अब परदेसी नहीं चीता

भारत को चीतों के घर के रूप में बसाने का प्रयोग सकारात्मक संकेत दिखा रहा है. चीते यहां बस रहे हैं, प्रजनन कर रहे हैं और धीरे-धीरे स्थानीय वातावरण के अनुकूल हो रहे हैं

9 मार्च को चीता ज्वाला कुनो नेशनल पार्क में शावकों को जन्म देने के बाद आराम करते हुए

वर्ष 2022 में जीवित रहने की तब बड़ी समस्या थी जब भारत ने अफ्रीका से चीते मंगवाकर अपना बड़ा प्रयोग शुरू किया था. अब यह पुराने जमाने की बात हो गई. प्रजनन परियोजना और विदेश से नए मेहमानों के आगमन से हमारे यहां उनकी आबादी में उछाल आया है. 28 फरवरी को बोत्सवाना से कुनो नेशनल पार्क में आए नौ चीते—छह मादा, तीन नर, सभी आजादी से घूम रहे हैं. प्रजनन कैद में नहीं हुआ है. वे चीतों की बढ़ती आबादी में शामिल हो गए हैं: 55, जिनमें 33 शावक हैं.

यह परदेसी वन्य जीव गानजी से ग्वालियर तक, सेना के परिवहन विमान सी-17 ग्लोबमास्टर में आए. फिर वायु सेना के एमआइ-17 हेलीकॉप्टरों से कुनो पहुंचे, जहां उन्हें केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने पुराने पालपुर गांव में अलग बने एक घेरे में छोड़ा. कुछ दिनों के लिए उन्हें तब तक एक ट्रांजिट हाउस में रखा गया जब तक कि यह फैसला नहीं हुआ कि उन्हें जंगल में छोड़ा जाए या किसी विशाल घेरे में रखा जाए.

पिछले साढ़े तीन साल में केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट चीता को पूरा समर्थन दिया है. फरवरी 2023 में उसने उनके बचने की आशंकाओं को झटकते हुए दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते मंगाने के लिए वीजा मंजूर किया. आंकड़ों के हिसाब से देखें तो चीजें काफी अच्छी रही हैं. चीतों के लिए 50 फीसद की जीवित रहने की दर को काफी बेहतर माना जाता है, जो अफ्रीकी सवाना में भी सबसे मजबूत इस प्रजाति में नहीं है. पहले और दूसरे लॉट में भारत आए 20 में से 11 जीवित हैं. 

लेकिन ज्यादा बड़ी सफलता ब्रीडिंग में मिली है. चीतों ने कई बार बच्चे दिए हैं और अपने प्रजनन चक्र को स्थानीय मौसम के हिसाब से ढाला है, जिससे जीवित रहने में मदद मिलती है. अब तक यहां तीसरी पीढ़ी पैदा हो चुकी है. हमारे 55 चीतों में से तीन गांधी सागर अभयारण्य में हैं; बाकी कुनो में हैं, उनमें से 13 आजादी से घूम रहे हैं, जिनमें 10 भारत में पैदा हुए हैं.

अब सबसे पहला काम भविष्य के चीतों के लिए ठिकाने की तलाश करना है. गांधी सागर में तीनों चीतों को 65 वर्ग किमी का इलाका मिला है, जिसे सुरक्षा के लिए घेरा गया है. उनके लिए एक और बस्ती की जरूरत है जहां वे आजादी से रह सकें. नौरादेही, जिसे अब टाइगर रिजर्व का दर्जा दिया गया है, को इस मकसद के लिए तैयार किया जा रहा है और उसमें उनके लिए शिकारों की संख्या बढ़ाई जा रही है: दूसरी जगहों से चित्तीदार हिरण और काले हिरण लाए जा रहे हैं.

इसके अलावा, एक अंतरराज्यीय 'चीता गलियारा' भी अपने आप बन रहा है. मार्च की शुरुआत में दो चीते—केपी 2 और केपी 3—कुनो से बाहर निकले, राज्य की सीमा पार की और राजस्थान में 60-70 किमी तक पहुंच गए. रेडियो-कॉलर वाले ये दोनों प्राणी भाई, पार्वती नदी के किनारों पर देखे गए. भौगोलिक सीमाओं को पार करके लंबी दूरी तक पहुंच जाना चीतों का जाना-माना व्यवहार है. राजस्थान के सात और मध्य प्रदेश के आठ जिलों में फैले 17,000 वर्ग किमी के प्रस्तावित इंटर-स्टेट वाइल्डलाइफ कॉरिडोर के लिए दलीलें अब और मजबूत हो गई हैं. 

एक परेशान करने वाला सवाल: क्या चीते बाघों के साथ जिंदा रह सकते हैं? हमें जल्द पता चल जाएगा. फिलहाल तो नौरादेही में 20 से अधिक बाघ हैं. वाइल्डलाइफ मैनेजर अभी इसे कोई मुद्दा नहीं मानते. नौरादेही के संभागीय वन अधिकारी, रजनीश सिंह कहते हैं, ''अतीत में भारत में सिर्फ बाघ और चीते ही नहीं, बल्कि शेर भी साथ-साथ रहते आए हैं.''  

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