डॉक्टरों का संस्थान कितना बीमार!

लगातार सामने आ रहे यौन उत्पीड़न और धर्मांतरण से जुड़े आरोपों ने KGMU की कार्यसंस्कृति, आंतरिक जांच प्रणाली और छात्राओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए

आखिर क्या है इलाज? किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में सामने आए यौन उत्पीड़न के ताजा मामले ने खोल दिया एक काला इतिहास

लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के बाल रोग विभाग की एक जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर ने 11 फरवरी को जो शिकायत दर्ज कराई, उसने संस्थान की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए. आरोप है कि एक बच्चे के इमरजेंसी प्रोसीजर के बाद एडिशनल प्रोफेसर ने पार्टी का प्रस्ताव रखा और अकेले मिलने का दबाव बनाया.

बाद में जर्नल पब्लिकेशन के बहाने केबिन में बुलाकर हाथ पकड़ने और अनुचित तरीके से खींचने की कोशिश का भी आरोप लगाया गया. प्रोफेसर ने सभी आरोपों से इनकार किया है. शिकायत मिलते ही कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने 'इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी' (आइसीसी) को त्वरित जांच के निर्देश दिए. जांच पूरी होने तक प्रोफेसर को निलंबित कर विभाग में आने से रोक दिया गया है.

यह ऐसी अकेली घटना नहीं है. पिछले कुछ महीनों में संस्थान से सामने आए मामलों की शृंखला (देखें बॉक्स) इस प्रतिष्ठित चिकित्सा विश्वविद्यालय में यौन उत्पीड़न की कहानी कहती है. सितंबर 2025 में गाइनोकोलॉजी विभाग की एक वरिष्ठ डॉक्टर पर अनुचित व्यवहार के आरोप लगे थे. दिसंबर में एमडी की एक छात्रा ने एक सीनियर डॉक्टर पर शादी का झांसा देकर शोषण और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने का आरोप लगाया. जनवरी में एक इंटर्न को नर्सिंग छात्रा की शिकायत पर गिरफ्तार किया गया. इन घटनाओं ने यह संकेत दिया कि समस्या केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं, बल्कि संस्थागत संरचना और वर्क कल्चर से भी जुड़ी हो सकती है.

केजीएमयू के एक विभागाध्यक्ष बताते हैं, ''मेडिकल संस्थानों में हायरार्की यानी नीचे से ऊपर तक पदों का पूरा ढांचा खासा सख्त होता है. जूनियर रेजिडेंट से लेकर सीनियर फैकल्टी तक एक स्पष्ट कमांड चेन रहती है. मूल्यांकन, थीसिस, ड्यूटी रोस्टर, सिफारिशें और करिअर ग्रोथ काफी हद तक सीनियर्स के हाथ में होती है. ऐसे माहौल में अगर कोई सीनियर अपने पद और रुतबे का फायदा उठाए तो जूनियर के लिए प्रतिरोध करना आसान नहीं होता.'' कई रेजिडेंट डॉक्टर अनौपचारिक बातचीत में स्वीकारते हैं कि शिकायत दर्ज कराने से पहले वे करिअर पर पड़ने वाले असर को लेकर डरे रहते हैं.

मेडिकल शिक्षा और सेवा दोनों ही अत्यधिक दबाव वाले क्षेत्र हैं. 24 से 36 घंटे की ड्यूटी, इमरजेंसी कॉल, हॉस्टल जीवन और लगातार साथ काम करने की वजह से पेशे की और निजी सीमाएं कई बार धुंधली हो जाती हैं. मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. देवाशीष शुक्ल के अनुसार, ''कहीं ज्यादा तनाव वाले वातावरण में भावनात्मक निर्भरता तेजी से विकसित हो सकती है. अगर संस्थान स्पष्ट आचार संहिता बनाने के साथ ही संवेदनशीलता का नियमित प्रशिक्षण न दे तो गलतफहमियां और दुरुपयोग दोनों की संभावना बढ़ती है.''

यूनिवर्सिटी में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन ऐंड रिड्रेसल) ऐक्ट, 2013 के तहत इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी सक्रिय है. ताजा मामले में समिति ने शिकायतकर्ता, आरोपी और कई फैकल्टी सदस्यों के बयान दर्ज किए हैं. केजीएमयू के प्रवक्ता प्रो. के.के. सिंह बताते हैं, ''संस्थान प्रक्रिया का सख्ती से पालन कर रहा है. दोनों पक्षों की बात सुनी गई है और सिफारिशें तथ्यों के आधार पर होंगी.'' फिर भी, सवाल यह है कि क्या समिति सिर्फ शिकायत आने पर सक्रिय होती है या निवारक भूमिका भी निभाती है? कई छात्रों का मानना है कि ओरिएंटेशन के दौरान 'प्रिवेंशन आफ सेक्सुअल हैरेसमेंट' यानी 'पॉश' नियमों की जानकारी दी जाती है पर नियमित फॉलो-अप, वर्कशॉप और भरोसेमंद काउंसलिंग सिस्टम की कमी महसूस होती है.

