रील बनाने वालों पर कसी लगाम!
हिमाचल प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के लिए सोशल मीडिया पर निजी वीडियो डालना अब मुश्किल. पहनावा भी अब नियम-कायदे से.

- रचना गुप्ता
हिमाचल प्रदेश में कर्मचारियों और अफसरों के कार्य करने के लचीले तौर-तौर तरीकों पर सरकार ने लगाम लगाने की तैयारी कर ली है. इसके तहत, फेसबुक-इंस्टाग्राम के लिए रील्स बनाने वाले कर्मचारी ही नहीं, अफसर भी नपेंगे. खासकर वे जो तथातथित मर्यादा लांघ रहे हैं. चाहे वह पहनावे का मामला हो या सोशल मीडिया में टीका-टिप्पणियों का.
सरकार ने हाल ही में सरकारी कर्मियों के लिए आचार-व्यवहार की संहिता की एक अधिसूचना जारी की है. इसके तहत दफ्तरों में फॉर्मल कपड़े पहनकर आना होगा. दफ्तरों में जींस टी-शर्ट पर पाबंदी लगा दी गई है और महिलाओं को सूट-सलवार या चूड़ीदार के साथ दुपट्टा पहनना अनिवार्य कर दिया है. सोशल मीडिया पर भी ऊटपटांग हरकतों पर भी नजर रखी जाएगी. यह अधिसूचना कार्मिक विभाग से चीफ सेक्रेटरी के माध्यम से जारी हुई है.
राज्य में 75 लाख की आबादी में यही कोई ढाई लाख सरकारी कर्मचारी हैं. इस संदर्भ में विवाद उस वक्त बढ़ा जब प्रदेश की राज्य प्रशासनिक सेवा की एक महिला अधिकारी ने अपनी निजी तस्वीरें, दफ्तर और गाडिय़ों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दीं और वे देखते-देखते वायरल हो गईं. उनकी रील्स पर काफी फॉलोअर बढ़ गए. अधिकारी के कसीदे गढ़ते कमेंट्स बढ़ते गए.
माना जाता रहा कि उक्त महिला अधिकारी ने इंस्टा या फेसबुक पर इसके लिए कैंपेन चलाया था. हालांकि इसके बाद संबंधित जिले के उपायुक्त ने एसडीएम साहिबा को नोटिस दिया, लेकिन सोशल मीडिया पर उनकी हरकतें जारी रहीं. मामला उस वक्त बिगड़ा जब वे जिम से अपनी कसरत करती हुई तस्वीरें डालने लगीं और साथ में प्रोटीन पाउडर और वजन घटाने के प्रोडक्ट्स का प्रचार करने लगीं. इसके बाद उन्हें दोबारा नोटिस दिया गया.
बात दरअसल एसडीएम तक ही सीमित नहीं थी. कई बड़े प्रशासनिक अफसरों की पत्नियां और कॉलेज की शिक्षिकाएं भी अपने नाच-गाने के वीडियो फेसबुक तथा इंस्टाग्राम पर धड़ल्ले से डाल रही थीं. कॉलेजों में धुरंधर फिल्म के गीत ''शरारत...’’ पर डांस पार्टियों के वीडियो भी सामने आए.
ऐसा ही एक और मामला एसीएस रैंक के एक अफसर के ड्राइवर का भी आया. उसने साहब को मिले छह विभागों में से एक के चेयरमैन पद की सुविधाओं के तहत मिली 50 लाख रु. की कीमती गाड़ी के साथ बॉलीवुड स्टाइल में तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालीं जो वायरल हो गईं. सूत्रों के मुताबिक, ऐसे हजारों मामले सरकार के ध्यान में शिकायतों के तौर पर लाए जा रहे थे.
बात बढ़ती ही जा रही थी. इसी बीच प्रदेश में पंचायत और स्थानीय निकायों के इस महीने होने वाले चुनाव के माहौल में कर्मचारियों की निजी तथा प्रत्यक्ष-परोक्ष किस्म की टिप्पणियां देखने को मिलीं. वजह, पंचायत चुनावों में कर्मचारियों के रिश्तेदार चुनाव लड़ रहे हैं.
