कैंपस में मजारों पर तने तेवर

राजधानी लखनऊ और सीमावर्ती बहराइच के शिक्षा संस्थानों में धार्मिक ढांचों पर कार्रवाई से विवाद तेज. छात्र संगठनों, प्रशासन और धार्मिक प्रतिनिधियों के आमने-सामने आने से परिसर अब कानूनी और सामाजिक बहस का केंद्र बने

लखनऊ विवि के लाल बारादरी भवन के बाहर प्रदर्शन करते छात्र संगठन

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के दो बड़े शैक्षणिक परिसरों में पिछले कुछ हफ्तों से एक सवाल लगातार गूंज रहा है: विश्वविद्यालयों और मेडिकल कॉलेजों के भीतर बने धार्मिक ढांचे आस्था का विषय हैं या प्रशासनिक और कानूनी चुनौती? एक ओर लखनऊ विश्वविद्यालय के कैंपस में मुगलकालीन संरचना 'लाल बारादरी' को लेकर घेराबंदी के खिलाफ छात्र सड़कों पर उतरे.

दूसरी ओर किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में मजारों को हटाने के नोटिस पर धार्मिक संगठनों और प्रशासन के बीच टकराव तेज हुआ. इसी तरह का एक बड़ा एक्शन बहराइच में भी देखने को मिला, जहां मेडिकल कॉलेज परिसर में बनी दस मजारों पर बुलडोजर चला. इन घटनाओं को अलग-अलग नहीं देखा जा रहा. प्रदेश भर में शिक्षा संस्थानों की जमीन, विरासत और धार्मिक संरचनाओं के सवाल अब प्रशासन, छात्र राजनीति और धार्मिक संगठनों के बीच बहस का केंद्र बन चुके हैं.

लाल बारादरी: विरासत या विवाद?
लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर के भीतर स्थित लाल बारादरी लंबे समय से जर्जर हालत में है. कभी यहां बैंक चलते थे और कैंटीन भी. 2017-18 के आसपास वे सब बंद हो गए. हाल ही प्रशासन ने इस भवन को घेरने के लिए फेंसिंग शुरू कर दी. 22 फरवरी को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में काम शुरू हुआ और कुछ ही घंटों में छात्र संगठनों का विरोध भी.

नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआइ) और समाजवादी छात्र सभा के नेतृत्व में छात्रों ने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई 'गैरकानूनी' है और रमजान के दौरान मुस्लिम छात्रों और समुदाय के लोगों का प्रवेश रोकने के इरादे से की गई है.

उनका दावा है कि परिसर के भीतर एक हॉल का इस्तेमाल नमाज के लिए होता रहा है. सोशल मीडिया पर वीडियो में कुछ छात्र नमाज अदा करते दिखे जबकि कुछ दूसरों ने मानव शृंखला बनाई. समाजवादी छात्र सभा के नेता प्रेमप्रकाश यादव कहते हैं, ''बिना पूर्व सूचना के फेंसिंग की गई. रमजान में यह कदम संवेदनशील है. हमारी मांग है कि एएसआइ से निरीक्षण कराया जाए और रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए.''

विश्वविद्यालय प्रशासन आरोपों को सिरे से खारिज करता है. रजिस्ट्रार भावना मिश्रा कहती हैं, ''हमें इस बात की जानकारी नहीं थी कि अंदर नमाज पढ़ी जा रही है. वहां कोई मस्जिद नहीं है. 2017 के बाद से सभी गतिविधियां दूसरी जगह शिफ्ट कर दी गई थीं. भवन बेहद जर्जर है और सुरक्षा कारणों से फेंसिंग जरूरी थी.'' प्रशासन का यह भी कहना है कि कुछ छात्रों ने फेंसिंग के हिस्से हटाने और निर्माण सामग्री फेंकने की कोशिश की जिसके बाद हसनगंज थाने को सुरक्षा के लिए चिट्ठी लिखी गई. '

एहतियातन पुलिस तैनात की गई. तनाव और बढ़ा जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े कुछ छात्र मौके पर पहुंचे और नारेबाजी की. एक छात्र उज्ज्वल सिंह ने आरोप लगाया कि उन्हें हनुमान चालीसा पढ़ने से रोका गया. पुलिस ने दोनों पक्षों को हटाया. लखनऊ के एडिशनल डीसीपी जितेंद्र कुमार दुबे कहते हैं, ''हालात नियंत्रण में हैं. शांति बनी हुई है.'' प्रदर्शन के बाद सात छात्रों को कारण बताओ नोटिस जारी हुए, छह पूर्व छात्रों की कैंपस एंट्री पर रोक लगी और 13 छात्रों को 50,000 रुपए के निजी मुचलके भरने का नोटिस मिला. इसमें कहा गया कि विरोध के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका बनी.

केजीएमयू: मजार, नोटिस और कानूनी जंग
लाल बारादरी विवाद के समानांतर केजीएमयू में मजारों का मुद्दा भी काफी दिनों से विवादों में है. 23 जनवरी को प्रशासन ने परिसर में स्थित पांच मजारों पर नोटिस चिपकाए. निर्देश था कि 15 दिनों के भीतर अतिक्रमण हटाया जाए अन्यथा प्रशासनिक कार्रवाई होगी. नौ फरवरी को कुछ और समय देते हुए दूसरा नोटिस जारी किया गया. केजीएमयू प्रवक्ता प्रो. के.के. सिंह का कहना है, ''इन संरचनाओं के निर्माण के लिए कोई वैध अनुमति नहीं है.

