पिएंगे पर चुनिंदा लोग
गिफ्ट सिटी को प्रयोग के तौर पर थोड़ी ढील मिली, लेकिन शराबबंदी को लेकर राज्य में अलग-अलग तरह की मांगों को साधना सरकार के लिए चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है

दरअसल, गुजरात में शराबबंदी एक ऐसा मामला है जो न तो कभी पूरी तरह कामयाब हो पाता है और न ही कभी खत्म होता है. यह मुद्दा एक बार फिर उभर आया है, खुद को ही मुंह चिढ़ाता हुआ-सा. इसे लेकर मौजूदा सियासी झूमाझटकी नवंबर के आखिर में शुरू हुई जब कांग्रेस के विधायक जिग्नेश मेवाणी ने बनासकांठा जिले के थराद कस्बे में एक स्कूल के पास चल रहे शराब वितरण केंद्र पर 'जनता रेड' की अगुआई की. उसके बाद कुछ तल्ख बयानबाजियों और निजी आरोप-प्रत्यारोप ने माहौल को गरमा दिया. फिर सियासी बयानबाजी पुराने ढर्रे पर लौट आई और नेताओं ने फिर से दावा किया कि वे सख्त शराबबंदी को लेकर प्रतिबद्ध हैं.
मगर उसके कुछ हफ्ते बाद ही राज्य सरकार ने इस नीति में एक बड़ी छूट का ऐलान कर दिया. वह यह कि गिफ्ट (जीआइएफटी) सिटी के भीतर गुजरात के बाहर के निवासी और विदेशी लोग लाइसेंस प्राप्त होटलों, रेस्तरां और क्लबों में केवल अपनी वैध फोटो आइडी दिखाकर शराब का सेवन कर सकते हैं. वहीं, गिफ्ट सिटी के ऐसे कर्मचारी जो गुजरात के निवासी हैं, अपनी कंपनी के जरिए विशेष अनुमति लेने की बजाए सीधे सरकार से शराब परमिट का आवेदन कर सकते हैं.
शराब सेवन वाली इन जगहों को आम इलाकों से अलग घेरकर रखा गया है और उन पर सीसीटीवी कैमरों से निगरानी की जाएगी तथा बची हुई शराब को 'नष्ट' कर दिया जाएगा. शराब पीने की तमन्ना रखने वालों के लिए यह छूट शराबबंदी के पहले के सख्त नियमों के मुकाबले वाकई एक बड़ा बदलाव है.
भूपेंद्र पटेल सरकार के 22 दिसंबर के इस फैसले का मकसद साफ है. यह अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कारोबार को लुभाने की कोशिश में उठाया गया कदम है. सरकार चाहती है कि राज्य में दफ्तर और आवास स्थापित करने की सोच रही कंपनियों के सामने उसको लेकर कोई बाधा न रहे. असल में यह प्रयोग के रूप में उठाया गया एक शुरुआती कदम है.
शायद वैश्विक कारोबार, अंतरराष्ट्रीय खेल और सांस्कृतिक आयोजनों तथा पर्यटन केंद्रों के लिए प्रस्तावित अन्य जगहों पर भी इसी तरह की छूट देने से पहले इसको आजमाया गया है. चर्चा है कि जिन जगहों पर इस छूट का विस्तार किया जा सकता है, उनमें सूरत डायमंड बोर्स, एकतानगर जहां स्टैच्यू ऑफ यूनिटी है, कच्छ के रण में होने वाले रण उत्सव, तथा अहमदाबाद के उच्च-स्तरीय आतिथ्य प्रतिष्ठान शामिल हैं. इन जगहों पर अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों के दौरान बड़ी संख्या में आगंतुकों के आने की उम्मीद रहती है.
किसी अधिकारी ने अभी तक इन अटकलों की पुष्टि नहीं की है मगर गिफ्ट सिटी को तो नए साल की पूर्वसंध्या से पहले ही यह 'तोहफा' मिल गया था. दूसरी ओर, थराद की घटना के तुरंत बाद छूट के इस फैसले ने गुजरात में शराबबंदी की दोहरी व्यवस्था के विरोधाभास को भी उजागर कर दिया है. एक ओर तो शहरी उच्च-वर्गीय इलाकों के लिए उदार रुख अपनाया जा रहा, तो दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में सख्ती बरती जा रही. दिलचस्प बात यह कि चाहे शराबबंदी लागू करने की नीति हो या फिर उसमें छूट देने की, दोनों ही मामलों में विभिन्न पक्ष आलोचना कर रहे हैं कि सरकार गंभीर नहीं.
