दक्षिण में दांवपेच शुरु
खास चेहरे गायब, रूठे हुए दिग्गज और नए वारिसों का जत्था केरल के चुनावी मोर्चे पर बढ़ा रहा गरमी

कहावतों में 'ईश्वर का अपना देश' उस ओर टकटकी लगाए है जिसे अक्सर 'केरल का 15वां जिला' कहा जाता है और जहां मिसाइलें और कामिकेज ड्रोन हमला कर रहे हैं. मगर यहां की सियासत में भी खाड़ी देशों की तरह मोर्चे तैयार हो रहे. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार दौरे पर आने वाले हैं. ऐसे में हर पार्टी के भीतर पारा चढ़ने लगा है. बड़े नेता आसन्न विधानसभा चुनाव में अपनी हिस्सेदारी के लिए जोर लगा रहे हैं.
ऊपर से ही शुरू करते हैं. दिल्ली में 27 फरवरी को माकपा पोलित ब्यूरो ने तय किया कि दिग्गज मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) के चुनाव प्रचार अभियान की 'अगुआई' करेंगे. इसके लिए पार्टी की 75 साल की उम्र की सीमा में भी ढील दी गई, ताकि 80 साल का यह दिग्गज चुनाव मैदान में उतर सके. यह सीमा पार्टी के अंदरूनी सिस्टम के लिए भी कई बार हटाई गई है, मगर इस बार यह कुछ अलग था.
पार्टी महासचिव एम.ए. बेबी ने विजयन को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से मना कर दिया, और पार्टी की परंपरा का हवाला देकर कहा कि यह 'लोकतांत्रिक' फैसला चुनाव के बाद के लिए टाल दिया गया है. उन्होंने यह भी साफ नहीं किया कि विजयन कन्नूर में अपनी गृह सीट धर्मादोम से चुनाव लड़ेंगे या नहीं. वहां से वे 2016 से चुनाव लड़ते आ रहे हैं और वहां कांग्रेस-भाजपा को ठिकाने लगा रखा है.
दूसरे बड़े चेहरों के लिए भी राह आसान नहीं. 140 सदस्यों वाली विधानसभा में माकपा के 61 विधायक और तीन सहयोगी निर्दलीय हैं. पार्टी के राज्य सचिवालय ने उनमें 50 के दोबारा चुनाव लड़ने का रास्ता साफ कर दिया. मगर पूर्व वित्त मंत्री थॉमस इसाक का नाम सूची में नहीं है. असल में दो स्तरों पर छंटनी की गई है. 50 में से कई लोगों के लिए दो बार के बाद लड़ने पर रोक के मामले में ढील दी गई है. पिनाराई इसमें शामिल हैं जो पांचवीं बार विधायक बनने के लिए चुनाव लड़ेंगे.
जाहिर है, यह लाभ 73 साल के इसाक को नहीं मिला. पार्टी के औपचारिक नियम के हिसाब से हर सीट के लिए नाम की सिफारिश जिला सचिवालय करता है. इसाक का नाम दो सीटों अरूर या तिरुवनंतपुरम से जुड़ा था. मगर उनका नाम दोनों में से किसी सूची में नहीं था.
बड़े चेहरों को रियायत नहीं
पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा भी नाराज हैं. टीचर के नाम से चर्चित शैलजा ने कोविड महामारी के दौरान अपने कुशल नेतृत्व से पहली पिनाराई कैबिनेट में पहचान बनाई थी. मगर अगली कैबिनेट में उन्हें हटा दिया गया. उन्होंने 2021 के विधानसभा चुनाव में मट्टनूर से 60,963 वोटों के साथ सबसे ज्यादा अंतर से जीत दर्ज की थी. उन्होंने तब कोई शिकायत नहीं की, बल्कि माकपा के 'टीमवर्क' वाले उपदेशों का हवाला देती रहीं और कहा कि ''जज्बाती होने की कोई जरूरत नहीं.''
मगर इस बार तनाव दिख रहा है. 28 फरवरी की बैठक में राज्य सचिवालय ने यह साफ कर दिया कि वह उन्हें मट्टनूर से टिकट देने को तैयार नहीं, जहां उन्हें पिछली बार रिकॉर्ड तोड़ जीत मिली थी. पहले वे पेरावूर (2006) और कूतुपरंबा (1996, 2016) से चुनाव लड़ चुकी हैं. माकपा नेतृत्व उन्हें पेरावूर से चुनाव लड़ाना चाहता है, जिसे पिछली बार कांग्रेस के पुराने नेता सनी जोसेफ ने जीता था, जो अब पार्टी के राज्य प्रमुख हैं.
माकपा की दलील है कि मट्टनूर मजबूत गढ़ है, वहां से कोई भी जीत सकता है, और पार्टी का प्रदर्शन बेहतर करने के लिए उन्हें जोसेफ के खिलाफ उतरना होगा. बेबी ने इंडिया टुडे से कहा, ''हम अपनी गिनती बढ़ाने के लिए हर सीट पर सबसे अच्छे उम्मीदवार उतारेंगे.'' आठ मार्च को वाम मोर्चे के उम्मीदवारों की फाइनल लिस्ट के बाद मामला साफ होगा. शैलजा टीचर ने इस पर सवाल उठाया है. कहा जा रहा कि अगर मजबूर किया गया तो वे चुनाव से बाहर हो सकती हैं.
वारिस होने का नफा-नुक्सान
केरल के चार पोलित ब्यूरो सदस्यों में तीन ए. विजयराघवन, विजू कृष्णन और एम.वी. गोविंदन भी बाहर हुए हैं. पार्टी के चर्चित चेहरे दिवंगत वी.एस. अच्युतानंदन के बेटे वी.ए. अरुणकुमार के लिए 'सहानुभूति वोट' वाली सीट अभी भी हाथ नहीं आई है. शायद फैसला समझदारी भरा है. एक आला इंस्टीट्यूट में उनके 'क्लर्क से डायरेक्टर' बनने पर हाइकोर्ट ने तीखी टिप्पणी की थी.
अन्य पार्टियों में भी वारिसों की अपनी मुश्किलें हैं. दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी के बेटे चांडी ओमन का अपना इलाका पुतुपल्ली है. अब उनकी बड़ी बेटी डॉ. मारिया ओमन कंजिरापल्ली सीट से टिकट चाहती हैं. उनकी मांग को नजरअंदाज किए जाने की संभावना है; पार्टी एआइसीसी सचिव मैथ्यू एंटनी को टिकट देना चाहती है, जो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज सिरिएक जोसेफ के दामाद हैं. उनके वहां मजबूत पारिवारिक संबंध हैं और वे चर्च का सपोर्ट मांग रहे हैं.
वहीं, भाजपा को भी साथ आए कुछ ईसाई चेहरों से कोई दिक्कत नहीं. उसके साथ आए केरल कांग्रेस के पुराने नेता पी.सी. जॉर्ज और उनके बेटे शॉन जॉर्ज की संभावनाएं भी अच्छी हैं. इसी तरह दिवंगत कांग्रेसी नेता के. करुणाकरन की बेटी पद्मजा वेणुगोपाल भी त्रिशूर से कमल में खिलते हुए अपने नाम को सार्थक कर सकती हैं.