संदेह का बढ़ा दायरा
राज्य में 1980 के दशक में दंगों के दौरान बने एक कानून में छोटे से बदलाव के जरिए अब सांप्रदायिक आधार पर बस्तियां बसाने को मिला कानूनी बल

गुजरात के 'अशांत क्षेत्र अधिनियम' की जड़ें उसके आधुनिक इतिहास के सबसे बुरे अध्यायों में शामिल साल 1985-86 के सांप्रदायिक दंगे से जुड़ी हैं. उन दंगों के बाद कांग्रेस सरकार ने इस कानून को एक अस्थायी आपातकालीन अध्यादेश के तौर पर लागू किया था.
सबसे पहले अहमदाबाद के पुराने शहर के दंगा-प्रभावित इलाकों में यह लागू हुआ. इसका मकसद घबराहट में होने वाली बिक्री को रोकना था. साथ ही, बेघर हुए अल्पसंख्यकों को संगठित धमकियों के दबाव में औने-पौने दाम पर अपने घरों-मोहल्लों से बाहर किए जाने पर रोक लगाना था.
इस कानून में धीरे-धीरे बदलाव होते रहे. अब एक नए कानून के जरिए इसका दायरा पूरे राज्य में सामान्य रूप से बढ़ा दिया गया है. गुजरात अशांत क्षेत्रों में अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक और परिसर से किरायेदारों को बेदखली से सुरक्षा का प्रावधान (संशोधन) विधेयक, 2026 को बजट सत्र के आखिरी दिन बहुमत से पारित किया गया. इस विधेयक को सुरक्षा उपाय के रूप में पेश किया गया, और इसमें विवाद वाले नाम 'अशांत क्षेत्र' को बदलकर उसकी जगह अधिक सौम्य नाम 'निर्दिष्ट क्षेत्र' किया गया है.
बढ़ता घेरा
बारीकी से देखें तो यह संपत्ति के लेन-देन में धर्म-आधारित भेदभाव को बढ़ाता है और कानूनी ढाल देता है. यह औपचारिक तौर पर बस्तियों में बंटे सामाजिक नक्शे को और गहरा कर देता है. वहीं, 1991 में कांग्रेस और चिमनभाई पटेल की गठजोड़ सरकार में 1986 के अध्यादेश की जगह नया अधिनियम लाया गया था.
उसमें किसी खास साल की घटना (जैसे 80 के दशक के मध्य में हुए दंगे) को आधार बनाने की शर्त हटा दी गई. अब किसी भी ऐसे इलाके में जहां 'लंबे समय' से दंगे या भीड़-हिंसा की घटनाएं होती रही हों, उसे अशांत क्षेत्र के तौर पर अधिसूचित किया जा सकता था. इसी आधार पर बाद में इस अधिनियम का दायरा बढ़ाकर वडोदरा तक कर दिया गया और धीरे-धीरे इसे सूरत, भरूच, गोधरा, कपडवंज, हिम्मतनगर और विरमगाम को भी इसके दायरे में लाया गया.
साल 2020 के संशोधनों के तहत इसमें कलेक्टर की शक्तियों को ज्यादा बढ़ा दिया गया और इसमें मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच संपत्ति हस्तांतरण के मामलों को खारिज करने के आधार के रूप में 'अनुचित जमावड़े', 'ध्रुवीकरण' और 'आबादी संतुलन' जैसे शब्द जोड़े गए.
गुजरात हाइकोर्ट में इसे चुनौती दी गई कि 'अनुचित जमावड़े' जैसे शब्द असल में धार्मिक अलगाव को कानूनी शक्ल देते हैं जो समानता की संवैधानिक गारंटी का सीधा उल्लंघन है. 2025 में अदालत ने इस कानून को सही ठहराया, मगर इसके घोषित उद्देश्य पर जोर दिया. वह यह कि इसका मकसद हताशा में की गई बिक्री को रोकना है, न कि मोहल्लों में धार्मिक अनुपात की निगरानी करना.
2026 के संशोधन में 'अनुचित जमावड़े' और 'ध्रुवीकरण' शब्दों को हटा दिया गया है और 'सांप्रदायिक तनाव की आशंका' जैसे शब्द को शामिल किया गया है. संशोधित धारा 3 के तहत अब किसी भी इलाके को 'विशेष क्षेत्र' घोषित किया जा सकता है—सिर्फ वही इलाका नहीं जहां सांप्रदायिक हिंसा हुई हो, बल्कि वहां भी जहां सांप्रदायिक तनाव के कारण सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की 'आशंका' है. 'पीड़ित व्यक्ति' की परिभाषा भी बहुत व्यापक कर दी गई है.
पहले यह सिर्फ किसी सौदे में शामिल पक्षों तक सीमित थी, अब इसमें उस क्षेत्र का कोई भी निवासी हो सकता है. इस एक बदलाव की वजह से अब पड़ोसी भी किसी ऐसी संपत्ति की बिक्री को चुनौती दे सकते हैं जिसमें उनका कोई कानूनी हित नहीं है. इस तरह कलेक्टर का दफ्तर ऐसी जगह बन जाएगा जहां कोई समुदाय किसी सौदे को वीटो कर सकता है. वहीं, कलेक्टर को अपनी पहल पर सौदों की जांच करने और बिना किसी शिकायत के संपत्ति अपने कब्जे में लेने का अधिकार मिल गया है.
अलग स्वर
गुजरात के एकमात्र मुस्लिम विधायक इमरान खेड़ावाला इसे स्थानीय निकाय चुनावों से पहले सांप्रदायिक विभाजन को और गहरा करने की साजिश बताते हैं. राज्य के 17 नगर निगमों में से 15 और 84 नगर पालिकाओं में 26 अप्रैल को मतदान है.
राजनैतिक प्रेक्षक और समाजशास्त्री भी इस कानून पर संदेह जताते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के स्कॉलर शारिक लालीवाला की दलील है कि प्रॉपर्टी के बाजार में सरकारी कंट्रोल की गांठे डालना और शहरी क्षेत्रों पर 'कानून-व्यवस्था' की तलवार लटके रहना एक तरह से 'बाजार की नाकामी की नींव रखना' है.
वे कहते हैं, ''असल में यह राजनीति में धन का जरिया बन जाएगा.'' वे शराबबंदी के साथ इसे उन दो कारणों में से एक बताते हैं जिनकी वजह से बड़ी आइटी कंपनियां गुजरात से दूर रही हैं. कारण? दोनों कानून एक ही बात का इशारा करते हैं: निजी स्वतंत्रता, आप क्या खाते-पीते हैं या कहां रहना चाहते हैं, इन पर सरकारी नियंत्रण.