कंप्यूटर पढ़ाई में फंस गया लॉक
राजस्थान में कंप्यूटर शिक्षा के सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई. स्कूलों से सिस्टम नदारद, इंटरनेट दूर की कौड़ी. 10 फीसद स्कूलों में बिजली तक नहीं

राजस्थान के सीमावर्ती बाड़मेर जिले में मुख्यालय से करीब 28 किलोमीटर दूर है चांदे का पार गांव का सरकारी हायर सेकंडरी स्कूल. कंप्यूटर की तालीम बाकी जगहों की तरह यहां भी पढ़ रहे 165 छात्रों की एक बुनियादी जरूरत है. इसी को देखते हुए जिले के 1,155 सरकारी स्कूलों में से 694 में कंप्यूटर लैब बनाए गए थे जिनमें से 124 लैब बदहाली के चलते बंद हो चुके हैं. मगर, चांदे के पार वाले स्कूल में तो अब तक लैब खुला भी नहीं था. मजबूरन यहां के छात्र बाड़मेर जाकर कंप्यूटर सीखते हैं. इसी तरह जिले के रामसर और गडरा रोड ब्लॉक के ज्यादातर स्कूलों के छात्र कागजों पर ही कंप्यूटर की तालीम ले रहे हैं.
इधर राज्य के ठीक पूर्वी छोर पर धौलपुर जिले का किस्सा देखें. बाड़ी तहसील के अब्दुलपुर विद्यालय में नौ साल पहले (7 मई, 2017) ताला तोड़कर चोर आठ कंप्यूटर समेट ले गए थे. यहां के कंप्यूटर-कक्ष में सिस्टम तो नहीं मगर चोरों के पगमार्क आज भी मौजूद हैं, जिन्हें पुलिस ने जांच के नाम पर पत्थर रखकर सुरक्षित किया था. अब तक राज्य के करीब 1,100 स्कूलों में कंप्यूटर चोर हाथ साफ कर चुके हैं. अजमेर के नसीराबाद में राजकीय व्यापारिक सीनियर सेकंडरी स्कूल को कंप्यूटर तो 2008 में ही दे दिए गए मगर 1990 के बने हुए सीआरटी मॉनिटर के साथ. आउटडेटेड सिस्टम, ऐसा कि कोई चला ही नहीं सके. वे एक भी दिन काम न आए और आज भी आलमारी में रखे हैं.
प्रदेश के सरकारी स्कूलों में डिजिटल शिक्षा का पहिया मानो उल्टी दिशा में घूम रहा है. स्कूलों के जर्जर कंप्यूटर कक्षों में धूल से अटे मॉनिटर, जंग खाते सीपीयू और टूटे-फूटे कीबोर्ड इसकी गवाही दे रहे हैं. डिजिटल इंडिया और स्मार्ट क्लास की चमक कागजों में ही दिख रही है. माध्यमिक शिक्षा विभाग की प्रगति रिपोर्ट भी इसकी चुगली करती है. उसके मुताबिक, प्रदेश में 5,771 स्कूल ऐसे है जहां डिजिटल पढ़ाई की सुविधा ही नहीं.
पिछले 17 साल में 19,747 हायर सेकंडरी स्कूलों में से 13,976 में कंप्यूटर लैब बनाए गए पर इनमें से ज्यादातर को 'लॉक' लग चुका है. एकीकृत जिला सूचना प्रणाली शिक्षा (यू-डाइस) की रिपोर्ट के मुताबिक, डीग जिले के 122 में से 100 कंप्यूटर लैब बंद हो चुके हैं. अलवर जिले में 584 सरकारी स्कूलों में से 220 में ही कंप्यूटर लैब बनाए गए. भीलवाड़ा जिले के 514 स्कूलों का हाल भी बेहतर नहीं. यहां पुराने सॉफ्टवेयर के चलते 500 से ज्यादा स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षण कागजों में ही चल रहा है. नागौर के गोगेलाव सरकारी विद्यालय में शिक्षा विभाग की ओर से की गई जांच में कंप्यूटर आउटडेटेड मिले.
गौरतलब कि प्रदेश में 2008 में इन्फॉर्मेशन ऐंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी (आइसीटी) योजना के तहत स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा दिए जाने की कवायद शुरू हुई थी. उस साल 2,500 सरकारी स्कूलों को 10-10 कंप्यूटर सेट दिए गए. 2010 और 2014 में फिर से 2,000 स्कूलों में 10-10 कंप्यूटर सेट दिए गए. 2020 तक यूं ही यह सिलसिला चला. मगर 2017 तक दिए गए ज्यादातर कंप्यूटर आउटडेटेड हो चुके हैं, जिन्हें चालू करना भी दुश्वार है. एमएस-डॉस कंप्यूटरों में न तो इंटरनेट चल सकता है, न ही सीडी या यूएसबी ड्राइव. प्रदेश में स्थापित लैब्स में से करीब 1,200 में लगे उपकरण निम्न गुणवत्ता के पाए गए हैं.
कंप्यूटर की तालीम का अगर यह हाल है तो सूबे का शिक्षा महकमा आखिर कर क्या रहा है? प्रदेश के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की सुने, ''घटिया क्वालिटी की शिकायतों के बाद हमने पुरानी टेंडर प्रक्रिया को निरस्त कर वित्त विभाग को जांच का जिम्मा सौंपा था. जांच रिपोर्ट के आधार पर संबंधित फर्म के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.'' विपक्षी कांग्रेस इन हालात को लेकर सरकार पर हमलावर है. राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा सीधे शब्दों में कहते हैं, ''खराब पड़े कंप्यूटर इस सरकार के निकम्मेपन के गवाह हैं. डिजिटल शिक्षा के नाम पर सरकारी धन की लूट चल रही है.''
बदहाली का ब्यौरा अभी जारी है: 13,766 स्कूल ऐसे हैं जहां कंप्यूटर की पढ़ाई के लिए शिक्षक तक उपलब्ध नहीं. कंप्यूटर शिक्षा के लिए राजस्थान में लगाए गए 5,981 बेसिक और सीनियर कंप्यूटर अनुदेशक भी आए दिन पदोन्नति, वेतन विसंगति जैसे मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. जाहिर है, नौवीं से लेकर 12वीं तक के करीब 15 लाख से ज्यादा बच्चों को कंप्यूटर सीखे-जाने बिना ही अंक दिए जा रहे हैं, यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं.
हालांकि, प्रदेश सरकार का दावा है कि जिन स्कूलों में कंप्यूटर या किसी अन्य विषय के अध्यापक नहीं, वहां 80 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों को डिजिटल और ई-कंटेंट के जरिए पढ़ाई कराई जा रही है. मगर प्रदेश में इंटरनेट की उपलब्धता के आंकड़े दावों की पोल खोलते दिखते हैं. यू-डाइस रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान के 60 फीसद स्कूलों में कंप्यूटर और 36 फीसद स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध नहीं. 10 फीसद स्कूलों में तो बिजली का तार तक नहीं पहुंचा.
कंप्यूटर शिक्षा प्रदेश में महज कागजों पर जिंदा है. ताजा स्थिति हर सरकारी मंच से किए जाने वाले डिजिटल भविष्य के दावे पर सवाल खड़े कर रही है.