मौत के आगोश में हर तीसरा शिशु

बिहार में संसाधनों और ट्रेनिंग की कमी, बुरा रख-रखाव, और दूर-दराज के इलाकों में चिकित्सा सेवाओं की कमी का खामियाजा नवजात भुगत रहे. पिछले साल गई 1,400 की जान.

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बिहार में पिछले साल 1400 नवजातों की हुई मौत

गायघाट (मुजफ्फरपुर) के सुनील कुमार के नवजात पुत्र के लिए दो अप्रैल की सुबह जानलेवा साबित हुई. पैदा होने के फौरन बाद सांस लेने में कठिनाई की वजह से उसे 28 मार्च को अपने जिले के सबसे बड़े अस्पताल श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल (एसकेएमसीएच) के नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (नीकू) में भर्ती कराया गया था. पांच दिन की जद्दोजहद के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका.

वह उन सैकड़ों बच्चों में से है, जिन्हें इस अस्पताल का टर्शरी केयर यूनिट बचा पाने में नाकाम रहा है. 2025 के आंकड़े बताते हैं कि इस अस्पताल के नीकू में एडमिट होने वाले हर तीसरे बच्चे की मौत हुई है.

पिछले दिनों इस अस्पताल के नीकू वॉर्ड से आंकड़े सामने आए कि जनवरी, 2026 में यहां अब तक एडमिट 332 बच्चों में से 115 की मौत हो चुकी है. खबर की पड़ताल करने पर इंडिया टुडे को पता चला कि ये आंकड़े फर्जी नहीं हैं.

अस्पताल की पहली मंजिल पर बच्चों के लिए बने नीकू वॉर्ड के रास्ते में ऐसी कई औरतें बैठी मिलती हैं जो अपने घर पैदा हुए नवजात का इलाज कराने यहां आई थीं. वॉर्ड के भीतर 35 छोटे-छोटे बेड पर कई शिशु इलाजरत थे. एक-एक बेड पर दो से तीन शिशु तक थे.

वॉर्ड के स्टाफ की माने तो ''यहां यह स्थिति सामान्य है. बेड 35 ही हैं मगर साल के 80 फीसदी दिनों में यहां 60-70 शिशु एडमिट रहते हैं.’’ हैरतअंगेज यह है कि इन तमाम बच्चों को देखने के लिए छह से सात नर्सें ही थीं. बताया गया कि यहां हर शिफ्ट में कम से कम 12 नर्स होनी चाहिए, मगर हैं नहीं. जबकि आदर्श आइसीयू व्यवस्था में एक रोगी पर एक नर्स होनी चाहिए.

एसकेएमसीएच के शिशु रोग विभाग के प्रमुख डॉ. गोपाल शंकर सहनी ने इंडिया टुडे को साल 2025 के नीकू वॉर्ड के आंकड़े उपलब्ध कराए. बीते साल 4,129 शिशु भर्ती हुए थे, जिनमें से 1,401 की जान चली गई. यानी कि एक तिहाई से ज्यादा. हालांकि इन आंकड़ों से डॉ. सहनी बहुत परेशान नजर नहीं आते. वे कहते हैं, ''नीकू में शिशु मृत्यु दर अमूमन इतनी ही रहती है. 35 से 40 फीसदी.’’

हालांकि इस संबंध में राज्य स्वास्थ्य समिति ने इंडिया टुडे को आधिकारिक आंकड़े और जानकारी देने में सहयोग नहीं किया. भारत का नीकू में मृत्यु दर का राष्ट्रीय औसत सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है मगर हाल ही के दो अलग-अलग अध्ययन बताते हैं कि हरियाणा में यह 4.62 और छत्तीसगढ़ में 14.6 फीसद है. इस लिहाज से देखें तो मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच के आंकड़े काफी परेशान करने वाले हैं.

हालांकि बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति के 2025-26 के वार्षिक प्रतिवेदन में यह लिखा है कि राज्य में इस वक्त नीकू और एसएनसीयू (स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट) की कुल संख्या 45 है, जहां हर वर्ष औसतन 60,000-65,000 शिशु भर्ती होते हैं. इनमें 35 एसएनसीयू हैं और 10 नीकू. इनके अलावा राज्य में 41 रेफरल अस्पतालों में एनबीएसयू (न्यूबॉर्न स्टेबिलाइजेशन यूनिट) भी है. मगर इन तीन स्तर की इकाइयों में कितने बच्चों की मृत्यु होती है, यह आंकड़ा इस प्रतिवेदन में नहीं है.

