वार्ड पंच, पटवारी और नायब तहसीलदार तक शामिल पाए गए. इस फर्जीवाड़े की शिकायत तो 2003 में ही दर्ज हो गई थी मगर कार्रवाई 23 साल बाद मुख्य किरदार जन्नत खातून की मौत के बाद अब जाकर हुई है. इस मामले में नौ आरोपी थे जिनमें से तीन की मौत हो चुकी है और तीन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है.
रहीम बख्श का यह मामला कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक पैटर्न का हिस्सा है. जैसलमेर के बईया गांव से उर्स खान 1995 में पाकिस्तान चले गए और वे आज भी जिंदा हैं. ग्राम पंचायत की ओर से 21 जून, 2021 को बनाए गए एक महिला के मृत्यु प्रमाण-पत्र की कॉपी में काट-छांट कर उर्स खान के नाम से फर्जी मृत्यु प्रमाण-पत्र बना दिया गया. इसके आधार पर उनके भाइयों ने जमीन का नामांतरण कराया और फिर उसे बेच दिया. जब सरपंच ने इसकी शिकायत की तब जाकर मामला उजागर हुआ.
टोंक जिले से 71 साल पहले मोहम्मद खां पाकिस्तान चले गए थे. उनकी 66 बीघा जमीन पाकिस्तान जाने से एक साल पहले ही बेची जा चुकी थी मगर बाद में उनकी बेटियों रईसुन्निसा और फरीदुन्निसा को वारिस बनाकर जमीन का नामांतरण कर दिया गया. जांच में सामने आया कि जिन लोगों ने वारिस होने का प्रमाण दिया वे अधिकृत ही नहीं थे. सरपंच ने भी प्रमाण-पत्र देने से इनकार कर दिया मगर रजिस्ट्रियां रद्द नहीं की गईं.
टोंक जिले के पीपलू के संदेड़ा फार्म गांव में तो हद हो गई. यहां से पाकिस्तान गए वीरूमल का कोई वारिस नहीं था मगर कुछ लोगों ने दो अलग-अलग मृत्यु प्रमाण-पत्र बनाकर खुद को वारिस साबित कर दिया और जमीन अपने नाम करा ली. जांच में पता चला कि जिन पतों पर ये वारिस बताए गए, वहां वैसा कोई भी व्यक्ति रहता ही नहीं था. इस मामले में कार्रवाई आज तक अधूरी है. पीपलू के ही बनवाड़ा गांव में पाकिस्तान गए लोगों की कस्टोडियन कृषि भूमि को 2018 में 61 किसानों में बांटा गया. ये किसान इस जमीन पर 70 साल से काश्त कर रहे थे.
भीलवाड़ा के अब्दुल रहमान के पाकिस्तान में रहते हुए उनकी जमीन के खातेदारी अधिकार 2019 में दूसरों को दे दिए गए, जबकि 28 साल पहले 9 जनवरी, 1991 को यह जमीन कस्टोडियन (सरकारी) घोषित की जा चुकी थी. जांच में यह पूरी प्रक्रिया गलत पाई गई मगर तब तक जमीन का पंजीयन हो चुका था. इस मामले में तत्कालीन एसडीएम तक की भूमिका पर सवाल उठे और कोर्ट में अपील करनी पड़ी. इस जमीन की वर्तमान कीमत करीब 10 करोड़ रुपए बताई जा रही है.
1968 में लागू किए गए शत्रु संपत्ति अधिनियम के तहत विभाजन या युद्धों के बाद पाकिस्तान या चीन गए लोगों की संपत्तियां कस्टोडियन के अधीन आती हैं. 2017 के संशोधन के बाद इस कानून में यह प्रावधान कर दिया गया कि देश छोड़कर गए इन लोगों के वारिस भी संपत्तियों पर दावा नहीं कर सकते. राजस्थान में शत्रु संपत्तियों को लेकर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता पी.एन मंदोला कहते हैं, ''इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब इन संपत्तियों का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल किया जाए. जिला स्तर पर विशेष अभियान चलाकर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए और फर्जीवाड़े में शामिल अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो.''
