बेटियों का जीते जी 'अंतिम संस्कार'
राजस्थान के मेवाड़ संभाग में पनप रही अपनी मर्जी से विवाह करने वाली बेटियों का जीते जी अस्तित्व मिटाने की परंपरा. दूसरी ओर बेटों के प्रेम विवाह पर पूरी तरह खामोशी का आलम

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के आमल्दा गांव में अपनी बेटी के प्रेम विवाह से आहत एक पिता ने उसे जीते-जी 'मृत' घोषित कर दिया. स्थानीय राजनीति में सक्रिय पिता ने पहले तो बेटी को मनाने की हरसंभव कोशिश की, समझाया-बुझाया, यहां तक कि गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज करवाई.
पुलिस थाने से भी बेटी पर अपने फैसले से पलटने के लिए दबाव बनाया गया. जब वह अडिग रही तो पिता ने शोक संदेश छपवाकर 22 मार्च को तीए की बैठक और 31 मार्च को मृत्युभोज की घोषणा कर दी.
जयपुर में रहकर प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रही आकांक्षा कानावत ने करीब आठ महीने पहले अपनी पसंद के युवक से आर्य समाज के नियमों से शादी की थी. ऐसा ही मामला उदयपुर जिले के वासखेड़ा गांव से सामने आया.
इस गांव की जमना कंवर ने अपने पूर्व पति का दस साल पुराना साथ छोड़कर अपनी मर्जी से उसी गांव के दूसरे युवक से 'नाता विवाह' कर लिया. राजस्थान में सामाजिक परंपराओं के तहत महिला को उसकी पसंद के व्यक्ति से 'नाता विवाह' करने की छूट है. इसके बदले जिस व्यक्ति से नाता विवाह किया जा रहा है उसे पूर्व पति, महिला के पिता, पंच पटेल और गांव के देवता के नाम झगड़ा राशि देनी पड़ती है.
झगड़ा राशि कितनी होगी यह समाज के पंच पटेल तय करते हैं. लेकिन नाराज पिता ने मृत्यु पत्रिका छपवाने के साथ ही मुंडन और गौरणी धूप दस्तूर (मेवाड़ में बेटी की मौत के बाद पीहर पक्ष की ओर से निभाई जाने वाली परंपरा) जैसे आयोजन भी कर डाले. 14 जनवरी, मकर संक्राति के दिन पीहर पक्ष ने मृत्युभोज का भी आयोजन किया. हालांकि, राजस्थान में मृत्यु भोज के खिलाफ कानून बना हुआ है मगर ग्रामीण क्षेत्रों में धड़ल्ले से इस तरह के आयोजन हो रहे हैं.
राजस्थान में पिछले कुछ अरसे में इस तरह के मामलों में खासी बढ़ोतरी हुई है. खासकर मेवाड़ संभाग (उदयपुर, राजसमंद, भीलवाड़ा) में, जहां मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले तीन साल में 48 बेटियां मृत घोषित की जा चुकी हैं. अलग-अलग जिलों से लगातार सामने आ रही ये खबरें एक खतरनाक सामाजिक प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं.
इंडिया टुडे ने जब जमीनी स्तर पर ऐसे मामलों की पड़ताल की तो एक कड़वी सचाई उभरकर सामने आई. वह यह कि बेटियों के अपनी इच्छा से विवाह करने पर 'इज्जत' का स्यापा खड़ा कर देने वाला समाज बेटों के प्रेम विवाह पर रहस्यमयी खामोशी ओढ़ लेता है.
भीलवाड़ा जिले के ब्राह्मणों की सरेरी गांव में तो एक बेटी का स्वेच्छा से विवाह करना समाज के पंच पटेलों को इतना नागवार गुजरा कि पूरे गांव की बेटियों पर प्रेम विवाह न करने का फरमान लाद दिया गया क्योंकि इसी गांव की पूजा जोशी ने अपनी पसंद के युवक से 'नाता विवाह' रचा लिया था. 29 जुलाई, 2025 को पूजा ने अपने पति को छोड़कर देवर के साथ 'नाता विवाह' कर लिया था. पूजा के पिता ने उसे जीते जी मृत घोषित कर दिया और 12 दिन तक घर पर शोक सभा तथा अंतिम संस्कार के अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया.
बारहवें पर जुटे पंच पटेलों ने तय किया कि कि भविष्य में गांव की कोई भी लड़की घरवालों की मर्जी के खिलाफ शादी करेगी तो उसे सामाजिक तौर पर बहिष्कृत और जीते जी मृत घोषित किया जाएगा. इंडिया टुडे ने गांव के पंच पटेल लक्ष्मीनारायण सारस्वत और लक्ष्मीनारायण ओझा से इस संबंध में बातचीत की तो उन्होंने कहा, ''हमने यह फैसला किया है कि हमारे गांव में लड़कियां अपने घरवालों की मर्जी से ही शादी कर सकती हैं. अगर कोई बिना मर्जी के शादी करेगी तो वह हमारे लिए मर गई. हम उसका जीते जी मौसर (मृत्युभोज) और सामाजिक बहिष्कार करेंगे.''
जब उनसे यह पूछा गया कि क्या प्रेम विवाह करने वाले बेटों पर भी यह नियम लागू होगा? तो उन्होंने कहा, ''अभी हमने लड़कियों के लिए यह नियम बनाया है.'' यह दोहरा व्यवहार बताता है कि आज भी लोग बेटियों के ऊपर परिवार की 'इज्जत' होने का बोझ लादकर उनकी स्वतंत्रता छीन रहे हैं. पंच पटेलों ने यह भी कहा, ''सरकार को भी माता-पिता की मर्जी के खिलाफ शादी करने वालों के विरुद्ध कानून बनाकर इस मुहिम में हमारा साथ देना चाहिए. सरकार को बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारों की जगह संस्कृति को बचाने की पहल करनी चाहिए.''
