जातिगत वर्चस्व की जंग
योगी सरकार के दो मंत्रियों के बीच शुरू हुई सियासी जंग से पूर्वांचल में नेतृत्व और वोट बैंक पर कब्जे की लड़ाई तेज. इसने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के सामाजिक समीकरण पर दबाव बढ़ाया

पूर्वांचल की सियासत में 22 फरवरी का दिन सिर्फ दो रैलियों का दिन नहीं था, वह राजभर राजनीति के भीतर चल रही गहरी खींचतान का खुला प्रदर्शन था. एक ही सरकार के दो कैबिनेट मंत्री, दोनों राजभर समाज से, दोनों पूर्वांचल में प्रभाव का दावा करने वाले और दोनों ने आजमगढ़ की धरती को अपनी-अपनी ताकत दिखाने का मंच बना लिया.
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के दोनों ओर करीब 30 किलोमीटर के दायरे में हुए इन दो आयोजनों ने साफ कर दिया कि यह टकराव अब व्यक्तिगत कटाक्ष से आगे बढ़कर नेतृत्व की निर्णायक लड़ाई बन चुका है.आजमगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर अहिरौला के जनता इंटर कॉलेज का मैदान पीला गमछा पहने कार्यकर्ताओं और पीली झंडियों से पटा था. यहां योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने ''सामाजिक समरसता रैली'' की.
इसी दिन यहां से करीब 30 किलोमीटर दूर माहुल के टिकुरिया मैदान में श्रम मंत्री अनिल राजभर महाराजा सुहेलदेव जयंती के उपलक्ष्य में जनसभा कर रहे थे. वहां भगवा रंग छाया हुआ था और पूर्वांचल के करीब 15 जिलों से समर्थक जुटाने का दावा किया गया. दोनों मंचों से सीधे नाम लिए बिना एक-दूसरे पर वार हुए. अहिरौला में सुभासपा के मंच से सामाजिक न्याय, भागीदारी और सम्मान की बात हुई.
ओमप्रकाश राजभर ने सीधे तौर पर किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके भाषण के केंद्र में यह संदेश था कि राजभर समाज को कोई खरीद या बेच नहीं सकता. उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग आरोप लगाते हैं, वे बताएं कि वोट कहां बिकता है. दूसरी ओर, टिकुरिया मैदान में अनिल राजभर ने महाराजा सुहेलदेव की विरासत को केंद्र में रखकर अपनी बात कही. उन्होंने भी सीधे नाम लिए बिना आरोप लगाया कि समाज को बांटने और महाराजा सुहेलदेव की विरासत से खिलवाड़ करने की कोशिश हो रही है. इस नोकझोंक की बुनियाद पिछले कुछ महीनों में तैयार हुई है.
बसंत पंचमी पर 23 जनवरी को सारनाथ में महाराजा सुहेलदेव जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में यह टकराव सार्वजनिक हो गया. मंच पर भाषण देने पहुंचे अनिल राजभर के खिलाफ भीड़ के एक हिस्से से नारेबाजी शुरू हुई. बताया गया कि नारेबाजी ओमप्रकाश राजभर समर्थकों की ओर से हुई थी. नाराज अनिल राजभर ने मंच से तीखी टिप्पणी की. जवाब में समर्थकों के बीच धक्का-मुक्की हुई, पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया.
एक सरकारी मंच पर दो सत्ताधारी धड़ों के समर्थकों की यह झड़प भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेतृत्व के लिए असहज करने वाली थी. इसके बाद बयानबाजी और तीखी हो गई. घटना के बाद ओमप्रकाश राजभर ने मीडिया के सामने खुलकर जवाब दिया. उन्होंने अनिल राजभर पर निशाना साधते हुए कहा, ''अगर पूरे देश में वोट बेचने की कोई दुकान है, तो उसका पता बताया जाए. अगर माई के लाल हैं, तो बता दें.'' उन्होंने आगे कहा, ''आज जो लोग उंगली उठा रहे हैं, वे कभी लोहा चोरी किया करते थे.''
ओमप्रकाश राजभर के बयान पर अनिल राजभर भी चुप नहीं रहे. उन्होंने मीडिया से बातचीत में ओमप्रकाश के अतीत को लेकर तंज कसा और कहा, ''ओमप्रकाश राजभर बनारस के सिंधोरा में ऑटो चलाते थे. पता नहीं कब सरिया खरीदने हमारे गांव पहुंच गए.'' इस बयान के बाद साफ हो गया था कि दोनों नेता पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. जुबानी जंग अब व्यक्तिगत आरोपों और पारिवारिक संदर्भों तक पहुंच चुकी थी.
