भाजपा के सम्राट, नीतीश का आशीर्वाद

महज आठ साल पहले भाजपा में आए सम्राट चौधरी बिहार में पार्टी के पहले सीएम तो बन गए मगर पार्टी के कई नेता उनकी ताजपोशी से सहज नहीं. उनके सामने सुशासन से लेकर समीकरण साधने तक की चुनौती रही

Special Report: Bihar
नीतीश कुमार ने 14 अप्रैल को पटना में एनडीए विधायकों की बैठक में सम्राट चौधरी को सत्ता की जिम्मेदारी सौंपी

जगह थी बिहार भाजपा का दफ्तर. मौका था बिहार में पार्टी के पहले सीएम के स्वागत समारोह का. इस दिन का इंतजार बिहार भाजपा के नेताओं ने दिवंगत कैलाशपति मिश्र के जमाने से लेकर अब तक किया था. मगर लोकभवन में पद और गोपनीयता की शपथ लेकर बुधवार, 15 अप्रैल की दोपहर जब सम्राट चौधरी पार्टी दफ्तर पहुंचे तो उनके स्वागत के लिए सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ही थे.

शपथ ग्रहण समारोह में भी भाजपा के दो शीर्ष नेता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह में से कोई भी नहीं पहुंचा था. उनकी शुभकामनाएं भी देर से जारी हुईं. मगर सम्राट ने इसकी परवाह नहीं की. उन्होंने एक-एक कार्यकर्ता को मंच पर बुलाकर खुद उनका अभिवादन स्वीकार किया और तस्वीरें खिचवाईं. इस काम के लिए वे काफी देर तक मंच पर डटे रहे.

पार्टी में उनको लेकर उत्साह की कमी की वजह संभवत: यह है कि वे नए हैं, उनका संघ या विद्यार्थी परिषद जैसे संगठनों से आरंभिक जुड़ाव नहीं रहा. उनकी राजनैतिक शिक्षा राष्ट्रीय जनता दल में हुई. और उन्हें सीएम बनाने में नीतीश कुमार का वीटो काम कर रहा था. ऐसे में पार्टी के पुराने नेताओं की निगाह में वे अब तक पराए ही दिखते हैं.

इस पराएपन की झलक पूर्व डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा के बयान में भी मिली जब सम्राट के भाजपा विधानमंडल का नेता चुने जाने के बाद उन्होंने मीडिया से कहा, ''अभी भाजपा में तीसरी और चौथी पीढ़ी सक्रिय है. हमने बरसों बरस खून-पसीना बहाया और बलिदान दिया, तब यह अवसर आया है. मगर हम तो पार्टी के सिपाही हैं, अपने कमांडर के आदेश के अनुसार, गठबंधन की राजनीति को साथ लेकर चलने के लिए हमने सम्राट चौधरी जी के नाम का प्रस्ताव दिया है.’’ मतलब साफ था कि सम्राट को कुर्सी नीतीश कुमार के वीटो की वजह से मिली है.

नीतीश के साथ आत्मीयता और लव-कुश
राज्य के मुंगेर जिले के लखनपुर गांव में 16 नवंबर, 1968 को जन्मे, पूर्व फौजी और राजनेता पिता शकुनी चौधरी की छत्र-छाया में राजनीति की शुरुआत करने वाले सम्राट, 2018 में भाजपा में आने से पहले 14 साल राष्ट्रीय जनता दल, एक साल जनता दल (यूनाइटेड), और एक साल हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) की राजनीति कर चुके हैं. इस वक्त वे बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है.

पिछले तीन-चार दिनों के सम्राट चौधरी के हाव-भाव से ऐसा लगता है कि वे पार्टी की बैठकों में औपचारिक नजर आते हैं और नीतीश कुमार के साथ सहज-सहृदय. नीतीश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे वाले दिन वे सुबह से ही उनके साथ थे. दोपहर सवा तीन बजे जब नीतीश इस्तीफा देने लोकभवन जा रहे थे तब भी सम्राट उनकी कार की अगली सीट पर विराजमान नजर आए.

उन्हें जब एनडीए विधायक दल का नेता चुना गया तो उन्होंने झट से नीतीश कुमार के पांव छू लिए. उनकी यह आत्मीयता उस समय नदारद दिखी, जब भाजपा दफ्तर में उन्हें पार्टी के विधायक दल का नेता चुना गया था. इसके उलट वहां भी वे नीतीश कुमार की तारीफ करने से नहीं चूके.