प्रेम विवाह के इन मामलों में बेटे और बेटियों के साथ भेदभाव वाली सामाजिक प्रवृत्ति पर पुलिस और प्रशासन की चुप्पी भी समझ से परे है. पछले तीन-चार वर्षों में पुलिस ने ऐसे मामलों को रोकने की जहमत उठाना तो दूर, उनका संज्ञान तक नहीं लिया. ऐसे आयोजनों को रोकने के लिए 65 साल पहले ही 'राजस्थान मृत्युभोज निवारण अधिनियम 1960' बना दिया गया था मगर हकीकत हमारे सामने है.
पंच पटेलों के ये फरमान बेटियों पर किस कदर कहर बन रहे हैं, इसकी बानगी उदयपुर जिले के सायरा ब्लॉक के सुआवतों का गुढ़ा गांव में भी देखने को मिली. इस गांव की मनीषा ने मई 2024 में पास ही के पदारड़ा गांव के रहने वाले दीपक नामक युवक से प्रेम विवाह किया था. बेटी के इस फैसले को पिता और समाज ने 'अक्षम्य अपराध' मान लिया. नतीजा यह हुआ कि उसे जिंदा रहते हुए 'मृत' घोषित कर दिया गया.
शोक संदेश छपवाए गए और उससे सारे रिश्ते तोड़ लिए गए. लेकिन इस फैसले की कीमत मनीषा की छोटी बहन खुशी ने भी अपने सामाजिक बहिष्कार के रूप में चुकाई. खुशी उस वक्त नौवीं कक्षा में पढ़ रही थी मगर गांव और समाज के ताने इतने असहनीय हो गए कि उसे बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी. पिता ने उसकी दुनिया घर की चारदीवारी तक सीमित कर दी. आज खुशी और उसकी दादी केशीबाई उसी घर में एक तरह की 'कैद' में जिंदगी गुजार रही हैं. मनीषा का नाम सुनते ही दोनों की आंखें नम हो जाती हैं.
इस सामाजिक प्रवृत्ति पर समाजशास्त्री राजीव गुप्ता कहते हैं, ''आज भी समाज की ऊंची जातियां विवाह संबंधों को लेकर अपना पुरुषवादी और रुढ़िवादी चरित्र नहीं छोड़ पा रही हैं. बेटी के प्रेम विवाह अथवा नाता विवाह करने पर शोक सभा, मृत्युभोज जैसे आयोजन करना महिला स्वतंत्रता, स्वायत्तता पर गहरी चोट और उसे सार्वजनिक तौर पर दंडित किए जाने का कदम है.'' गुप्ता मानते हैं कि ऐसा कर पितृसत्तात्मक परिवारमहिलाओं से उनकी 'चॉइस' और संवैधानिक अधिकार छीन लेना चाहते हैं.
गुप्ता यह भी कहते हैं, ''सामाजिक तौर पर पिछड़े समाजों ने तो नाता विवाह को मान्यता दे दी थी मगर पुरुषवादी वर्चस्व की शिकार उच्च जातियां विवाह संबंधों की संकीर्णतावादी सोच से अभी बाहर नहीं निकल पाई हैं. महिलाओं के मानसिक और सामाजिक तौर पर उत्पीड़न का यह तरीका पुरूषों की तानाशाही मानसिकता का प्रतीक है.''
महिला हिंसा के खिलाफ तीन दशक से भी ज्यादा समय से आंदोलनरत सामाजिक कार्यकर्ता तारा अहलूवालिया कहती हैं, ''राजस्थान के सामाजिक ढांचे में बेटियों के कंधों पर इज्जत का यह बोझ निर्मम है. हैरानी और आक्रोश की बात यह है कि यही समाज लड़कों के मामले में अचानक उदार और मौन हो जाता है. बेटे प्रेम विवाह करें तो 'व्यक्तिगत निर्णय', लेकिन बेटियां वही करें तो 'परिवार की इज्जत पर दाग'.''
ऐसे परिवारों से मिलकर यह सवाल भी मन में आता है कि इतना निष्ठुर फैसला लेते हुए क्या पिताओं को पीड़ा नहीं होती. ब्यावर जिले के एक ऐसे ही नाराज पिता ने 2024 में अपनी बेटी के प्रेम विवाह करने पर उसका अंतिम संस्कार कर दिया था. पेशे से ट्रक ड्राइवर पिता जगदीश ने इंडिया टुडे को बताया, ''उस वक्त सामाजिक दबाव के चलते मैंने वह कदम उठा लिया था.
बाद में मुझे मेरी गलती का एहसास हुआ तो मैंने उन सभी लोगों से नाता तोड़ लिया जिन्होंने मुझे ऐसा करने के लिए उकसाया था.'' हालांकि, अब जगदीश के पास पछताने के अलावा कोई चारा नहीं. आज भले ही कुछ पिता पछता रहे हों, यह मामले राजस्थान पर एक प्रश्नचिह्न की तरह खड़े हैं: क्या इस समाज में बेटियों को इंसान मानने की शुरुआत अभी बाकी है?
''पुरुषवादी वर्चस्व की शिकार ऊंची जातियां विवाह संबंधों की संकीर्णतावादी सोच से अभी बाहर नहीं निकल पाई हैं. महिलाओं के मानसिक और सामाजिक तौर पर उत्पीड़न का यह तरीका पुरूषों की तानाशाही मानसिकता का प्रतीक है.''