इस दौरान, प्रदेश हाइकोर्ट में सुनवाई के दौरान भी कई कर्मियों के जींस और टी-शर्ट पहनकर अदालत जाने का मामला भी तूल पकड़ता जा रहा था. कुल मिलाकर, सरकार के लिए कर्मचारियों तथा अफसरों के अपने पद की गरिमा लांघने के मामले विभागीय नियंत्रण से बाहर हो गए थे. इसीलिए संयुक्त कार्मिक सचिव नीरज कुमार ने इसे उस वक्त जारी किया जब विधानसभा में बजट सत्र चल रहा था.
अधिसूचना के मुताबिक, पुरुष कर्मचारी ट्राउजर पैंट और कॉलर वाली शर्ट के साथ जूते या सैंडल पहनेंगे. महिला कर्मचारी साड़ी, लेडीज फॉर्मल सूट, सलवार/चूड़ीदार, कुर्ता-दुपट्टे के साथ पहनकर आएंगी. महिलाएं अगर ट्राउजर पैंट और शर्ट पहनेंगी तो उसके साथ सैंडल या जूते पहनना अनिवार्य होगा.
यानी कर्मचारी कार्यालय में जींस और टी-शर्ट नहीं पहन सकेंगे. सरकार के नुमाइंदों के मुताबिक, यह ड्रेस कोड सेवाओं में शालीनता और मर्यादा बनाए रखने और दफ्तरों के पहनावे को औपचारिक रखने के उद्देश्य से लाया गया है. इसके अलावा, सभी कर्मचारियों को अपनी साज-सज्जा और व्यक्तिगत स्वच्छता पर भी उचित ध्यान देना होगा.
सरकार ने पत्र में साफ किया कि भारत सरकार, गृह मंत्रालय के कंडक्ट रूल 1964 के नियम 3-सी के अंतर्गत यह प्रावधान है कि सरकारी सेवकों के आचरण नियमों के प्रावधान संविधान से मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं हैं. नियम 3(1)(iii) के अनुसार, सरकारी सेवक ऐसा कोई कार्य नहीं कर सकते जो एक सरकारी कर्मचारी के लिए अनुचित हो. किसी अनुचित आचरण या अशोभनीय व्यवहार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है.
सरकार के निर्देश हैं कि नियमों के अनुसार, राज्य सरकार के कर्मचारियों को कार्यस्थल के बाहर भी जिम्मेदार और शालीन आचरण बनाए रखना होगा तथा सरकारी नीतियों के अनुरूप कार्य करना होगा. किसी भी कर्मचारी के व्यक्तिगत सोशल मीडिया अकाउंट, ब्लॉग, स्टोरी या पोस्ट पर सरकारी नीतियों और मुद्दों से संबंधित कोई भी अनधिकृत टिप्पणी नुक्सान पहुंचा सकती है.
इसके अलावा, नियम 11 के अनुसार किसी भी आधिकारिक दस्तावेज या उसके किसी भाग को सीधे या परोक्ष रूप से किसी अनधिकृत व्यक्ति को भेजना निषेध है. नियम 8(3) के अनुसार, यदि कोई सरकारी कर्मचारी पुस्तक प्रकाशित करता है या सार्वजनिक आयोजन में भाग लेता है, तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि व्यक्त विचार उसके अपने हैं, सरकार के नहीं.
नियम 9 के तहत, किसी सरकारी कर्मचारी को ऐसा कोई सार्वजनिक वक्तव्य, संचार या तथ्य या मत व्यक्त करने से रोका गया है, जिससे वर्तमान या हाल की सरकारी नीति या कार्यवाही की आलोचना होती है. इसलिए सरकारी कर्मचारियों के सोशल मीडिया पर अपने विचार व्यक्त करने के संबंध में प्रतिबंध लागू होते हैं.
हिमाचल प्रदेश में इस अधिसूचना के जारी होने के बाद दफ्तरों में अब कर्मचारियों के कपड़ों में बदलाव नजर आ रहा है. साथ ही अब सार्वजनिक स्तर पर वे निजी कमेंट करने से गुरेज कर रहे हैं. खासकर कर्मचारी यूनियनों को इसके बाद बड़ा झटका लगा है.