'इंतजार शास्त्र' पर चलता शास्त्रार्थ
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 'इंतजार शास्त्र' शब्द को सिर्फ तंज के तौर पर नहीं उछाला, बल्कि उसे एक सुनियोजित राजनैतिक अभियान में बदल दिया है.

राजस्थान की राजनीति में इन दिनों एक नया सियासी मुहावरा जन्म ले चुका है: 'इंतजार शास्त्र'. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस शब्द को सिर्फ तंज के तौर पर नहीं उछाला, बल्कि उसे एक सुनियोजित राजनैतिक अभियान में बदल दिया है.
दरअसल, बीते कुछ दिनों से वे लगातार सोशल मीडिया पर 'इंतजार शास्त्र' नाम से एक सीरीज चला रहे हैं और इसका एक-एक चैप्टर जारी कर रहे हैं. इसके हर चैप्टर में वे भजनलाल सरकार से एक नया सवाल पूछ रहे हैं.
असल सवाल यह है कि जिन योजनाओं को जनता के नाम पर शुरू किया गया, उनका इंतजार आखिर कब खत्म होगा. गहलोत की इस सीरीज की सबसे अहम बात यह है कि इसमें बड़े वैचारिक हमले नहीं हैं. न धर्म की बहस है, न जाति का कार्ड, न दिल्ली बनाम जयपुर की राजनीति. यहां पूरा फोकस गवर्नेंस पर है: अस्पताल क्यों अधूरे हैं? विश्वविद्यालय अपने भवन के बिना क्यों चल रहे हैं?
गेस्ट हाउस क्यों नहीं बन रहा? कोचिंग हब बन गया तो उसमें कोचिंग क्यों नहीं पहुंची? क्रिकेट स्टेडियम की बाउंड्री क्यों खड़ी नहीं हो पाई? यानी गहलोत ने उस जगह हमला किया है, जहां सरकार सबसे ज्यादा असहज होती है: कामकाज और डिलिवरी.
यही वजह है कि 'इंतजार शास्त्र' ने भाजपा को भी जल्दी जवाब देने पर मजबूर कर दिया. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने इसे 'झूठ का शास्त्र' बताया. उनका कहना है कि गहलोत अपनी पार्टी में घटती अहमियत से परेशान हैं और खुद को चर्चा में रखने के लिए ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने तो गहलोत को 'वानप्रस्थ शास्त्र' अपनाने तक की सलाह दे डाली. मगर इन पलटवारों के बीच एक बात साफ दिख रही है: गहलोत का उछाला हुआ शब्द सत्ता के गलियारों तक पहुंच चुका है.
असल में इस सीरीज की शुरुआत 23 मार्च को हुई. इसके पहले चैप्टर में गहलोत ने जयपुर के जेएलएन मार्ग पर बने महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ गवर्नेंस ऐंड सोशल साइंसेज का मामला उठाया. यह संस्थान बनकर तैयार हो चुका है मगर दो साल बाद भी यहां काम शुरू नहीं हो पाया. गहलोत ने इसे पहला उदाहरण बनाया कि कैसे इमारतें खड़ी हैं लेकिन उनके भीतर जीवन नहीं है. इसके अगले दिन सवाई मानसिंह अस्पताल के आइपीडी टावर का मुद्दा सामने आया.
400 करोड़ रुपए से शुरू हुआ यह 1,200 बेड का प्रोजेक्ट अब 764 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है और तय समयसीमा से काफी पीछे चल रहा है. भाजपा से जवाब आया कि पिछली सरकार ने बिना पूरी तैयारी के काम शुरू किया था और मौजूदा सरकार उसे सुधार रही है.
इसके बाद महिला चिकित्सालय के आइपीडी टावर की देरी को मुद्दा बनाया गया. फिर जयपुर के चारों कोनों में बनने वाले चार सैटेलाइट अस्पतालों का मामला उठा. गहलोत ने आरोप लगाया कि एसएमएस अस्पताल पर दबाव कम करने के लिए शुरू की गई योजना को मौजूदा सरकार ने कमजोर कर दिया और दो प्रोजेक्ट तो रद्द ही कर दिए.
इसके अगले चैप्टर में सिविल लाइंस फाटक पर बनने वाले आरओबी की देरी को उठाया गया. रोज 20,000 वाहनों की आवाजाही वाले इस रास्ते का अधूरा काम आम आदमी की परेशानी से सीधा जुड़ता है. यही इस नैरेटिव की ताकत है.
गहलोत यहीं नहीं रुके. राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (आरसीए) के नए क्रिकेट स्टेडियम को लेकर उन्होंने कहा कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी यह परियोजना ठंडे बस्ते में है. कोचिंग हब को लेकर उन्होंने सवाल उठाया कि जब इमारत बन गई, उद्घाटन हो गया, तो कोचिंग संस्थानों की शिफ्टिंग क्यों नहीं हुई? जयपुर और जोधपुर के दिव्यांग विश्वविद्यालयों को लेकर भी उन्होंने सरकार को घेरा.
एक विश्वविद्यालय दो कमरों में चल रहा है, दूसरे में दाखिला तक शुरू नहीं हो पाया है. फिर, राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर के गेस्ट हाउस की देरी को मुद्दा बनाया गया. यानी अस्पताल, शिक्षा, खेल से लेकर शहरी ढांचे तक, गहलोत ने इंतजार का एक पूरा नक्शा खींच दिया है. यही वजह है कि 'इंतजार शास्त्र' एक असरदार नैरेटिव बनता दिख रहा. इसमें शोर कम है मगर चुभन ज्यादा. गहलोत इसके जरिए यह भी बताना चाहते हैं कि भाजपा की डबल इंजन सरकार जिस तेज विकास का दावा करती है, जमीन पर उसकी चाल वैसी नहीं दिखती.
राजनैतिक जानकार डॉ. गजेंद्र सिंह का कहना है कि 'इंतजार शास्त्र' सरीखे नैरेटिव इस बात का संकेत हैं कि अब सियासी बहसें प्रतीकात्मक मुद्दों से हटकर गवर्नेंस और डिलिवरी पर केंद्रित हो रही हैं. वे कहते हैं, ''यही बात इस पूरे अभियान को दिलचस्प बनाती है. राजस्थान में अब लड़ाई केवल आरोप और उसके जवाब की नहीं रह गई है. लड़ाई इस बात की है कि जनता को आखिर कौन यह यकीन दिला पाएगा कि उसका इंतजार खत्म होगा.''
आने वाले दिनों में गहलोत इस सीरीज के और अध्याय ला सकते हैं. भाजपा भी पलटवार तेज करेगी. मगर फिलहाल इतना तय है कि गहलोत के इस मजबूत सियासी हथियार ने भजनलाल सरकार को बचाव की मुद्रा में ला दिया है.