पिछले दो दिनों से जब भी सम्राट चौधरी को अपनी बात कहने का मौका मिलता है, वे नीतीश कुमार का जिक्र जरूर लेकर आते हैं. चाहे सचिवालय में अधिकारियों की बैठक हो या सार्वजनिक मंच. शपथ ग्रहण के बाद अपने सोशल मीडिया में भी उन्होंने 'नीतीश कुमार’ को हमारे नेता कहकर संबोधित किया. उनके सरकारी आवास में उनके पिता के ठीक बगल नीतीश कुमार की फोटो टंगी नजर आती है.

नीतीश के साथ सम्राट के सहज रिश्तों की वजह उनके पुराने पारिवारिक रिश्ते और लव-कुश समीकरण भी है. सम्राट के पिता शकुनी नीतीश की समता पार्टी के संस्थापक रहे हैं. वे 1995 में पार्टी के सात विधायकों में से एक थे. इस रिश्ते की गर्माहट इस साल शकुनी चौधरी के 90वें जन्मदिन समारोह में भी दिखी. समारोह में पहुंचे नीतीश ने शकुनी से कहा था, ''सम्राट काफी अच्छा काम कर रहे हैं.

वे राजनीति की ऊंचाइयों तक पहुंचेंगे, हम उनके साथ हैं.’’ जवाब में शकुनी बोले, ''मुझे यह देख कर खुशी हो रही है कि लालू के शासन के खिलाफ हमने जो 'लव-कुश’ का बीज बोया था, वह आज फल दे रहा है.’’ दरअसल नीतीश की 'कुर्मी’ जाति और शकुनी की 'कुशवाहा’ जाति को बिहार की राजनीति में लव-कुश की जोड़ी बताया जाता है.

यह भी कहा जाता है कि सम्राट के सीएम बनने से त्रिवेणी संघ का वह चक्र पूरा हो गया है, जिसका सपना 1933 में देखा गया था. दरअसल उस वक्त बिहार की तीन मझोली जातियों यादव, कुर्मी और कुशवाहा ने मिलकर राज्य में बहुजनों की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाने का सपना देखा था. इनमें यादव (लालू-राबड़ी) और कुर्मी (नीतीश) जाति के सीएम बन चुके थे. ऐसे में कुशवाहा जाति मानती रही है कि अब अगला नंबर उनका होना चाहिए. राज्य में कुशवाहा जाति की आबादी 4.21 फीसदी है, यह जाति राजनीतिक रूप से जागरूक भी है. कहते हैं, इसलिए भी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने सम्राट चौधरी के नाम पर सहमति दे दी.

विवादों से पुराना नाता
सम्राट चौधरी का शुरू से ही विवादों से गहरा नाता रहा है. वैसे तो वे राजनीतिक तौर पर अपने पिता के साथ 1980 से ही सक्रिय थे. तब उन्हें राकेश कुमार उर्फ सम्राट मौर्य के नाम से जाना जाता था. मगर राजनीति में उनकी औपचारिक शुरुआत 1999 में हुई, जब नीतीश कुमार के साथ मतभेद की वजह से शकुनी राजद में चले गए थे और राबड़ी सरकार में सम्राट को मापतौल एवं बागवानी मंत्री बनाया गया था. तब सम्राट किसी सदन के सदस्य नहीं थे. उनके मंत्री बनते ही विवाद उठ खड़ा हुआ था.

इंडिया टुडे के 1 दिसंबर, 1999 के अंक में बैरन बन गई उमरिया शीर्षक से संजय कुमार झा की रिपोर्ट छपी थी. इसके मुताबिक, तब समता पार्टी के नेता रघुनाथ झा और पी.के. सिन्हा ने राज्यपाल और चुनाव आयुक्त से शिकायत की थी कि सम्राट अभी 25 साल के नहीं हुए हैं, इसलिए उन्हें मंत्री बनाना गलत है. ऐसे में ठीक उनके जन्मदिन, 16 नवंबर के दिन बिहार के तत्कालीन राज्यपाल सूरजभान ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था. हालांकि, इसके बाद लालू प्रसाद यादव के निर्देश पर उन्होंने खुद इस्तीफा दे दिया.

इस विवाद के पीछे की वजह 1995 का बहुचर्चित तारापुर हत्याकांड माना जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले से जुड़े अदालती हलफनामे में सम्राट की उम्र 16 वर्ष बताई गई थी. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले जनसुराज नेता प्रशांत किशोर ने भी उनकी उम्र के विवाद को उठाया था. हालांकि तब सम्राट ने कहा था कि अदालत ने इस मामले में उन्हें बरी कर दिया है.

