बिहार की गरम राजनीति में नरमदिल निशांत
नीतीश कुमार के गिरते स्वास्थ्य और भाजपा के बढ़ते दबाव के बीच, अब तक परिवार के सीमित दायरे में रहे 44 साल के संकोची और आध्यात्मिक निशांत अब पार्टी का भविष्य सुरक्षित करने की बड़ी और मुश्किल जिम्मेदारी उठाने की तैयारी में.

अपने पिता की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जद-यू) की औपचारिक सदस्यता लेने के अगले ही दिन निशांत जब अपनी मां मंजू सिन्हा की समाधि पर फूल चढ़ाने पहुंचे तो उन्होंने मीडिया के कई सवालों का अपने चिर-परिचित अंदाज में जवाब दिया.
मगर जब पत्रकारों ने उनसे कहा कि जद (यू) के कई विधायक उन्हें सीएम बनाए जाने की मांग कर रहे हैं, तो वे बस मुस्कुराकर निकल गए. राजनीति की दुनिया में कम अनुभव रखने वाले निशांत ने पिछले सवा साल में यह सबक बखूबी सीखा है कि किन सवालों का जवाब देना है और किन्हें छोड़कर निकल जाना है.
नीतीश कुमार के गिरते स्वास्थ्य और भाजपा के बढ़ते दबाव के बीच जद (यू) के लिए वे बहुत सारी उम्मीदों का घर बन गए हैं. उन्हें 85 विधायकों, 12 लोकसभा और 4 राज्यसभा सदस्यों वाली; 21 वर्षों से बिहार की सत्ता में लगातार बनी रहने वाली पार्टी को बिखरने से बचाना है. अब तक परिवार के सीमित दायरे में रहने वाले 45 साल के कुछ संकोची और आध्यात्मिक निशांत इस बड़ी और मुश्किल जिम्मेदारी को उठाने की तैयारी कर रहे हैं.
निशांत राजनीति में आएंगे, इसकी चर्चा 2025 के जनवरी में ही शुरू हो गई थी. दरअसल, यह मान लिया गया था कि जद (यू) के कोर समर्थक, यानी नीतीश कुमार की अपनी जाति कुर्मी बिरादरी, 36 फीसद आबादी वाला अति पिछड़ा वर्ग और ग्रामीण महिलाएं नीतीश के बाद उनके निकटतम संबंधी को ही उनका उत्तराधिकारी मानेंगी. कहा गया कि पार्टी को उनके नाम पर ही बिखरने से बचाया जा सकता है.
ऐसे में कुछ महीने पहले तक जिन मनीष कुमार वर्मा का नाम नीतीश के उत्तराधिकारी के रूप में जोर-शोर से चल रहा था, उन्हें रोका गया और निशांत का नाम आगे बढ़ाया गया. इस जरूरत को पारिभाषित करते हुए टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, ''किसी करिश्माई व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द अगर कोई पार्टी खड़ी होती है, तो उसका सर्वमान्य उत्तराधिकारी उनका निकटतम संबंधी ही हो सकता है.
पार्टी के लोग किसी अन्य योग्य व्यक्ति को लेकर सहमत नहीं होते. ऐसे में पार्टी टूटने का खतरा रहता है.’’
मगर यह चयन अपने आप में एक बड़ी चुनौती लेकर आता है, जो खुद निशांत का स्वभाव है. वे अंतर्मुखी रहे हैं. यही वजह है कि उनके बहुत सारे मित्र भी नहीं हैं. उन्हें जानने वाले बताते हैं कि 2007 में अपनी मां के निधन के बाद से उन्होंने लोगों से मेल-जोल सीमित कर दिया था.
वे स्वभाव से मितभाषी ही रहे हैं. वरिष्ठ राजद नेता जगदानंद सिंह के पुत्र और निशांत के बचपन के मित्र रहे अजीत कहते हैं, ''निशांत बचपन से ही सीमित दायरे में रहने वाला लड़का था. लेकिन हमारे आसपास सिर्फ वही ऐसा बच्चा था, जिसके पास पूरी क्रिकेट किट थी, इसलिए हम साथ खेलते थे. उसका व्यक्तित्व कभी भारी-भरकम नहीं रहा.’’
नीतीश जब 1985 में पहली बार विधायक बने तो अजीत के पिता जगदानंद सिंह और उनका आवास एक ही भवन में था. इसी तरह पहले केंद्रीय विद्यालय, बेली रोड फिर बीआइटी मेसरा में अजीत और निशांत एक साथ थे. 2007 और उसके कुछ साल बाद तक दोनों के बीच संबंध बने रहे.
अपनी शादी का दिन याद करते हुए अजीत कहते हैं, ''वह विवाह कार्यक्रम में आया था और शादी के बाद उसकी मां हम दोनों से मिली थीं.’’ अजीत बताते हैं कि मां मंजू उनसे शादी करने को कहा करती थीं. मगर निशांत इन बातों से खुद को दूर ही रखते. बाद के दिनों में उनकी रुचि अध्यात्म की तरफ बढ़ने लगी थी.
नीतीश कुमार के करीबी मित्र उदयकांत अपनी किताब नीतीश कुमार-अंतरंग दोस्तों की नजर से में निशांत के जन्म और बचपन के बारे में विस्तार से लिखते हैं. जहां मीडिया रिपोर्ट्स में निशांत का जन्म 20 जुलाई, 1975 बताया जाता है, वहीं किताब के मुताबिक उनका जन्म 20 जुलाई, 1980 को तब हुआ, जब उनके पिता एक बार फिर विधानसभा चुनाव हार गए थे और उनकी मां अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी के लिए प्रयास कर रही थीं.
