बैसाखी पर छोड़ गया मौसम

मनमौजी मौसम से पंजाब और पूरे उत्तर भारत में कटाई के लिए तैयार गेहूं की फसल हुई चौपट. किसानों की आमदनी से लेकर खाद्यान की कीमतें, मौद्रिक नीति, ग्रामीण मांग सब मुश्किल में है

अमृतसर में 8 अप्रैल को गेहूं की बर्बादी का अंदाजा लगाता किसान.

बैसाखी के मौके पर 13 अप्रैल को बजने वाली ढोल की थाप गुरप्रीत सिंह को बहुत खोखली लगी होगी. वे फिरोजपुर के अपने गांव आरिफ के में खेत की मुंडेर पर खामोश खड़े थे. यह आम तौर पर वह दिन होता है जब महीनों की मेहनत पक कर फसल में बदल जाती है.

इस साल उनका गेहूं खेत में चौपट पड़ा था, जिसे बेमौसम बारिश, तेज हवाओं और ओलों ने बर्बाद कर दिया. यह आसमानी आपदा तब आई जब फसल कटाई के लिए तैयार थी.

भीगे गेहूं हाथ में लिए 48 वर्षीय गुरप्रीत कहते हैं, ''फसल कटाई के लिए तैयार थी. बस कुछ दिनों की बात थी और सीजन की कमाई मेरे हाथ में होती.'' पूरे उत्तर भारत में बैसाखी कमजोरी की याद दिलाती आई. मौसम की मनमानी ने सबसे अहम मोड़ पर खेती-बाड़ी के चक्र में खलल डाला. केंद्र का अनुमान है कि 2.5 लाख हेक्टेयर से ज्यादा रबी की फसलों पर असर पड़ा है, जिनमें सबसे ज्यादा नुक्सान गेहूं को हुआ और चना और दूसरी फसलें भी चपेट में आईं.

कुछ खास इलाकों में स्थानीय स्तर पर हुआ नुक्सान 80 फीसद तक पहुंच गया, तो कम प्रभावित इलाकों में फसल की गुणवत्ता में गिरावट आई. पंजाब में अप्रैल की शुरुआत में सामान्य से करीब 470 फीसद ज्यादा बारिश होने से 1.25 लाख एकड़ से ज्यादा रकबे की फसल प्रभावित होने की आशंका है.

हरियाणा पर भी बहुत बुरी मार पड़ी. राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में ओले गिरने से हालात और बदतर हो गए, जिसका असर गेहूं और सरसों की फसलों पर पड़ा. उत्तर प्रदेश में नुक्सान छितराया हुआ लेकिन कम गंभीर नहीं है, खासकर उन छोटे किसानों के लिए जो स्थानीय बाजारों पर निर्भर हैं.

बदतरीन वक्त
गेहूं जब पकने के अंतिम चरण में होता है, उसे सूखे मौसम की जरूरत होती है. सबसे अच्छा मौसम वह होता है जब तापमान 28-32 डिग्री सेल्सियस और हवा में नमी कम हो. इससे दाना सख्त हो जाता है और उसमें नमी का स्तर घटकर 12 फीसद से भी कम होता है. मगर उत्तरी मैदानों में दिन का तापमान गिरकर 22-26 डिग्री हो गया, साथ ही हवा में नमी बढ़ गई, बारिश हुई और यहां तक कि ओले भी गिरे.

इस वक्त होने वाली बारिश अनाज के दानों को बिगाड़ देती है. नमी रिसकर दानों के अंदर घुस जाती है, जिससे वे सिकुड़ कर बदरंग हो जाते हैं, यहां तक कि उनमें फफूंद भी लग जाती है. प्रभावित किसान बता रहे हैं कि उन्हें प्रति क्विंटल 300-500 रुपए कम दाम मिल रहे हैं, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2,585 रुपए है.

वृहद आर्थिक परेशानियां
भारत में इस सीजन में (12.20 करोड़ टन) गेहूं पैदा होने की उम्मीद है, जो पिछले साल से 2 फीसद ज्यादा है. गेहूं की कुल उपलब्धता पर फिलहाल खतरा नहीं है. फिर भी इस पैदावार का खासा बड़ा हिस्सा शायद खरीद या प्रोसेसिंग के मानदंडों पर खरा न उतरे. सामने जो बात आ रही है, वह है इस्तेमाल के लायक आपूर्ति में कमी. 

पंजाब और हरियाणा की मंडियों में स्थिति और ज्यादा विकट है, जहां कटाई के बाद गेहूं खुले में पड़ा है और खरीद में देरी और ढके हुए गोदामों की कमी के कारण बारिश का खतरा झेल रहा है. खेतों में मौसम की मार से जो फसलें बच गईं, वे कटाई के बाद गुणवत्ता में गिरावट आने के जोखिम से घिरी हैं.

महंगाई के लिहाज से भी गेहूं अहम है. अगर समय रहते संभाला नहीं गया तो अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि खाद्य महंगाई पर 20-40 आधार अंकों का असर पड़ सकता है, जो चारे की बढ़ती लागत के मार्फत रिसकर मुर्गीपालन और डेयरी तक भी पहुंच सकता है. महंगाई में वैसे तो नरमी के संकेत दिख रहे थे, रिजर्व बैंक भी नीतिगत ढील देने का मन बना रहा था. लेकिन वैश्विक अनिश्चितता ने स्थिति को जटिल कर दिया.

किसान अपनी आमदनी में 10-30 फीसद की गिरावट झेल रहे हैं, जो पूरे एक सीजन का मुनाफा मटियामेट करने के लिए काफी है. छोटे और सीमांत किसानों के लिए, जिनके पास 85 फीसद से ज्यादा जोत है, यह झटके से कहीं ज्यादा है.

भारत का करीब 45 फीसद कार्यबल अभी भी खेती-किसानी से जुड़ा है, इसलिए ग्रामीण खपत पर भी असर पड़ने की आशंका है. ग्रामीण इलाके एफएमसीजी उपभोक्ता सामान से लेकर दोपहियों और शुरुआती स्तर के घरेलू उपकरणों जैसे क्षेत्रों में मांग का प्रमुख जरिया है.

खराब मौसम की मार को देखते हुए पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों, भगवंत मान और नायब सिंह सैनी, गुणवत्ता के नियमों में ढील देने, तेजी से खरीद करने और किसानों को मुआवजा देने की मांग कर रहे हैं. केंद्र ने पहली दो मांगों पर खुलेपन का संकेत दिया है. 

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