बिहार के एसएनसीयू और नीकू की स्थिति को लेकर यूनिसेफ ने एक स्टडी कराई थी, जो नवंबर, 2023 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ साइंटिफिक रिसर्च में छपी भी. इस शोध की अगुआई करने वाले डॉ. अमिताभ रंजन इस संबंध में कई महत्वपूर्ण जानकारियां देते हैं.

वे बताते हैं, ''बिहार में नवजात शिशुओं को मृत्यु से बचाने के लिए यूनिसेफ के सहयोग से साल 2010 के आसपास बिहार में इन इकाइयों की शुरुआत हुई. इनके खुलने से काफी लाभ हुआ मगर कई वजहों से इन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली. इसलिए बिहार में इन इकाइयों में मृत्यु दर ज्यादा है.’’ अमिताभ इसकी चार वजहें बताते हैं, ''पहली, राज्य के किसी नीकू में सेप्सिस मैनेजमेंट की सुविधा नहीं है.

दूसरे, डॉक्टर और नर्स भी पर्याप्त नहीं. जो हैं, उन्हें अच्छी ट्रेनिंग नहीं मिली है. तीसरे, उपकरणों की कमी और मौजूदा उपकरणों का खराब मेंटेनेंस. ज्यादातर नीकू में वेंटिलेटर खराब मिलते हैं. चौथा और सबसे महत्वपूर्ण कारण: दूरदराज और ग्रामीण इलाकों की कमजोर इकाइयों का बोझ बड़े अस्पतालों पर पड़ता है.’’ डॉ. सहनी बताते हैं, ''हमारे यहां बेतिया, मोतिहारी, शिवहर, वैशाली और सीतामढ़ी के साथ नेपाल से भी मरीज आते हैं. यहां तक पहुंचते-पहुंचते अक्सर उनकी सांसें उखड़ने लगती हैं. हम उन्हें बचा नहीं पाते.’’

आंकड़े बताते हैं कि 2025 में उनके नीकू में उसी अस्पताल की पैदाइश वाले सिर्फ 1,043 बच्चे ही एडमिट हुए थे. बाकी 3,086 बाहर से रेफर होकर आए थे. इस तरह देखें तो बाहर से आए बच्चों की 39 फीसद मृत्य दर के मुकाबले इन-पेशेंट मृत्यु दर 21 फीसद के करीब है. हालांकि ये आंकड़े भी आदर्श नहीं हैं लेकिन साबित करते हैं कि दूरदराज के इलाकों के एसएनसीयू के ठीक से काम नहीं करने से बच्चों की मृत्यु दर बढ़ रही है. डॉ. रंजन की रिपोर्ट बताती है कि बिहार के सभी एसएनसीयू में शिशुओं की मृत्यु दर 14.48 फीसद है, जो मानक 10 फीसदी से ज्यादा है.

डॉ. रंजन बताते हैं, ''नवजात शिशुओं की मृत्यु की तीन बड़ी वजहें हैं: पहला सेप्सिस, दूसरा बर्थ एस्फिक्सिया यानी सांस लेने में तकलीफ और तीसरा समय से पहले जन्म.’’ नीकू में हाइजिन की कमी समस्या को और बड़ा बनाती है. वे कहते हैं, ''हम हर कदम पर एक लेवल नीचे हैं. नीकू का स्तर एसएनसीयू जैसा है और एसएनसीयू का एनबीएसयू (न्यू बॉर्न स्टैबलाइजेशन यूनिट) जैसा. बेहद संकटग्रस्त बच्चों की सर्जरी की लेवल फोर सुविधा तो बिहार में है ही नहीं.’’

इस संबंध में इंडिया टुडे ने जब राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यकारी निदेशक अमित कुमार पांडेय से मुलाकात की तो वे बोले, ''मुझे वक्त दें, इस संबंध में जानकारी जुटाकर आपको सूचित करूंगा.’’ लिखित में भेजे गए सवालों का उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया है. हालांकि कोई भी जवाब इस सच को नहीं बदल पाएगा कि सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की अक्षमता के चलते, बच्चों के पैदा होने के बधाई गीत, सैकड़ों परिवारों के लिए रुदन में बदल रहे हैं. 

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