नौकरशाही के आगे बेबस सरकार
हिमाचल प्रदेश के मुख्य सचिव संजय गुप्ता ने कुछ पूर्व मुख्य सचिवों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर ब्यूरोक्रेसी को कटघरे में खड़ा कर दिया. ऐसे में पहले से ही आर्थिक मुश्किलों में घिरी राज्य सरकार को भारी फजीहत का सामना करना पड़ रहा

रचना गुप्ता
हिमाचल प्रदेश में एक ओर बजट सत्र चल रहा था, तो दूसरी ओर राज्य के मुख्य सचिव संजय गुप्ता ने हिमाचल प्रदेश की अपनी ही ब्यूरोक्रेसी को कटघरे में खड़ा कर दिया. दरअसल, उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके पूर्व मुख्य सचिवों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगा दिए. यह वाकया ऐसे वक्त में हुआ जब राज्य इन दिनों वित्तीय मुसीबतों से जूझ रहा है और केंद्र ने इसके राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को बंद कर दिया है. ऐसे में वित्तीय संकट के बीच नौकरशाही की जंग भी उजागर हो गई है.
गुप्ता ने मुख्य रूप से चार पूर्व मुख्य सचिवों पर आरोप लगाए हैं. इनमें भाजपा से लेकर कांग्रेस सरकार में मुख्य सचिव रह चुके नौकरशाह शामिल हैं. अब स्थिति यह है कि इन अधिकारियों ने एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. गुप्ता ने पूर्व की भाजपा सरकार के दो पूर्व मुख्य सचिवों का सीधा नाम लेकर बताया कि उन्होंने उन पुराने अधिकारियों के कार्यकाल में हुए घोटालों एवं भ्रष्टाचार की लिखित शिकायत प्रदेश के साथ-साथ केंद्र सरकार से की है.
दरअसल, जब 2022 में कांग्रेस सत्ता में आई तब आर.डी. धीमान प्रदेश के मुख्य सचिव थे. वे उससे पहले की भाजपा सरकार से इस पद पर मौजूद थे. कांग्रेस ने सरकार में आते ही उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त बना दिया. फिर, यूपी से आने वाले प्रबोध सक्सेना को मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने मुख्य सचिव बना दिया, जबकि वरिष्ठता में गुप्ता ऊपर थे. यहीं से नौकरशाही का खेल शुरू हुआ. प्रबोध को न सिर्फ मुख्य सचिव बनाया गया, बल्कि उन्हें सुक्खू सरकार ने इस पद पर एक्सटेंशन भी दिया. और, गुप्ता फिर पीछे कर दिए गए.
गुप्ता का आरोप है कि पूर्व मुख्य सचिव ने उनके खिलाफ ऐसा षड्यंत्र रचा. प्रबोध को रिटायरमेंट के बाद सुक्खू ने बिजली बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया, तो धीमान सीआइसी से रेरा अध्यक्ष बन गए. वहीं, भाजपा सरकार में मुख्य सचिव रहे राम सुभाग सिंह को सुक्खू ने ऐडवाइजर बना दिया. विडंबना कि सुक्खू ने विपक्ष में रहते हुए सुभाग पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए उन्हें हटाने की मांग की थी और भाजपा ने उन्हें हटा भी दिया था.
जाहिर है, प्रदेश में पिछले सात-आठ साल में जो पांच मुख्य सचिव रहे, उन पर विवाद होते रहे हैं. फिर भी, उन्हें रिटायरमेंट के बाद अहम पदों पर बैठाकर मानो पुरस्कृत किया गया. वहीं, इस झगड़े में प्रबोध और गुप्ता सीधे आमने-सामने हैं. प्रबोध केंद्र सरकार के निशाने पर तब से थे, जब वे पी. चिदंबरम के साथ मंत्रालय में थे. उन पर आरोप लगे, जांच हुई और उनकी पेंशन बंद करने की सिफारिश की है. अभी प्रदेश में बिजली बोर्ड के अध्यक्ष प्रबोध पर गुप्ता का आरोप है कि वे अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के कामकाज में दखल देते हैं.
वहीं, भाजपा कह रही है कि यह दिखाता है कि सरकार के संरक्षण में भ्रष्टाचार पल रहा है. विपक्ष के नेता सतपाल सत्ती ने इसकी निष्पक्ष जांच की मांग की है. पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा, ''मुख्यमंत्री भ्रष्ट अधिकारियों के मकड़जाल में हैं. जिसे हमने हटाया उसे ही उन्होंने प्रिंसिपल एडवाइजर बना दिया.'' मगर, उन्होंने प्रबोध या धीमान का नाम लेने से गुरेज किया है. दरअसल, जयराम मुख्यमंत्री थे तब प्रबोध वित्त सचिव थे. प्रदेश के कर्ज में बुरी तरह जकड़ने के पीछे जयराम सरकार एवं इन अफसरों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं.
वहीं, सुक्खू कहते हैं, ''मेरी सरकार में मैं किसी भी तरह का भ्रष्टाचार सहन नहीं करता. कानून अपना काम करता है.'' मगर, गुप्ता के आरोपों पर उन्होंने भी अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है. जाहिर है, सरकार भाजपा की हो या कांग्रेस की, नौकरशाही के सामने बेबस नजर आ रही. मगर, इसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है.