अनिल और ओमप्रकाश दोनों ही राजभर समाज से आते हैं और दोनों का दावा है कि इस समाज के सबसे बड़े नेता और हितैषी वे ही हैं. फर्क इतना है कि अनिल भाजपा के भीतर रहकर सत्ता और संगठन दोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि ओमप्रकाश सुभासपा के जरिए अलग पहचान और दबाव की राजनीति करते रहे हैं. राजनैतिक जानकार मानते हैं कि यह टकराव सिर्फ अहं का नहीं, बल्कि राजभर समाज के नेतृत्व को लेकर चल रही निर्णायक लड़ाई का नतीजा है. पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए दोनों नेता अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं.
आजमगढ़ के प्रतिष्ठित शिब्ली नेशनल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य गयास असद खां का मानना है कि ''राजभर नेताओं के बीच यह लड़ाई वैचारिक कम और सामाजिक प्रतिनिधित्व की ज्यादा है. राजभर समाज पिछले एक दशक में संगठित राजनैतिक पहचान के रूप में उभरा है. ओमप्रकाश राजभर ने इसे एक राजनैतिक मंच दिया. लेकिन भाजपा ने अनिल राजभर को आगे कर संतुलन बनाने की कोशिश की. अब दोनों के बीच नेतृत्व की होड़ मची है.''
ओमप्रकाश का राजनैतिक सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है. 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा से गठबंधन कर आठ सीटों पर चुनाव लड़ा और चार जीतीं. योगी सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया लेकिन लगातार बयानबाजी के बाद 2019 में मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया. 2022 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव लड़ा और राजभर वोटों के एकमुश्त ट्रांसफर का दावा किया. हालांकि उनके बेटे अरविंद राजभर वाराणसी की शिवपुर सीट पर अनिल राजभर से हार गए. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ओमप्रकाश फिर भाजपा के साथ आए और कैबिनेट मंत्री बने लेकिन घोसी से उनके बेटे को हार का सामना करना पड़ा.
घोसी के नतीजों के बाद आरोपों का नया दौर शुरू हुआ. अनिल ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ओमप्रकाश को समीक्षा करनी चाहिए कि राजभर समाज का वोट उनके साथ क्यों नहीं रहा. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि निर्दलीय लीलावती राजभर को 45,000 से ज्यादा वोट कैसे मिले. संदेश साफ था कि सुभासपा प्रमुख की पकड़ ढीली पड़ रही है. बलिया लोकसभा सीट की मिसाल देकर भी अनिल ने गठबंधन की उपयोगिता पर सवाल उठाए.
जहूराबाद विधानसभा, जहां से ओमप्रकाश विधायक हैं, उसी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है, लेकिन भाजपा प्रत्याशी वहां पिछड़ गए. इशारों में यह कहा गया कि सुभासपा अपने घर में भी वोट ट्रांसफर नहीं करा पाई. आजमगढ़ के भाजपा नेता शैलेंद्र तिवारी कहते हैं, ''भाजपा का कोर वोट बैंक अनुशासन में रहता है लेकिन जब सहयोगी दल सार्वजनिक रूप से बयान देते हैं तो भ्रम पैदा होता है. दोनों मंत्रियों को संयम रखना चाहिए.''
सुभासपा के एक जिला अध्यक्ष रामजी राजभर कहते हैं, ''ओमप्रकाश राजभर ने समाज को पहचान दी है. अगर कोई उनकी राजनैतिक जमीन पर दावा करेगा तो कार्यकर्ता चुप नहीं बैठेंगे.'' शिवपुर विधानसभा के छितौना गांव में चरागाह विवाद के बाद राजभर और क्षत्रिय समाज टकरा गए. आरोप लगा कि राजनैतिक दबाव में एक पक्ष के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई. सेवापुरी के कुंडरिया गांव में फयाराम राजभर की मौत के केस में भी मंत्रियों पर दबाव बनाने के आरोप लगे. इन घटनाओं ने सामाजिक तनाव को राजनैतिक रंग दे दिया.
आजमगढ़ निवासी वरिष्ठ एडवोकेट अभिनव सिंह मानते हैं, ''जब कोई जातिगत नेतृत्व मजबूत होता है तो उसके भीतर उत्तराधिकार और विस्तार की राजनीति भी शुरू हो जाती है. ओमप्रकाश अपने बेटों को आगे बढ़ा रहे हैं. भाजपा के भीतर अनिल राजभर को विकल्प के रूप में खड़ा किया गया है. यह प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन सार्वजनिक टकराव से संदेश गलत जाता है.''
