शर्म से 'डूबकर' मरने लगे?
आंध्र प्रदेश में दुष्कर्म के आरोपियों के 'डूबकर मरने' की सिलसिलेवार घटनाओं ने कई सवाल खड़े किए

- प्रसाद निचेलामेटला
अपराधी क्या भयाक्रांत थे या पश्चाताप से ग्रस्त थे? अथवा यह तुरत-फुरत न्याय का नतीजा है? अगर यह सही है तो बहुत संभव है कि ऐसा प्रतिशोध कानून हाथ में लेने वाले स्वयंभू पुलिस ने अंजाम दिया हो जिसका उद्देश्य पीड़ित परिवारों को सांत्वना देना और आम लोगों के गुस्से को शांत करना हो सकता है. इस अंदेशे को साबित करने वाले सबूत तो मौजूद नहीं हैं लेकिन जिस तरह के शव मिल रहे हैं, वे परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को धीरे-धीरे पुख्ता करते जा रहे हैं.
जी हां, आंध्र प्रदेश में अब एक अलग तरह की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, जहां नाबालिग लड़कियों के यौन उत्पीड़न और हत्या के आरोपियों के शव जघन्य अपराध के कुछ दिनों बाद झील-तालाबों में पाए जा रहे हैं. इन घटनाओं की तुलना 2019 में हैदराबाद की युवा पशु चिकित्सक दिशा की दुष्कर्म के बाद हत्या के मामले में चार आरोपियों को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराए जाने से हो रही है.
क्या पुलिस मुठभेड़ हुईं?
पिछले आठ महीनों में राज्य में ऐसी कम से कम तीन घटनाएं हुई हैं—कडप्पा, काकीनाडा और अन्नामय्या जिलों में. चूंकि यह संभावना कम ही है कि एक के बाद एक तीन अलग-अलग आरोपी पश्चाताप की भावना के असर में आकर ऐसा कदम उठाएं, इसलिए मानवाधिकार कार्यकर्ता मौतों के तरीके पर सवाल उठा रहे हैं और 'न्यायेतर हत्याओं' का अंदेशा जता रहे हैं. हालांकि, अपराध स्थल के आसपास रहने वाले लोग ऐसी घटनाओं से संतुष्ट नजर आ रहे हैं. हाल के वर्षों में ऐसे मामलों पर आम जनता की प्रतिक्रिया मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के रुख पर सवाल उठाने की रही है क्योंकि नागरिक 'प्राकृतिक न्याय' को सही मानने लगे हैं.
तीस वर्षीय कुलवर्धन का मामला ले लीजिए, जिसने हाल ही डूबकर जान दे दी. बताया जाता है कि वह नशे और शराब का आदी था और उसका आपराधिक रिकॉर्ड भी था. मदनापल्ले के करीब रहने वाले कुलवर्धन पर पड़ोस की सात वर्षीया बच्ची के यौन उत्पीड़न के बाद उसकी हत्या कर देने का आरोप था. बच्ची 16 फरवरी को घर के पास खेलते समय लापता हो गई थी. परिवार और स्थानीय लोगों ने पुलिस के सहयोग से उसकी काफी तलाश की और अगले दिन उसका शव कुलवर्धन के घर में पानी के ड्रम में मिला.
त्वरित न्याय की मांग
बच्ची का जख्मों भरा शव देख जनता में आक्रोश फैल गया और स्थानीय लोगों ने राजनैतिक प्रतिनिधियों के साथ मिलकर घंटों तक राजमार्ग जाम रखा. उन्होंने आरोपी को उनके हवाले करने या सार्वजनिक रूप से फांसी देने की मांग की. इंडिया टुडे से बातचीत में अन्नामय्या जिले के एसपी धीरज कुनूबिली ने कहा कि उन्होंने कुलवर्धन को पकड़ लिया था लेकिन पुलिस की एक टीम उस आक्रोशित भीड़ को शांत करने में जुटी थी जो आरोपी पर हमला करने की कोशिश कर रही थी. इसी बीच वह मौके का फायदा उठाकर भाग निकला.