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राजस्थान मंख महज 15 शत्रु संपत्तियां मानी हैं मगर मंदोला कहते हैं, ''देशभर में ज्यादातर मामलों में शत्रु संपत्तियां उन्हें माना गया जिन्हें सरकार ने अपने कब्जे में लिया था लेकिन राजस्थान में बिना बताए पाकिस्तान चले जाने वाले लोगों की संख्या बहुतायत में है, ऐसे में इनकी संपत्तियों की संख्या भी हजारों में है.''
राजस्थान के सीमावर्ती जिलों जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर में तो यह समस्या ज्यादा गंभीर है ही, साथ ही नागौर, अजमेर, टोंक, झुंझुनूं जैसे मुस्लिम बाहुल्य जिलों में भी हजारों बीघा शत्रु संपत्तियां विवादों में घिरी हैं. नागौर जिले के डीडवाना तहसील के 19 गांवों की हजारों बीघा कस्टोडियन जमीन को लेकर पिछले साल खूब बवाल हुआ था.
1947 में भारत-पाक बंटवारे के दौरान करीब 2 लाख 35 हजार और 1965 व 1971 युद्ध के बाद करीब 50 हजार लोग राजस्थान में अपनी संपत्तियां छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे. इनमें से बहुत सी संपत्तियां आज तक शत्रु संपत्ति घोषित नहीं हुई हैं. कई मामलों में जांच एजेंसियां फर्जीवाड़े को स्वीकार कर चुकी हैं, लेकिन अनियमितताएं सामने आने के बाद भी न रजिस्ट्रियां रद्द हुईं और न दोषी लोगों पर कार्रवाई हुई. इससे भूमाफिया का हौसला बढ़ता है और सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं.
इन जमीनों पर किसान दशकों से खेती कर रहे हैं, लेकिन उनके पास मालिकाना हक नहीं है. इसके चलते कई इलाकों में सामाजिक और आर्थिक दोनों तरह के संघर्ष पैदा हो रहे हैं. ऐसा ही एक मामला हाल ही में झुंझुनूं जिले के बुडाना गांव में सामने आया है जो इस खेल की पुरानी जड़ों को उजागर करता है. बुडाना के बरकत अपने परिवार के साथ 1947 में पाकिस्तान चले गए. उनकी जमीन पर वर्षों से गांव के लोग खेती कर रहे थे मगर अचानक उनका फर्जी मृत्यु प्रमाण-पत्र बनाकर जमीन की रजिस्ट्री भूमाफिया के नाम करवा दी गई. कागजों में बरकत को बेऔलाद दिखाया गया, जबकि उनके बेटे पाकिस्तान में आज भी जिंदा हैं.
बुडाना के आजाद अली कहते हैं, ''बरकत को पाकिस्तान जाते समय हमारे परिवारों ने आर्थिक मदद दी थी जिसके बदले वे इस जमीन का मालिकाना हक हमें सौंपकर गए थे. बरकत के परिवार की 12 बीघा जमीन ही कस्टोडियन में दर्ज थी जबकि 80 बीघा जमीन वे हमें देकर गए थे. बरकत की मौत 1970 में पाकिस्तान में हो चुकी है, मगर 31 दिसंबर 2013 को कुछ लोगों ने यहां उनका फर्जी मृत्यु प्रमाण-पत्र बनाकर जमीन की रजिस्ट्री करवा ली.''
राजस्थान के राजस्व विभाग के राज्यमंत्री विजय सिंह ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, ''पाकिस्तान चले गए लोगों की संपत्तियां सरकार के अधिकार में आती हैं और इन्हें निजी हाथों में नहीं जाने दिया जाएगा. जहां कहीं भी फर्जीवाड़े की बात सामने आएगी, वहां न केवल अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी, बल्कि इसमें लिप्त अधिकारियों को भी बख्शा नहीं जाएगा.''
राजस्थान की यह कहानी सिर्फ जमीन के घोटालों की नहीं है, बल्कि उस प्रशासनिक ढांचे की भी है, जहां व्यक्ति की पहचान कागजों में बदल दी जाती है. कभी उसे मृत घोषित कर दिया जाता है, कभी बेऔलाद तो कभी उसके नाम पर नए वारिस पैदा हो जाते हैं. जब तक यह कागजी खेल चलता रहेगा तब तक न तो असली मालिकों को न्याय मिलेगा और न ही व्यवस्था पर भरोसा पूरी तरह बहाल हो पाएगा.