गुर्दा बाजार के ये बेशर्म गुर्गे
गरीबों और पैसे की चाह वालों को फांस रहा शातिर डॉक्टरों और दल्लों का नेटवर्क. उनके गुर्दे अमीरों को महंगे बेच कर रहा मोटी कमाई. कई अस्पतालों की भूमिका संदेह के घेरे में.

कानपुर में 30 मार्च की रात सामने आया किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट महज एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी और संगठित अपराध के खतरनाक गठजोड़ की ऐसी कहानी है, जिसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इस पूरे मामले की शुरुआत एक मामूली-सी सूचना से हुई. कानपुर पुलिस को पिछले दिनों सुराग मिला था कि कुछ बाहरी लोगों को मेडिकल जांच के बाद सर्जरी के लिए तैयार किया जा रहा है.
इसके बदले उन्हें मोटी रकम देने का लालच दिया गया है. सूचना छोटी थी लेकिन शक गहरा. इसके बाद कानपुर पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने तीन हफ्ते तक लगातार निगरानी की. अलग-अलग अस्पतालों की गतिविधियों पर नजर रखी गई, संदिग्ध लोगों की पहचान हुई और आखिरकार 30 मार्च को कार्रवाई, जिसने इस पूरे काले कारोबार को उजागर कर दिया.
सबसे पहले कानपुर में कल्याणपुर के केशवपुरम स्थित आहूजा अस्पताल में छापा मारा गया. यहीं पर अवैध तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट किया गया था. यहां से डॉक्टर दंपती डॉ. प्रीति आहूजा-डॉ. सुरजीत और एक दलाल शिवम अग्रवाल उर्फ शिवम काड़ा को हिरासत में लिया गया. इसके बाद टीम ने कल्याणपुर स्थित प्रिया अस्पताल और पनकी रोड के मेडिलाइफ अस्पताल में भी छापे मारे.
इन दोनों अस्पतालों में क्रमश: किडनी रिसीवर पारुल तोमर और डोनर आयुष को भर्ती कराया गया था. यह साफ हो गया कि पूरा ऑपरेशन अलग-अलग अस्पतालों के जरिए चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा था, ताकि किसी को शक न हो. जांच आगे बढ़ी तो और भी चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई. यह एक-दो डॉक्टरों का काम नहीं, बल्कि पूरा नेटवर्क इसमें शामिल था: डॉक्टर, दलाल, टेक्नीशियन, एंबुलेंस चालक और यहां तक कि कुछ अस्पताल संचालक भी. नेटवर्क का तरीका बेहद व्यवस्थित था (देखें ग्राफिक्स).
पैसों के लिए बना डोनर
इस पूरे मामले का सबसे नाटकीय पहलू है डोनर आयुष की कहानी. बिहार का रहने वाला आयुष पैसों के लालच में इस नेटवर्क के संपर्क में आया. उसने पुलिस को बताया कि शिवम ने खुद को डॉक्टर बताकर उससे संपर्क किया और कहा कि एक छोटी सर्जरी के बदले उसे मोटी रकम मिलेगी. आयुष ने हामी भर दी. उसके अनुसार, उससे 10 लाख रुपए का सौदा तय हुआ था, लेकिन ऑपरेशन के बाद उसे करीब साढ़े नौ लाख रुपए ही दिए गए.
इसी बात को लेकर विवाद हुआ. आखिरकार उसने पुलिस को सूचना दी. शुरुआती जांच में पीडि़त नजर आने वाला बिहार के बेगूसराय का आयुष चौधरी बेहद शातिर है. उसने पुलिस को बताया था कि वह देहरादून स्थित ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी का एमबीए छात्र है. चौथे सेमेस्टर की फीस जमा करने के लिए उसने किडनी बेची है. उसकी दोनों ही कहानियां मनगढ़ंत निकलीं. उसके गांव गई पुलिस को पता चला कि आयुष ने दोस्तों और एयरहोस्टेस गर्लफ्रेंड के चक्कर में 18 बीघा जमीन बेच डाली थी. कानपुर के पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल के मुताबिक आरोपी साइबर ठगी के मामलों से भी जुड़ा है. पैसों का इंतजाम करने के लिए आयुष किडनी बेचने को राजी हुआ था.
