अनाथालय से विश्व चैंपियन तक
विश्व तीरअंदाजी पैरा सीरीज 2026 में गोल्ड मेडल जीतने वाली पायल की कहानी

जब शीतल देवी ने दोनों हाथों के बगैर पेरिस पैरा ओलंपिक 2024 में तीरअंदाजी में भारत का पहला पदक जीता, तो दुनिया हैरान रह गई. हर कोई सोच रहा था कि यह कैसे संभव हुआ. लेकिन फिर एक और तीरअंदाज आईं जिनके हाथ और पैर दोनों नहीं हैं. पायल नाग ने 6 अप्रैल को बैंकॉक में आयोजित विश्व तीरअंदाजी पैरा सीरीज 2026 में विश्व नंबर-1 शीतल देवी को हराकर गोल्ड मेडल जीत लिया. गौर तलब है कि पायल, शीतल को अपनी बड़ी बहन और आइडल मानती हैं.
मूल रूप से ओडिशा के बालांगीर जिले के जमुनाबाहाल गांव के रहने वाले पायल के पिता विजय और माता जलंता नाग साल 2015 में पलायन कर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर काम की तलाश में गए थे. वहां एक भवन निर्माण में दोनों बतौर दिहाड़ी मजदूर काम कर रहे थे. मई 2015 में, जब पायल आठ साल की थी, एक निर्माणाधीन भवन के पास में ही खेलते हुए पायल को 11 केवी के एक ढीले लटकते हाइ-टेंशन तार से करंट लग गया.
वहीं काम कर रहे माता-पिता उसे तुरंत एक निजी अस्पताल ले गए, लेकिन पहले ही दिन 9,000 रुपए के बिल ने उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी. वे जब तक उसे गोद में उठाकर सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचे, पायल ने अपने दोनों हाथ और दोनों पैर खो दिए. कई सर्जरी, दर्द, संक्रमण और अनिश्चितता के साथ इलाज लंबा चला. इसी दौरान नाग परिवार को ओडिशा में अपनी जमीन तक बेचनी पड़ी.
उस वक्त छत्तीसगढ़ कैडर के वरिष्ठ आइएएस अधिकारी संतोष मिश्र और उनकी पत्नी आइपीएस सोनल मिश्रा की नजर इस बच्ची से संबंधित एक खबर पर पड़ी. उनकी मदद से एम्स रायपुर में पायल का ऑपरेशन हुआ. कई कठिन सर्जरी के बाद वह ठीक होने लगी. लंबी कोशिशों के बाद बिजली विभाग से दो लाख रुपए का मुआवजा भी दिलवाया गया. टाटा ट्रस्ट की मदद से उस कृत्रिम पैर मिले.
पैर मिलने थे कि पायल की कहानी चल पड़ी. हालात तंग थे, सो जिला कलेक्टर की मदद से साल 2019 में पायल को बलांगीर के पर्वतगिरि बाल निकेतन अनाथालय में रखा गया. इस दौरान, द्रोणाचार्य अवॉर्डी और शीतल देवी के कोच कुलदीप वाधवान की नजर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर वायरल हो रही पायल की तस्वीर पर पड़ी. कुलदीप कहते हैं, ''उसे तलाशते हुए मैं बालांगीर पहुंचा और 2023 में जम्मू की माता वैष्णो देवी आर्चरी एकेडमी लेकर आया.''
वाधवान ने कृत्रिम पैरों की मदद से पायल की ट्रेनिंग शुरू करवाई. एक लंबी प्रक्रिया के बाद उन्हें विश्व पैरा आर्चरी से एक कृत्रिम पैर से अभ्यास की अनुमति मिली. साल 2025 में मात्र 17 साल की उम्र में उन्होंने छठी नेशनल पैरा आर्चरी चैंपियनशिप में दो गोल्ड जीते. इसके बाद खेलो इंडिया पैरा गेम्स 2025 में सिल्वर मेडल जीता.