उदयकांत लिखते हैं, ''ऐसा लगा कि यह बच्चा इन दोनों के जीवन का अंधेरा मिटाने आया है, इसलिए इसका नाम निशा (रात्रि) का अंत, यानी निशांत रखा गया.’’ घर के लोग प्यार से उन्हें निशि कहकर बुलाते हैं. हालांकि निशांत के आधार कार्ड में उनकी जन्मतिथि 20 जुलाई, 1981 दर्ज है.
निशांत के करीबी बताते हैं कि वे तीक्ष्ण बुद्धि के हैं और किसी भी विषय को तेजी से समझ लेते हैं. इसके साथ ही, वे अपनों के लिए फिक्रमंद रहने वाले व्यक्ति हैं. उनका कोई करीबी बीमार होता है तो वे झट से उसकी सेवा करने पहुंच जाते हैं. पहले उन्होंने अपने मामा का इलाज कराया. फिर आखिरी दिनों में अपनी नानी की खूब सेवा की.
अंतर्मुखी और पारिवारिक : अब तक सक्रिय राजनीति से दूर रहे निशांत कुमार की अपने माता-पिता के साथ कुछ पुरानी तस्वीरें
निशांत का बचपन अपने ननिहाल में गुजरा. क्योंकि उस वक्त उनके पिता खुद को राजनीति में स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे. 1985 से 1991 तक वे जरूर अपने पिता के साथ रहे. जब नीतीश कुमार केंद्र की राजनीति में सक्रिय होकर दिल्ली में वक्त बिताने लगे, वे अपनी मां के साथ रहने लगे जिन्हें 1983 में पटना में टीचर की नौकरी मिल गई थी. पिता के मुकाबले मां के अधिक करीब रहे निशांत जब बीआइटी मेसरा के अंतिम वर्ष में थे तो वे पढ़ाई छोड़कर मां के पास आ गए.
काफी समय तक अस्वस्थ रहने के बाद उनकी मां का निधन हो गया, वह उनके लिए अकेलापन और मानसिक तनाव लेकर आया. इसी मुश्किल दौर में वे अपने पिता के पास, मुख्यमंत्री आवास चले गए और आध्यात्मिकता की ओर बढ़ चले. हालांकि इस प्रवास के दौरान वे अपने पिता के बेहद करीब आ गए, जो हाल के दिनों में सीएम आवास से बाहर आने वाली तस्वीरों और वीडियो में दिखता रहा है. इस दौरान वे राजनीति की दुनिया से दूर ही रहे.
मगर 2025 की जनवरी से उनका जीवन बदल गया. जानकार बताते हैं कि वे व्यावहारिकता और मेल-जोल पर काम कर रहे हैं. वहीं सिविल सेवा की नौकरी छोड़कर जद (यू) में आए नीतीश के करीबी मनीष कुमार वर्मा यदा-कदा उन्हें इतिहास, राजनीति और विचारधारा का प्रशिक्षण देते हैं. पिछले ही साल नीतीश की बड़ी बहन के नाती अनुराज निशांत के साथ जुड़े हैं और दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ी हैं.
वे उनके साथ साए की तरह रहते हैं और उनकी मदद करते हैं. चर्चा यह भी है कि एक अत्यंत महत्वपूर्ण राजनैतिक सलाहकार का भी उन्हें मार्गदर्शन मिलने लगा है. बताया जाता है कि निशांत की रुचि इतिहास, राजनीति और अध्यात्म की पुस्तकों में हमेशा से रही है, पर अब वे राजनैतिक पुस्तकें ज्यादा पढ़ रहे हैं.
हालांकि उनके करीबी कहते हैं कि निशांत को किसी ट्रेनिंग की कोई जरूरत नहीं है. वे बीस साल से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार के पुत्र हैं और सीएम हाउस में लगातार राजनेताओं के बीच रहे हैं, यह अपने आप में पर्याप्त ट्रेनिंग है. हालांकि यह भी सच है कि राजनैतिक मंचों पर वे संकोची दिखते हैं. अपनी सदस्यता वाले दिन भी उन्होंने कुछ हिचकते हुए ही फ्लाइंग किस देने का इशारा किया था. यह संकोच जाते-जाते जाएगा.
निशांत ने खुद ही मीडिया से कहा है कि वे जल्द बिहार की यात्रा पर निकलने वाले हैं और राज्य के 38 जिलों का भ्रमण करेंगे. उनके साथ जद (यू) के कई नए विधायकों को जोड़ा जा रहा है. इनमें उनके बीआइटी मेसरा के साथी, इस्लामपुर विधायक रूहेल रंजन, नवीनगर विधायक चेतन आनंद, कहलगांव विधायक शुभानंद मुकेश, गायघाट विधायक कोमल सिंह जैसे कई नाम शामिल हैं. ये वे नाम भी हैं जो मुखर होकर निशांत को सीएम बनाने की मांग करते हैं. यह कदम निशांत को सियासी रूप से मजबूत करेगा.
पुष्पेंद्र कहते हैं, ''निशांत और उनकी पार्टी तभी मजबूत होगी, जब उनमें स्वाभाविक राजनेता का उदय होगा. वे अपने पिता की तरह पार्टी और सरकार दोनों को अपनी व्यावहारिक कुशलता से लीड कर पाएंगे. अभी तो उन्हें अपनी पार्टी भी बचानी है और विपक्षी हमलों को भी झेलना है.’’