दरअसल, ओमप्रकाश राजभर पर परिवारवाद का आरोप भी विपक्ष और भाजपा के एक धड़े की ओर से लगाया जाता है. बड़े बेटे अरविंद राजभर को पहले ही चुनाव मैदान में उतारा जा चुका है. अब छोटे बेटे अरुण राजभर को अतरौलिया से संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा है. अनिल राजभर गुट इसे मुद्दा बना रहा है कि समाज का नेतृत्व एक परिवार तक सीमित नहीं होना चाहिए. दूसरी ओर, सुभासपा यह तर्क देती है कि भाजपा राजभर समाज की राजनीति को विभाजित कर उसका स्वतंत्र स्वर कमजोर करना चाहती है. पार्टी प्रवक्ता अरुण राजभर कहते हैं, ''अगर समाज मजबूत होगा तो उसकी राजनैतिक भागीदारी भी मजबूत होगी. हमें बांटने की कोशिश की जा रही है.''
गयास असद खां कहते हैं, ''वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह टकराव भाजपा के लिए चुनौती बन सकता है. पूर्वांचल में कई सीटें ऐसी हैं जहां कुछेक हजार वोट का अंतर जीत-हार तय करता है. यदि राजभर वोटों में बंटवारा हुआ तो इसका असर सीधे सीटों पर पड़ेगा.'' भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल सार्वजनिक रूप से चुप है लेकिन संगठन के भीतर असहजता से इनकार नहीं किया जा सकता.
राजभर समाज के, पूर्वांचल में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''भाजपा ने सामाजिक समीकरणों को साधकर सत्ता पाई है. अगर सहयोगी दलों के बीच इस तरह जंग चलती रही तो विपक्ष को मौका मिलेगा. अभी समय है कि दोनों नेता अपने मतभेद सीमित दायरे में रखें.'' फिलहाल एक ही सरकार के दो मंत्री, एक ही समाज के दो चेहरे, और दोनों खुद को असली प्रतिनिधि साबित करने में जुटे हैं. सवाल सिर्फ इतना नहीं कि राजभर समाज का नेता कौन है, बल्कि यह भी है कि क्या यह टकराव भाजपा के सामाजिक समीकरण को कमजोर करेगा? आजमगढ़ की दो रैलियों ने संकेत दे दिया है कि यह मुकाबला अभी थमने वाला नहीं.
असर में डेढ़ सौ से ज्यादा सीटें
> यूपी विधानसभा की 153 सीटों पर राजभर (भर) और इनकी समकक्ष जातियों के वोटरों का प्रभाव है. इन सीटों पर 20,000 से लेकर 90,000 तक राजभर मतदाता हैं. 66 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जिनमें 50,000 से लेकर 90,000 तक राजभर वोट हैं. 87 सीटें ऐसी हैं जहां 20,000-50,000 राजभर वोट हैं.
> पूर्वांचल में खासतौर पर देवीपाटन मंडल में गोंडा, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, बस्ती मंडल में सिद्धार्थनगर, संतकबीर नगर और बस्ती, गोरखपुर मंडल के महराजगंज, कुशीनगर, देवरिया और गोरखपुर, आजमगढ़ मंडल के मऊ, बलिया और आजमगढ़, वाराणसी मंडल के चंदौली, गाजीपुर, वाराणसी और जौनपुर, मिर्जापुर मंडल के भदोही, सोनभद्र और मिर्जापुर, अयोध्या मंडल के आंबेडकरनगर, अयोध्या और बाराबंकी जिलों समेत कुल 24 जिलों में राजभर मतदाता अच्छी संख्या में हैं.
> अर्कवंशी, बारी, खरवार, बियार जातियों को यूपी में भर या राजभर की समकक्ष बिरादरी में गिना जाता है. अर्कवंशी जाति के मतदाता गाजियाबाद, नोएडा, लखीमपुरखीरी, सीतापुर, हरदोई जिलों के अलावा बुंदेलखंड की सभी 19 विधानसभा सीटों पर हरेक में 20,000 से ज्यादा की संख्या में हैं. बारी जाति के मतदाता प्रदेश के सभी 75 जिलों में 5,000-20,000 तक की संख्या में मौजूद हैं. खरवार जाति के मतदाता प्रदेश के सभी जिलों में कम से कम 3,000 की संख्या में हैं. 42 विधानसभा सीटों पर प्रत्येक में बियार जाति के मतदाताओं की संख्या कम से कम 10,000 है.
> वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से गठबंधन कर सुभासपा ने आठ सीटों पर चुनाव लड़ा और चार सीटें जीतीं. 2022 का विधानसभा चुनाव सुभासपा ने सपा से गठबंधन कर लड़ा और छह सीटें जीतीं. 2024 में सुभासपा दोबारा एनडीए में शामिल हो गई. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में राजभर समाज से चार विधायक चुने गए. इनमें से दो सुभासपा, एक भाजपा और एक सपा के हैं.