लेकिन बड़ा धमाका 6 अप्रैल को हुआ. बैंकॉक में आयोजित वर्ल्ड आर्चरी पैरा सीरीज के फाइनल में सिर्फ मशीनों की आवाज और 50 मीटर दूर लक्ष्य पर लगते तीरों की ध्वनि थी. मैदान में पायल नाग थीं और उनके सामने थीं उनकी शीतल 'दीदी'. जहां दुनिया एक रोमांचक मुकाबला देख रही थी, वहीं भारतीय पैरा खेलों को समझने वाले लोग इसे दो ऐसी महिलाओं की लड़ाई के रूप में देख रहे थे, जिन्होंने समाज की कई बाधाओं को पार किया है.
स्कोरबोर्ड पर 129-126 का स्कोर चमका और महज 18 साल की उम्र में ओडिशा की इस खिलाड़ी ने दुनिया की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी को हराकर अपना पहला अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीत लिया. पायल कहती हैं, ''मेडल जीतने बाद मैंने कुलदीप सर को फोन कर कहा कि सोशल मीडिया पर मेरी ही चर्चा है. तभी सर ने कहा कि इसे अब अपने दिमाग से डिलीट कर दो. अक्तूबर में एशियन गेक्वस होने वाले हैं, उस पर ध्यान दो. अब मैं बस वही कर रही हूं.''
कोच कुलदीप के जुनून के पीछे भी उनकी कहानी है. उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के धनोरा टिकरी गांव में जन्मे इस कोच का शुरुआती जीवन संघर्षों से भरा रहा. उन्होंने पांच साल की उम्र में अपनी मां को खो दिया. जवानी में वे भारतीय सेना में शामिल हुए, जहां कर्नल मोहन के मार्गदर्शन में उन्होंने तीरअंदाजी सीखी.
खुद खेल में आगे बढ़ते हुए कुलदीप ने जमीनी स्तर से छिपी प्रतिभाओं को पहचानने और निखारने को अपना मिशन बना लिया. गांव की गलियों और अनाथालयों को प्रशिक्षण केंद्र बनाकर उन्होंने कच्ची प्रतिभा को चैंपियन में बदला. शीतल देवी के बाद पायल नाग तक, अब तक वे 300 से अधिक आर्चरों को प्रशिक्षित कर चुके हैं, जिनमें कई गरीब और दिव्यांग पृष्ठभूमि से आते हैं.
सफलता से सवाल तक
पायल के माता-पिता इस वक्त भी राज मिस्त्री का काम करते हैं. एक बेटा सिकल सेल से पीड़ित है. 8 अप्रैल को राज्य के सीएम मोहन माझी ने फोन पर उन दोनों से बात की. उन्हें कहा पायल जब भी घर आए, वे उसे लेकर सीएम हाउस जरूर आएं. जलंता कहती हैं, ''हमने अपनी मरी हुई बच्ची को जिंदा किया है.
उम्मीद करती हूं वह देश की उम्मीद को पूरा करे.'' मां की उम्मीद के पीछे पायल का कठोर अनुशासन है. वह रोज 300 तीर चलाती हैं. बहन वर्षा नाग उनकी हर जरूरत का ध्यान रखती हैं, खाना खिलाने से लेकर अभ्यास के लिए तैयार करने तक.
सफलता के उन्माद में कुछ सवाल अब भी बाहर निकलने को बेचैन हैं. पायल के पिता जैसे लाखों मजदूर असुरक्षित वातावरण में काम कर रहे हैं, पायल की उम्र के बच्चे निर्माणाधीन भवनों में हादसों की आशंका के बीच खेल रहे हैं.
पायल के पिता को उसके इलाज के लिए गांव की जमीन बेचनी पड़ी. ऐसे में क्या हम ये उम्मीद कर सकते हैं मजदूरों को सम्मान और सुरक्षा मिले, अस्पताल मुनाफे से पहले जीवन को महत्व दें? आदर्श तो यह होगा कि कोई अपनी संतान को बचाने के लिए अपनी जमीन बेचने को मजबूर न हो.