सरकारी जमीन पर बने धार्मिक ढांचे भी कानून से ऊपर नहीं हो सकते. परिसर में भीड़ जुटने से मरीजों और छात्रों की सुरक्षा प्रभावित होती है.'' प्रशासन का दावा है कि कुल आठ मजारें थीं, जिनमें से तीन पिछले डेढ़ साल में हटाई जा चुकी हैं. नेत्र विभाग के पीछे 20,000 वर्ग फुट, जगतनारायण रोड पर 70,000 वर्ग फुट और शताब्दी भवन के पीछे 60,000 वर्ग फुट जमीन खाली कराई गई. अब बाकी छह जगहों को मुक्त कराने की प्रक्रिया जारी है.''

केजीएमयू ट्रामा सेंटर के बाहर मजार

ऑल इंडिया मोहम्मदी मिशन ने इस कार्रवाई का विरोध किया है. इसके महासचिव सैयद बाबर अशरफ आरोप लगाते हैं कि ''मजारें सदियों पुरानी हैं. 26 अप्रैल, 2025 को पुलिस की निगरानी में जबरन प्रवेश और विध्वंस किया गया. यह धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है.'' उनका मानना है कि प्रशासन को बातचीत से समाधान निकालना चाहिए था. उन्होंने चेतावनी दी कि कार्रवाई जारी रही तो हर जिले में एफआइआर दर्ज कराई जाएगी.

जवाब में प्रो. सिंह कहते हैं, ''अदालत के आदेश पर केवल आसपास का अतिक्रमण हटाया गया. मजार को कोई नुक्सान नहीं हुआ. मिशन इस मामले में अधिकृत पक्षकार नहीं है.'' इस बीच, ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के मौलाना यासूब अब्बास और सुन्नी मौलाना खालिद रशीद फिरंगीमहली ने भी नोटिस पर सवाल उठाए. उनका कहना है कि प्रशासन को फिक्र है तो संबंधित लोगों से संवाद कर रास्ता निकाला जाए.

मामला और उलझ गया जब मोहम्मदी मिशन ने कुलपति और प्रवक्ता के खिलाफ तहरीर दी जबकि प्रशासन ने मिशन को कानूनी नोटिस भेजा. चौक कोतवाली पुलिस ने कहना था कि जांच के बाद ही एफआइआर पर निर्णय लिया जाएगा. रमजान के दौरान कार्रवाई स्थगित कर दी गई है. प्रशासन का कहना है कि संवेदनशीलता बरती जा रही है और रमजान के बाद स्थिति की समीक्षा होगी.

बहराइच: सख्त कार्रवाई
बहराइच में महाराजा सुहेलदेव मेडिकल कॉलेज परिसर के पास बनी दस मजारें 19 जनवरी को गिरा दी गईं. सिटी मजिस्ट्रेट राजेश प्रसाद के अनुसार, ''2002 में तत्कालीन नगर मजिस्ट्रेट ने इन्हें अवैध घोषित किया था. 2004 में अपील खारिज हुई और 2019 में कमिशनर की अदालत ने भी राहत नहीं दी. अंतिम नोटिस 10 जनवरी को दिया गया था.'' स्थानीय कमेटी का कहना है कि मूल दो मजारें वक्फ बोर्ड में दर्ज हैं और बाकी छोटी संरचनाएं समय के साथ बनीं. उनका तर्क है कि मेडिकल कॉलेज बनने से पहले ये ढांचे मौजूद थे. प्रशासन का जवाब है कि सरकारी जमीन पर विस्तार किया जा रहा था और आश्वासन के बावजूद स्वेच्छा से हटाया नहीं गया, इसलिए कार्रवाई की गई. विरोध के बीच कुछ ढांचे प्रशासन ने हटाए, कुछ को रखवालों ने स्वयं तोड़ा.

छात्र राजनीति और सामाजिक असर
तीनों घटनाओं में छात्र संगठनों की सक्रिय भूमिका रही. एनएसयूआइ और समाजवादी छात्र सभा प्रशासनिक कदमों को चुनौती दे रहे हैं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) बाहरी तत्वों की भूमिका पर सवाल उठा रही है. राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि धार्मिक ढांचों का मुद्दा जल्दी भावनात्मक रंग ले लेता है जिससे प्रशासनिक निर्णय भी राजनैतिक नजर आने लगते हैं. 

कानून विशेषज्ञ और हाइकोर्ट में एडवोकेट शैंलेंद्र कुमार सिंह कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी जमीन पर बिना अनुमति बने धार्मिक ढांचों को हटाने के लिए दिशानिर्देश दिए हैं लेकिन हर मामले में ऐतिहासिकता, स्थानीय परंपरा और सामाजिक संवेदनशीलता का आकलन जरूरी है. यदि किसी ढांचे का रिकॉर्ड, वक्फ पंजीकरण या ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध है तो उसे अलग दृष्टि से देखा जाना चाहिए.''

फिलहाल तीनों स्थानों पर स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है. लेकिन इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा संस्थानों के भीतर धार्मिक ढांचों का सवाल जल्द खत्म होने वाला नहीं. आने वाले महीनों में अदालतों, प्रशासन और सामाजिक संगठनों की भूमिका तय करेगी कि यह टकराव संवाद में बदलता है या और गहराता है. 

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