अगली सुबह कुलवर्धन की लाश अंगल्लू के पास झील में तैरती मिली, जो मौका-ए-वारदात से 15 किमी दूर है. उसकी मौत पर किसी को दुख या अचरज नहीं था, भले इसकी वजह संदिग्ध मानी जा रही थी. मदनपल्ले निवासी नरेश बी. कहते हैं, ''मुझे नहीं लगता कि ऐसे अपराधी स्वभाव का कोई व्यक्ति पछतावे में आकर जान दे सकता है. शायद वह डर गया हो. या हो सकता है किसी ने तुरत-फुरत न्याय देने के नाम पर ऐसा किया हो. हमें तो तसल्ली है कि दरिंदा अब हमारे बीच नहीं.''
अक्तूबर 2025 में इसी तरह काकीनाडा जिले के तुनी स्थित एक आवासीय विद्यालय में नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के प्रयास के आरोपी, 62 वर्षीय नारायण राव का शव झील में मिला था. राव को पुलिस हिरासत में लिया गया था लेकिन बताते हैं कि शौच के बहाने वह भाग निकला. अगर इन घटनाओं में लोगों को एक ही जैसा पैटर्न नजर आता है तो इसकी वजह शायद यह है कि जान-बूझकर इन्हें छिपाने की कोई कोशिश नहीं की गई या फिर यह कि हर बार इन्हें लगभग हूबहू दोहराया गया.
जून 2025 में कडप्पा जिले के मायलावरम में तीन वर्षीया दलित बच्ची से दुष्कर्म और हत्या का आरोपी 26 वर्षीय रहमतुल्लाह फरार हो गया. करीब 10 दिन बाद उसका शव पास के जलाशय में मिला. इलाके के डीएसपी वेंकटेश्वर राव कहते हैं, ''हंगामे के बीच वह गाड़ी से भाग निकला. डीएनए जांच से उसकी पहचान अपराधी के तौर पर हुई. शायद डर या पश्चाताप में उसने जान दे दी.''
'सुरक्षित' विकल्प!
ह्यूमनराइट्स फोरम की आंध्र प्रदेश शाखा के महासचिव येदिदा राजेश कहते हैं, ''ये सब 'मनगढ़ंत बातें' हैं. घटनाक्रम नाटकीय हैं. इसमें तो कोई दो-राय नहीं कि जनता और राजनैतिक दबाव बहुत ज्यादा हो सकता है. कानूनी प्रक्रियाएं भी समय लेने वाली और थकाऊ होती हैं.'' उनकी राय है कि पुलिस ने एक 'सुरक्षित' विकल्प खोज निकाला है.''
राजेश का मानना है कि यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) कानून के तहत मुकदमों की गति निराशाजनक स्तर तक धीमी है. उनके मुताबिक, ''आंध्र प्रदेश में लगभग 5,800 पॉक्सो मामले लंबित हैं. अधिनियम के मुताबिक, मामलों का निबटारा एक वर्ष में होना चाहिए लेकिन कई मामले वर्षों से लंबित हैं, कुछ तो 2021 से चल रहे हैं.'' दिशा मामले में मारे गए चार आरोपियों के परिवारों के वकील पी.वी. कृष्णमाचारी का कहना है कि ''जनता के गुस्से और नकारात्मक छवि'' के कारण पुलिस को व्यवस्था दरकिनार करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. उनके मुताबिक, ''ऐसी न्यायेतर हत्याएं उन्हें अपनी सकारात्मक छवि बहाल करने में मदद करती हैं.''
घटनाओं के बारे में पूछे जाने पर कुरनूल रेंज के डीआइजी कोया प्रवीण ने कहते हैं कि इन मौतों में पुलिस की कोई भूमिका नहीं थी. बकौल कोया, ''हम कानून का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. फिर जब पर्याप्त सबूत हों तो हम इस तरह न्याय देने के बारे में क्यों सोचेंगे? हम कानून लागू कराने वाले हैं, फिल्मी हीरो नहीं.'' हालांकि, सत्तारूढ़ तेलुगुदेशम पार्टी (टीडीपी) श्रेय लेने की कोशिश कर रही है. कुलवर्धन की मृत्यु के बाद एक्स पर पार्टी के हैंडल से एक पोस्ट में मदनपल्ले की तस्वीरों वाला एक पोस्टर साझा किया, जिस पर लिखा था: ''चंद्रबाबू लड़कियों से छेड़छाड़ करने वालों को बख्शते नहीं हैं.''