प्रशांत किशोर ने उस वक्त सम्राट की डिग्री को लेकर भी सवाल उठाए थे. सम्राट अपने चुनावी हलफनामे में अपनी शैक्षणिक योग्यता मानद डी-लिट् डिग्री और कामराज विश्वविद्यालय से प्री फाउंडेशन कोर्स लिखते हैं. जबकि प्रशांत किशोर का कहना था कि सम्राट ने दसवीं भी पास नहीं की है. जनसुराज उनके सीएम बनने के बाद फिर से इन सवालों को उठाने लगी है.
बहरहाल, 1999 के इस विवाद के बाद सम्राट का राजनीतिक सफर राजद के साथ शुरू हो गया. अगले साल वे परबत्ता विधानसभा से चुनाव जीते. और फिर 2013 तक राजद के साथ रहे.

गाढ़े वक्त में की थी नीतीश की मदद
यह 2013 की बात है जब भाजपा में नरेंद्र मोदी के उभार से असहज नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़ लिया था. उस वक्त जदयू के पास 115 विधायक थे और बहुमत का आंकड़ा था 122. हालांकि उस वक्त कांग्रेस के चार, सीपीआइ के एक और चार निर्दलीय विधायकों ने जदयू को समर्थन दिया था मगर नीतीश बहुत आश्वस्त नहीं थे.

उस गाढ़े वक्त में राजद विधायक दल के सचेतक सम्राट चौधरी 13 विधायकों को साथ लेकर जदयू के पाले में आ गए. हालांकि बाद में लालू यादव के प्रयासों से कुछ विधायक राजद में लौट गए थे. मगर नीतीश की सरकार बच गई और एक बार फिर सम्राट और शकुनी चौधरी नीतीश के साथ आ गए थे.  

नीतीश ने 2014 में जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी तो सम्राट चौधरी भी उस सरकार में मंत्री बने. मगर मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद जब मांझी ने अपनी पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) का गठन किया तो सम्राट और शकुनी हम के साथ आ गए. तब शकुनी को हम का बिहार प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था.

शपथग्रहण के दौरान सम्राट चौधरी (बीच में), राज्यपाल सैयद अता हसनैन (एकदम बाएं), उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने

हालांकि जैसा सम्राट कहते हैं कि वे कभी हम के औपचारिक सदस्य नहीं बने, बस पिता की वजह से पार्टी का सहयोग किया. मगर हम पार्टी के साथ होने की वजह से ही 2015 के विधानसभा चुनाव में सम्राट की नजदीकियां भाजपा से बढ़ने लगीं क्योंकि उस चुनाव में हम एनडीए का हिस्सा थी. जानकार बताते हैं कि इसी दौरान सम्राट ने उत्तर प्रदेश में अपने स्वजातीय भाजपा नेता केशव प्रसाद मौर्य से मदद मांगी जिसके बाद 2017 में उन्हें भाजपा में एंट्री मिली.

अविश्वसनीय सफर
भाजपा में प्रवेश के साथ ही उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष पद मिल गया. फिर एनडीए की राज्य सरकार में वे मंत्री बने. वर्ष 2022 में जब जदयू अलग हुई और भाजपा को विपक्ष में बैठने का अवसर मिला तो पार्टी ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष पद की जिम्मेदारी दी. फिर वे मार्च, 2023 में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने और 2024 में जब फिर से बिहार में एनडीए की सरकार बनी तो उन्हें डिप्टी सीएम का पद मिल गया.

पार्टी ने उन्हें जब जो भूमिका दी, उसे बखूबी निभाया. विपक्ष में रहते हुए वे नीतीश सरकार पर लगातार हमलावर रहे और जब साथ आए तो नीतीश का साया बन गए. इस वजह से पार्टी में तेजी से उनका कद बढ़ा और पिछले दो साल से वे एक तरह से बिहार भाजपा के नंबर वन माने जाते रहे हैं. साथ ही नीतीश सरकार में भी वे नंबर टू की तरह काम करते रहे.

सितंबर 2022 में मां के निधन के बाद सम्राट ने सिर पर मुरेठा बांधा था. उस वक्त नीतीश कुमार महागठबंधन के साथ सरकार चला रहे थे. तब नेता-प्रतिपक्ष के तौर पर वे अक्सर नीतीश कुमार पर हमलावर रहा करते थे और कहते थे उन्हें मुक्चयमंत्री पद से हटाने के बाद ही वे सिर पर बंधा मुरेठा खोलेंगे.

