कुछ और पसरे यूसीसी के पांव

हिंदुत्व की राजनीति का मूल गढ़ माने जाने वाला गुजरात अब यूनिफॉर्म सिविल कोड के दूसरे ड्राफ्ट पर प्रयोग करने जा रहा. यह उत्तराखंड के मॉडल से थोड़ा अलग और ज्यादा परिष्कृत जरूर है लेकिन संवैधानिक आजादी से जुड़े कुछ बड़े सवाल अब भी बने हुए

इलस्ट्रेशन: राज वर्मा

इसे आप यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) या समान नागरिक संहिता का 'बीटा प्रोटोटाइप' कह सकते हैं, जो उत्तराखंड के पायलट वर्जन से एक कदम आगे है. इसे टेस्ट करने के लिए असली लेकिन नियंत्रित माहौल की जरूरत थी. इस तरह हिंदुत्व की मूल प्रयोगशाला गुजरात इसे लागू करने की दिशा में बढ़ने वाला देश का दूसरा राज्य बन गया है.

गुजरात यूनिफॉर्म सिविल कोड (जीयूसीसी), 2026 को 24-25 मार्च को विधानसभा ने पास किया. यह लिव-इन रिलेशनशिप, विरासत, शादी, तलाक और परिवार से जुड़े कानूनों को एक ही ढांचे में लाने की कोशिश करता है. यह राज्य के साथ ही भारत के लिए भी एक जटिल क्षेत्र में शुरुआती कदम है, जहां संवैधानिक टकराव से जुड़े सवाल अब भी अनुत्तरित हैं.

एक से ज्यादा शादी पर रोक
इस बिल में कई बड़े बदलाव किए गए हैं. लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन जरूरी होगा. ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चों को कानूनी मान्यता दी जाएगी. विरासत के नियम एक जैसे होंगे. एक से ज्यादा शादी यानी पॉलिगैमी पर रोक लगाई गई है. शादी की न्यूनतम उम्र भी तय रखी गई है—पुरुषों के लिए 21 साल और महिलाओं के लिए 18 साल. इन प्रावधानों में कई बातें शरिया कानून से अलग हैं. खासकर पॉलिगैमी और विरासत के मामले में, जहां पहले नियम अलग थे. अब एक जेंडर-न्यूट्रल ढांचा लाकर धर्म के आधार पर चलने वाले पर्सनल लॉ को किनारे किया जा रहा है, कम से कम उन लोगों के लिए जिन पर यह कानून लागू होगा.

लिव-इन? पहले बताना होगा
गुजरात के इस बिल का ढांचा उत्तराखंड के 2024 वाले यूसीसी मॉडल से ज्यादा विस्तृत है. इसमें लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन, मेंटेनेंस, इसके खत्म होने और प्रशासनिक निगरानी तक के लिए साफ नियम बनाए गए हैं. लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे निजी जिंदगी में सरकारी दखल बढ़ सकता है. 

कांग्रेस ने इसके इरादे और मौके पर सवाल उठाए. उसका कहना है कि शहरी निकाय चुनाव से ठीक पहले इसे जल्दी में पास किया गया. प्रदेश अध्यक्ष अमित चावड़ा ने विधानसभा में कहा कि एक लाख से ज्यादा सुझाव और आपत्तियों को अनदेखा किया गया. वहीं ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआइएमआइएम) ने 29 मार्च को सड़क पर उतरकर विरोध किया. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष साबिर काबलीवाला ने सवाल उठाया, ''अगर यह सच में 'यूनिफॉर्म' है, तो आदिवासियों को बाहर क्यों रखा गया?'' वहीं माइनॉरिटी कोऑर्डिनेशन कमेटी के संयोजक मुजाहिद नफीस का कहना है कि यह कानून धार्मिक आजादी को कमजोर करता है और इसे अदालत में चुनौती दी जाएगी.

बराबरी का तर्क लेकिन बहस जारी
विधानसभा में बिल का बचाव करते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा, ''यह बिल समान न्याय देगा और महिलाओं की बराबरी सुनिश्चित करेगा.'' इस बात से आंशिक सहमति सामाजिक कार्यकर्ता जाकिया सोमन ने भी जताई, जो भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापक हैं. उनका मानना है कि यह कानून मुस्लिम महिलाओं को पॉलिगैमी, विरासत और शादी की उम्र जैसे मुद्दों पर मजबूत बना सकता है. लेकिन वे लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन को लेकर असहज हैं. उनका कहना है कि यह हर व्यक्ति की निजी आजादी के संवैधानिक अधिकार के खिलाफ जा सकता है. वे कहती हैं कि अगर यह कानून धर्म के असर को हटाकर जेंडर जस्टिस लाना चाहता है, तो क्या यह उसकी जगह राज्य की एक नई तरह की ताकत को खड़ा नहीं कर रहा. उनके मुताबिक, ''इस कानून के आसपास जो राजनैतिक बयानबाजी हो रही है, उससे लगता है कि असली मकसद महिला सशक्तिकरण है या कुछ और, यह साफ नहीं.''

तीन तलाक के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ चुकीं सोमन एक और मुद्दे की तरफ ध्यान दिलाती हैं. गुजरात मैरिज रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, 2006 में प्रस्तावित संशोधन के तहत शादी रजिस्टर कराने के लिए माता-पिता की सहमति जरूरी करने की बात कही गई है. वे इसे महिलाओं के लिए एक कदम पीछे जाने जैसा मानती हैं.

कानूनी लड़ाई की राह
गुजरात यूनिफॉर्म सिविल कोड की नींव उस कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी है, जिसे राज्य सरकार ने 2025 में बनाया था. इस कमेटी की जिम्मेदारी थी यह देखना कि यूसीसी लागू करना कितना संभव है और कैसे लागू किया जा सकता है. इसकी अगुआई पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज रंजना देसाई ने की. कमेटी में पूर्व आइएएस अधिकारी सी.एल. मीणा, वकील आर.सी. कोडेकर, शिक्षाविद दक्षेश ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता गीता श्रॉफ शामिल थे. करीब एक साल तक इस पैनल ने कानूनी विशेषज्ञों, सिविल सोसाइटी और अलग-अलग पक्षों से बातचीत की और 17 मार्च को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी. इसके अगले ही दिन बिल विधानसभा में पेश कर दिया गया.

देसाई की भूमिका यूसीसी के पूरे ढांचे में खास मानी जा रही है. उन्होंने उत्तराखंड के लिए यूसीसी ड्राफ्ट तैयार करने वाली कमेटी की भी अगुआई की थी. यानी दोनों राज्यों के कानूनों में जो समानताएं दिखती हैं, खासकर लिव-इन रिलेशनशिप पर सरकारी निगरानी जैसे विवादित प्रावधान, उनमें यह निरंतरता साफ नजर आती है. हालांकि, आगे की राह आसान नहीं दिखती. जिस तरह से इस कानून को लेकर बहस और विरोध सामने आ रहा है, उससे साफ है कि अगला बड़ा टकराव अदालतों में हो सकता है. यानी यह मुद्दा अब सियासत से आगे बढ़कर कानूनी लड़ाई का रूप भी ले सकता है. 

Read more!