कोटे के अंदर कोटा
संवेदनशील एससी उप कोटे पर राज्य में बहस तेज और बौद्ध दलित इस बहस के केंद्र में हैं

जनगणना के साथ जाति गणना और आरक्षण फिर सुर्खियों में आए, उससे पहले ही महाराष्ट्र में आगे होने वाली टकराहटों की झलक दिखने लगी है, जिसमें दलितों के आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रस्ताव है.
आरक्षण की जन्मस्थली में सुलग रही इस आग के केंद्र बौद्ध दलित हैं. यह खासकर 'महार' समुदाय से जुड़े हैं, जिनमें ज्यादातर लोगों ने 1956 में डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर के साथ हिंदू धर्म छोड़ दिया था.
दलित समुदायों के भीतर गैर-बराबर विकास के साथ एक संवेदनशील मुद्दा धर्म भी जुड़ गया है. फिलहाल राज्य में अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए 13 प्रतिशत आरक्षण है, जो उनकी जनसंख्या अनुपात के हिसाब से है.
वे 2011 में महाराष्ट्र की कुल 11.23 करोड़ आबादी में 1.32 करोड़ थे. हिंदू दलित संगठनों का आरोप है कि बौद्ध दलित आरक्षण के अधिकांश लाभ खुद ले लेते हैं, जो करीब 60 फीसद के साथ सबसे बड़ा उप-समूह हैं. हालांकि बौद्ध दलित इसे सिरे से नकारते हैं.
'हिंदू बनाम बौद्ध'
इस पुरानी बहस को अब औपचारिक प्रक्रिया के तहत सुलझाया जाएगा. दरअसल, पटना हाइकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अनंत मनोहर बदर की अध्यक्षता में एक सदस्यीय समिति ने मार्च में एससी आरक्षण के उप-वर्गीकरण को लेकर अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. फिर, राज्य सरकार ने मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल की अध्यक्षता में एक और समिति गठित की है, जिसका काम सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित करना तथा सुनवाई करना है. हालांकि इस रिपोर्ट को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है.
राज्य की एससी सूची में कुल 59 जातियां शामिल हैं. आरक्षित सीटों पर लंबे समय से संघर्ष और दलित गोलबंदी के लिए भीमा-कोरेगांव जैसे विवादास्पद घटनाक्रम के जबाव में आरएसएस से जुड़े संगठनों ने मातंग और चर्मकार जैसे हिंदू दलित समूहों में अपनी पैठ बनाई है. दोनों समुदाय मिलकर राज्य के दलितों में लगभग 30 फीसद हैं. उनका कहना है कि नए वर्गीकरण से उनके हितों की रक्षा होगी. इसकी एक मिसाल राज्य में 30 फीसद ओबीसी आरक्षण के मामले में पहले से मौजूद है. इस आरक्षण के भीतर 11 फीसद हिस्सा विमुक्त जाति (वीजे) और घुमंतू जनजातियों (एनटी) के लिए है. बाद में इस श्रेणी को कई कोटियों में बांटा गया, जिसमें विमुक्त जातियों (वीजे, 3 फीसद), घुमंतू जातियां-एनटी-बी (2.5 फीसद), सी (धनगर, 3.5 फीसद) और डी (वनजारी, 2 फीसद) हैं.
कई आपत्तियां
दलितों के लिए ऐसी संभावना से 'महायुति' में भी अलग-अलग खेमे बंट गए हैं. भाजपा के कुछ नेता, जैसे पूर्व मंत्री लक्ष्मणराव धोबले और एमएलसी अमित गोरखे उप-कोटा की मांग कर रहे हैं, जबकि भाजपा के पूर्व राज्यसभा सांसद अमर साबले और पूर्व मंत्री तथा राकांपा विधायक राजकुमार बडोले जैसे अन्य नेताओं को कुछ आपत्तियां हैं.
साबले ने फायदों में गैर-बराबरी को साबित करने के लिए एक तथ्य-खोजी समिति के गठन की मांग की है. बडोले ने 'बदर समिति' को लेकर दिखाई जा रही जल्दबाजी पर सवाल उठाया है. वे पूछते हैं, ''नई जनगणना से विभिन्न एससी जातियों में आर्थिक, शैक्षिक और राजनैतिक प्रगति के बारे में ताजा आंकड़े मिलेंगे...तो फिर पहले उसके नतीजों का इंतजार क्यों न किया जाए?''
बडोले एक अहम राजनैतिक मुद्दे की ओर भी इशारा करते हैं कि आरक्षण में हिस्सेदारी से दलितों की गोलबंदी टूट जाएगी, जिसे वे एकरूप वर्ग मानते हैं, जो छुआछूत का समान रूप से शिकार रहा है. बडोले सवाल करते हैं, ''किसी जाति को एससी श्रेणी में शामिल करने के लिए राष्ट्रपति के आदेश की जरूरत होती है. उप-वर्गीकरण करने का अधिकार राज्यों पर कैसे छोड़ा जा सकता है?''
डॉ. आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर और कांग्रेस के पूर्व मंत्री नितिन राउत जैसे विपक्षी नेताओं ने भी इस कदम की कड़ी आलोचना की है. राउत इस कवायद पर तकनीकी आधार पर सवाल उठाते हैं, और पूछते हैं कि राजनैतिक आरक्षणों का बंटवारा किस तरह किया जाएगा. महाराष्ट्र में एससी के लिए लोकसभा की पांच और विधानसभा की 29 सीटें आरक्षित हैं.
दूसरे सबसे बड़े दलित समूह का जाना-पहचाना चेहरा मातंग समाज संघ के विक्रम गायकवाड़ इस बात पर जोर देते हैं कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था कथित रूप से 'वंचित तबकों' को नजरअंदाज कर रही है. गायकवाड़ का तर्क है कि उन्हें चार उप-श्रेणियों में बांटने से आरक्षण का लाभ सभी जातियों को मिल सकेगा. हालांकि सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाट यह मानते हैं कि बदर रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाना जरूरी है, ताकि आम लोग उस पर अपनी आपत्तियां और सुझाव दर्ज करा सकें.
नीति-निर्माण के दायरे से बाहर यह कदम दलित सशक्तीकरण की राजनीति की मुख्यधारा से भी टकराता नजर आता है. मुंबई विश्वविद्यालय के कला संकाय के पूर्व डीन, समाजशास्त्री पी.जी. जोगदंड आरोप लगाते हैं, ''असल में यह फूट डालो और राज करो की राजनीति का ही हिस्सा है.'' वे इस तर्क को खारिज करते हैं कि बौद्ध दलितों ने आरक्षण के लाभों पर 'कब्जा' कर लिया है. वे कहते हैं कि इस समुदाय की आबादी बस ज्यादा है, और शिक्षा को सबसे पहले अपनाने वाला समुदाय होने के नाते वे अवसरों का लाभ उठा पाए.
यह मुद्दा छह दशकों से चला आ रहा है. साल 1965 में बी.एन. लोकुर समिति ने कहा था, ''आरक्षण लाभों का एक बड़ा हिस्सा राजनैतिक रूप से बड़े और ज्यादा संगठित समुदायों की ओर से हथिया लिया जाता है, जबकि छोटे और ज्यादा पिछड़े विशेष सहायता के अधिक हकदार होते हैं.'' अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट के राज्य-स्तरीय उप-कोटा की अनुमति देने के पीछे यही तर्क था.