बिना जांच भर्ती हुए मरीज
किडनी ट्रांसप्लांट की रिसीवर मुजफ्फरनगर के मौराना की रहने वाली 43 वर्षीय पारुल तोमर काफी समय से किडनी की समस्या से पीड़ित है. मेरठ के अल्फा अस्पताल में इलाज के दौरान वह किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट के संपर्क में आई और कानपुर में उसका ट्रांसप्लांट हुआ. उसके बाद पारुल को प्रिया अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां पोस्ट-ट्रांसप्लांट देखरेख की कोई व्यवस्था न थी. पारुल को गॉलब्लैडर में पथरी का मरीज दिखाकर भर्ती किया गया था.
आयुष भी इसी तरह मेडिलाइफ अस्पताल में बिना किसी लिखा-पढ़ी के भर्ती मिला था. इसी से पूरे रैकेट में प्रिया अस्पताल और मेडिलाइफ की संलिप्तता उजागर हुई. पुलिस ने आयुष और पारुल को लखनऊ के राममनोहर लोहिया इंस्टीट्यटू आफ मेडिकल साइंसेस में भर्ती करा दिया है जहां दोनों की हालत स्थिर है.
इस खेल का सबसे चौंकाने वाला पहलू इसका आर्थिक मॉडल है. डोनर को 8 से 10 लाख रुपए देने का वादा किया जाता लेकिन कई बार उसे 4 से 5 लाख रुपए में ही टरका दिया जाता. रिसीवर से 60 से 80 लाख रुपए तक वसूले जाते. यानी एक किडनी ट्रांसप्लांट पर 10 से 15 गुना तक का मुनाफा. यह अंतर ही इस पूरे अवैध कारोबार को जिंदा रखता है.
कई जिलों और विदेश तक जाल
किडनी ट्रांसप्लांट गिरोह की पहुंच सिर्फ कानपुर तक सीमित न थी. इसके तार लखनऊ, दिल्ली-एनसीआर, मेरठ, बिहार, पश्चिम बंगाल और यहां तक कि दक्षिण अफ्रीका तक जुड़े हुए थे. पुलिस को मिली जानकारी के मुताबिक गिरोह ने पिछले दो साल में अवैध ढंग से 12 से ज्यादा मरीजों को किडनी ट्रांसप्लांट की. असल संख्या इससे कहीं ज्यादा होने का अंदेशा है. तीन मार्च को आहूजा हॉस्पिटल में दक्षिण अफ्रीकी महिला अरेबिका को अवैध तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट की गई थी.
पुलिस ने गिरोह में शामिल इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) कानपुर की तत्कालीन उपाध्यक्ष डॉ. प्रीति आहूजा, उसके पति डॉ. सुरजीत, दलाल शिवम अग्रवाल और तीन अस्पताल संचालकों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है. कानपुर पुलिस ने 15 आरोपियों के खिलाफ मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम की धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की है. गिरफ्तार आरोपियों में मेडिलाइफ हॉस्पिटल के संचालक राजेश कुशवाहा और रामप्रकाश, प्रिया हॉस्पिटल का संचालक नरेंद्र सिंह शामिल हैं.
आहूजा अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट करने वाले डॉ. रोहित, डा. अफजल, डॉ. वैभव और डॉ. अनुराग की तलाश की जा रही है. डॉ. अफजल और अन्य आरोपी टेलीग्राम चैनल के माध्यम से एक दूसरे के संपर्क में रहते थे. डॉ. अफजल, डॉ. वैभव और डॉ. अनुराग के मेरठ के गढ़ रोड स्थित अल्फा अस्पताल में भी सेवाएं देने की बात सामने आई है. कानपुर के कांड में डोनर आयुष को मेरठ के अल्फा अस्पताल में एक दिन के लिए भर्ती किया गया था. जहां मेडिकल टेस्ट किए गए थे. मेरठ के मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. अशोक कटारिया ने उसके संचालक को नोटिस भेजकर जवाबतलब किया है.
कदम-कदम पर फर्जीवाड़ा
इस पूरे नेटवर्क का सबसे अहम चेहरा था महज आठवीं पास शिवम अग्रवाल. बताता वह खुद को डॉक्टर था. गले में आला लटकाए हुए मरीजों और परिजनों से बात करना, भरोसा जीतना और फिर सौदा तय करना. वह टेलीग्राम ग्रप के जरिए लोगों को फांसता था.