मगर जब 2024 में नीतीश भाजपा के साथ आ गए तब उनके डिप्टी बने सम्राट समझ चुके थे कि पार्टी हित और अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें अपने अहम का त्याग करना पड़ेगा. ऐसे में जुलाई 2024 में अयोध्या यात्रा के दौरान सिर मुंडवाकर सरयू नदी में अपनी पगड़ी विसर्जित कर दी.

वे समझ चुके थे कि नीतीश के उत्तराधिकारी वे तभी बन सकते हैं, जब पार्टी के साथ नीतीश का भी आशीर्वाद उन्हें मिले. भाजपा भी चाहती थी कि नीतीश से रिश्ते बेहतर रहें ताकि वे अपने आखिरी वक्त में किसी सूरत में राजद के साथ न चले जाएं. ऐसे में वे लगातार साए की तरह नीतीश के साथ बने रहे. अपने हर संबोधन में वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भी तारीफ करने लगे और भरपूर सम्मान देकर नीतीश का दिल जीत लिया.

नीतीश की जगह ले सकेंगे सम्राट?
बहरहाल एक बड़ा तबका चौधरी की शैक्षणिक योग्यता और विवादित इतिहास की वजह से उनपर हमलावर है. इसमें भाजपा समर्थक भी हैं और विरोधी भी. इस पर टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, ''एक बेहतर विजनरी प्रशासक होने के लिए या तो नीतीश कुमार जैसा शैक्षणिक बैकग्राउंड होना चाहिए या कामराज जैसी जनता से करीबी और संवेदनशीलता.

सम्राट में फिलहाल इन दोनों का अभाव मिलता है.’’ चौधरी की प्रशासनिक क्षमता पर जल्द ही सवाल उठाए जाएंगे. और चौधरी ने यह संकेत दे दिया है कि वे इन सवालों के लिए तैयार हैं. शपथ लेने के तुरंत बाद ही उन्होंने शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक की और संकेत दिया कि बिहार की सत्ता के सुर बदलेंगे.

अपने पूर्ववर्ती लालू प्रसाद यादव से अलग, नीतीश कुमार ने हमेशा संयमित और शांत शैली में सरकार चलाई है. चौधरी इसके विपरीत एक मुखर और प्रभावशाली मुक्चयमंत्री की छवि लेकर आते दिख रहे हैं. उनके कार्यकाल में संदेश और भाषा दोनों अधिक तीखे हो सकते हैं और केंद्र की राजनैतिक शैली के साथ उनका तालमेल भी ज्यादा नजदीकी हो सकता है.

हालांकि, प्रशासनिक तौर पर उनका तजुर्बा कोई बहुत लंबे समय का नहीं है. गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए उनके काम का बहुत आकलन भी नहीं नहीं हुआ है. नीतीश कुमार शासन के हर पहलू को बारीकी से समझते थे. इसके अलावा चौधरी के सामने नौकरशाही से भी काम लेने की बड़ी चुनौती है. यह देखना भी दिलचस्प होगा कि चौधरी उस नौकरशाही को कैसे संभालते हैं, जो नीतीश कुमार कार्यशैली की आदी रही है. उनकी निर्णय प्रक्रिया और सबको साधने की कला पर सबकी नजर रहेगी.

फिलहाल, चुनौतियां सामने हैं. कैबिनेट में फेरबदल तय है. यह एक जटिल कला है, जिसमें चौधरी को अनुभव हासिल करना होगा. भाजपा में असंतुष्ट समूहों को संतुलित करने के लिए संगठन के प्रमुख चेहरों को जगह देनी पड़ेगी. साथ ही, दिल्ली के संकेत समझकर उन्हें अपने तरीके से लागू करना होगा, केवल दोहराना नहीं.

दूसरी ओर, जद(यू) के किसी भी वर्ग को अलग-थलग नहीं होने देना भी जरूरी है, जो उनके लिए आंतरिक अस्थिरता के खिलाफ सुरक्षा कवच है. आगे भी नीतीश का मार्गदर्शन उनके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. अतीत में बिहार ने देश को कई सम्राट दिए लेकिन अब लोकतंत्र के दौर में पदासीन हुए नए सम्राट के कामकाज पर सबकी नजर रहेगी.

नीतीश के साथ सम्राट के सहज रिश्तों की वजह उनके पुराने पारिवारिक रिश्ते और 'लव-कुश’ समीकरण है, जो नीतीश की 'कुर्मी’ और ‘‘सम्राट की 'कुशवाहा’ जाति के मेल से बनता है. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने नौकरशाही से भी काम लेने की एक बड़ी चुनौती है. यह देखना भी दिलचस्प होगा कि चौधरी उस नौकरशाही को कैसे संभालते हैं, जो नीतीश कुमार कार्यशैली की आदी रही है.

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