मसला मेहमाननवाजी का
इस तरह की पहली ढील दिसंबर 2023 में दी गई थी और गिफ्ट सिटी के कर्मचारियों को कंपनी के एचआर की तरफ से जारी अधिकृत पत्र के साथ मेहमानों को न्योतने की इजाजत दी गई थी. मगर उससे गिफ्ट सिटी में गैर-सरकारी आयोजनों में आगंतुकों की संख्या बढ़ाने में कोई खास मदद नहीं मिली. ऐसे में नई ढील से भी शायद बहुत फर्क न पड़े. अहमदाबाद के क्राउन प्लाजा होटल के निदेशक सपन जानी कहते हैं कि ऐसी आंशिक रियायतों से स्थानीय आतिथ्य उद्योग को बढ़ावा नहीं मिलता.
वे बताते हैं, ''गिफ्ट सिटी में परोसी जाने वाली शराब पर राज्य की ओर से 66 फीसद शुल्क वसूला जाता है. ऐसे में वह बहुत ही मंहगी विलासिता की चीज हो जाती है और आम पहुंच से बाहर हो जाती है.'' मगर वरिष्ठ अधिकारी इसको लेकर स्पष्ट हैं. एक अधिकारी कहते हैं, ''यह ढील केवल उच्च-वर्गीय तबकों के बीच औपचारिक मदिरापान की अनुमति देता है, ताकि अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के मानकों को पूरा किया जा सके. स्थानीय लोगों में उपभोग को बढ़ावा देना इसका मकसद नहीं.''
अहमदाबाद-गांधीनगर साल 2030 के राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी करेगा. साल 2036 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक की मेजबानी की दावेदारी की भी चर्चा है. कम-से-कम आधा दर्जन अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन यहां होने हैं. इन बड़े आयोजनों के लिए कई हाइ-प्रोफाइल सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी योजना बनाई गई है. ऐसे में नई छूट उचित भले प्रतीत होती हो मगर उससे भेदभाव के आरोपों को भी बल मिलता है. इसलिए शराबबंदी को लेकर दोहरी स्थिति को सही ठहराने के लिए सरकार को काफी जटिल सियासी संतुलन साधना पड़ रहा है.
मेवाणी के जनता रेड को राज्यभर के पिछड़े समुदायों में काफी समर्थन मिला. ऐसे में इसके असर को कम करने के लिए उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री हर्ष सांघवी मेवाणी के आरोपों का सीधा जवाब देने से बचते नजर आए. इसकी जगह सांघवी ने मेवाणी की भाषा पर ही सवाल खड़ा किया जो उन्होंने पुलिस अधिकारियों के साथ बातचीत के समय इस्तेमाल की थी. दरअसल, मेवाणी ने पुलिसवालों पर शराब के अड्डे चलाने वालों के साथ मिलीभगत का आरोप लगाया था. इससे मुद्दे को भटकाने में मदद मिली और शराब नीति को लागू करने में हो रही हीलाहवाली की बजाय पुलिस के मनोबल और विधायक के बर्ताव पर चर्चा छिड़ गई.
मेवाणी कहते हैं, ''गुजरात में पुलिस और राजनेता शराब पर हफ्ता वसूली से फलते-फूलते हैं. असल में यहां कोई शराबबंदी नहीं है. तस्करों के नेटवर्क की वजह से शराब आसानी से उपलब्ध है, और इस सस्ती तथा मिलावटी शराब के शिकार गांवों के गरीब तबकों के लोग होते हैं. नतीजे में महिलाओं और बच्चों को भी बदसलूकी का सामना करना पड़ता है.'' साल 2018 में अहमदाबाद में कथित तौर पर कच्ची शराब पीने के बाद चार लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. उस समय भी मेवाणी ने ऐसी ही 'जनता रेड' की अगुआई की थी.
गुजरात यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष गौरांग जानी कहते हैं, ''गुजरात के ग्रामीण इलाकों में शराब एक संवेदनशील मुद्दा है. भले ही शराबबंदी के पालन में हीलाहवाली होती हो मगर उसे ही सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की सुरक्षा का श्रेय भी दिया जाता है, जिसकी यहां काफी अहमियत है. सत्ता में आने से पहले भारतीय जनता पार्टी शराबबंदी के खिलाफ थी. मगर इसे पूरी तरह से खत्म करना किसी भी पार्टी के लिए सियासी आत्महत्या सरीखा कदम होगा.'' इस साल यह बहस गुजरात हाइकोर्ट में भी उठेगी. हाइकोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई होगी जिसमें दलील दी गई है कि लोगों की निजी पसंद-नापसंद पर सरकार को दखल नहीं देना चाहिए.