शिवम हर ट्रांसप्लांट में मोटा कमीशन लेता और अस्पतालों तथा डॉक्टरों के बीच कड़ी का काम करता. पुलिस को शिवम के मोबाइल से मिले एक वीडियो से अमृतसर के तरन-तारन निवासी मनजिंदर से 43 लाख रुपए लेने के बाद भी ट्रांसप्लांट न करने की जानकारी मिली है. साफ है कि यह रैकेट कई प्रदेशों में फैला हुआ था. आहूजा अस्पताल में अवैध किडनी ट्रांसप्लांट के आरोपी ऑपरेशन थिएटर (ओटी) टेक्नीशियन भी कानपुर पुलिस के हत्थे चढ़ चुके हैं.
राजेश नोएडा के सर्वोदय हॉस्पिटल और कुलदीप गाजियाबाद के शांति गोपाल नर्सिंगहोम (इंदिरापुरम) में ओटी टेक्नीशियन है. कानपुर के डीसीपी पश्चिम एमएम कासिम आबिदी ने बताया कि राजेश और कुलदीप हर केस के 40,000-50,000 रुपए लेते थे. उनकी जिम्मेदारी गुर्दा प्रत्यारोपण से पहले संसाधन मुहैया कराना और पूरी तैयारी रखना था.’’
कुलदीप और राजेश ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि चार माह पहले दिसंबर 2025 में भी आहूजा हॉस्पिटल के अलावा मेडिलाइफ हॉस्पिटल में एक महिला मरीज की किडनी ट्रांसप्लांट की गई थी. कासिम आबिदी के मुताबिक, मेडिलाइफ हॉस्पिटल में हुए ट्रांसप्लांट में महिला मरीज और डोनर की जानकारी की जा रही है. जनवरी 2026 में किसी मरीज की मौत होने पर सीएमओ कार्यालय ने मेडिलाइफ अस्पताल सील कर दिया था. सील अस्पताल को खोले जाने पर भी कानपुर के सीएमओ कार्यालय पर सवाल उठे हैं.
आहूजा अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट अवैध कारोबार की धुरी डॉ. रोहित पुलिस के लिए पहेली बन चुका है. उसके आधार कार्ड के पते के सहारे पुलिस उसकी तलाश करते-करते गाजियाबाद के इंदिरापुरम स्थित न्यायखंड-1 में उसके फ्लैट तक पहुंची लेकिन वहां ताला लगा मिला. पुलिस का अनुमान है कि रोहित के नाम से कोई दूसरा डॉक्टर कानपुर आकर किडनी ट्रांसप्लांट कर रहा है. रोहित ने आधार कार्ड भी फर्जी पते पर बनवाया है.
स्वास्थ्य विभाग पर उठे सवाल
किडनी कांड कानपुर शहर के लिए नया नहीं है. आठ साल पहले फरवरी 2019 में भी शहर में ऐसा कांड चर्चा में आया था. कानपुर के साकेत नगर में रह रहीं एक इलेक्ट्रीशियन की पत्नी संगीता देवी कश्यप ने बर्रा थाने में जबरन किडनी देने का दबाव बनाने वाले कुछ लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी. तब कानपुर से छह लोग गिरफ्तार किए गए थे. दिल्ली के दो बड़े अस्पतालों का नाम भी सामने आया था जहां अवैध किडनी ट्रांसप्लांट किया जाना था. इस मामले में 12 लोगों की गिरफ्तारी की गई थी. हालांकि विवेचना के दौरान कोई ठोस सुबूत न मिलने के कारण सभी आरोपी डॉक्टरों के नाम हट गए थे.
कानपुर किडनी ट्रांसप्लांट कांड में स्वास्थ्य महकमे की भूमिका भी कम संदिग्ध नहीं. पुलिस अधिकारियों के अनुसार, कुछेक महीने पहले ही आहूजा अस्पताल में अवैध गतिविधियों की सूचना महकमे को दी गई थी लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई. यहां तक कि छापेमारी के बाद भी अस्पताल को तुरंत सील नहीं किया गया.
सीएमओ हरिदत्त नेमी का बयान आया: ''हमारे पास इतने संसाधन नहीं कि हर अस्पताल की जांच कर सकें.’’ यह अपने आप में ही सिस्टम की खामियों की पोल खोलता है. इस रैकेट ने यह भी साफ कर दिया है कि अपराधी अब अंधेरे में नहीं बल्कि सिस्टम में पैठ बनाते हुए खुलकर खेल रहे हैं. और जब तक सिस्टम खुद जागरूक नहीं होगा, 'गुर्दा बाजार’ बंद नहीं होंगे—बस उनका तरीका और जगह बदलती रहेगी.