पिछले वर्ष दिसंबर में सामने आया, शादी का वादा कर संबंध बनाने और धर्म परिवर्तन का दबाव डालने का मामला पुलिस तक पहुंचा था और गिरफ्तारी भी हुई. एक अन्य मामले में नर्सिंग छात्रा ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म और अश्लील वीडियो बनाने का आरोप लगाया था. इन घटनाओं में एक समानता दिखती है: पेशेवर पहचान और व्यक्तिगत रिश्तों का घालमेल, और शक्ति या भरोसे का दुरुपयोग. केजीएमयू के कुछ शिक्षकों का मानना है कि हर आरोप सच साबित हो, यह जरूरी नहीं. जांच और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान उतना ही महत्वपूर्ण है लेकिन आरोपों का बार-बार सामने आना अपने आप में चिंता का विषय है. हाइकोर्ट में एडवोकेट अभिनव सिंह बताते हैं, ''कैंपस में रिश्ते की शुरुआत अक्सर दोस्ती या प्रेम के नाम पर होती है. कई बार शादी का वादा किया जाता है. कुछ समय रिश्ता सहमति से आगे बढ़ता है और बाद में इनकार करने पर उत्पीड़न शुरू हो जाता है. और अंत में एक कानूनी विवाद का जन्म होता है.''

कथित धर्मांतरण और उत्पीड़न प्रकरण ने केवल आरोपों की गंभीरता ही नहीं, बल्कि जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी बहस छेड़ दी थी. 25 दिसंबर को केजीएमयू प्रशासन ने मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की थी. समिति में रेस्पिरेटरी मेडिसिन और गैस्ट्रो मेडिसिन विभाग के चिकित्सकों के साथ एक सर्जन को शामिल किया गया. प्रशासन का तर्क था कि वरिष्ठ और अनुभवी फैकल्टी सदस्य निष्पक्ष जांच कर सकेंगे. लेकिन समिति की संरचना को लेकर तुरंत सवाल उठे. 'नेशनल मेडिकल ऑर्गेनाइजेशन' (एनएमओ) ने सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई कि इतने संवेदनशील मामले की जांच के लिए गठित समिति में एक भी महिला सदस्य शामिल नहीं, जिससे पीड़ित पक्ष के लिए असहज स्थिति पैदा हो सकती है.

एनएमओ ने यह भी सवाल उठाया कि समिति के सभी सदस्य विश्वविद्यालय में महत्वपूर्ण प्रशासनिक या अकादमिक पदों पर हैं. ऐसे में छात्र और कर्मचारी स्वतंत्र रूप से बयान देने में संकोच कर सकते हैं. आलोचकों का कहना था कि संवेदनशील मामलों में बाहरी विशेषज्ञ या जेंडर संवेदनशीलता से जुड़े प्रशिक्षित सदस्यों को शामिल किया जाना चाहिए. विवाद बढ़ने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्थिति की समीक्षा की.

जानकारी के मुताबिक बाद में समिति में बदलाव किया गया और एक वरिष्ठ महिला फैकल्टी सदस्य को जांच पैनल में जोड़ा गया. साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि जरूरत पड़ने पर बाहरी कानूनी सलाहकार और जेंडर विशेषज्ञों से भी राय ली जाएगी. इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित किया कि केवल समिति बनाना पर्याप्त नहीं, उसकी संरचना और प्रतिनिधित्व भी उतना ही महत्वपूर्ण है, खासकर लैंगिक संवेदनशीलता की नजर से.

कई सवाल खड़े होने के बाद कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की थी और कथित धर्मांतरण के मामले की जांच एसटीएफ को सौंपने का अनुरोध भी किया था. बाल रोग विभाग के ताजा मामले में त्वरित कार्रवाई का निर्देश दिया गया. लेकिन आलोचकों का कहना है कि लगातार कई मामले सामने आना इस बात का संकेत है कि रोकथाम की रणनीति पर्याप्त प्रभावी नहीं रही. विशेषज्ञों के अनुसार, संस्थानों को केवल दंडात्मक कार्रवाई पर निर्भर नहीं रहना चाहिए.

नियमित जेंडर सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम, अनिवार्य आचार संहिता प्रशिक्षण और गुमनाम शिकायत तंत्र को मजबूत करना जरूरी है. महिलाओं के मुद्दों पर आवाज उठाने वाली समाजसेवी सुमन रावत कहती हैं, ''केजीएमयू में देशभर से छात्र आते हैं. विविध पृष्ठभूमि, अलग संस्कार और स्वतंत्र हॉस्टल जीवन के बीच रिश्ते बनना स्वाभाविक है. समस्या होती है जब व्यक्तिगत संबंध पेशेवर निर्भरता से जुड़ जाते हैं. कई बार पीड़ित पक्ष सामाजिक बदनामी के डर से चुप रहता है. खासकर महिला रेजिडेंट के लिए शिकायत दर्ज कराना भावनात्मक रूप से कठिन निर्णय होता है.''

केजीएमयू प्रशासन के अनुसार, हाल के विवादों के बाद कई कदम उठाए गए हैं. आइसीसी की बैठकों की संख्या बढ़ाई गई है. हॉस्टल वॉर्डन और विभागाध्यक्षों को संवेदनशील मामलों में त्वरित रिपोर्टिंग के निर्देश दिए गए हैं. काउंसलिंग सेल को सक्रिय करने और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया तेज की गई है. इसके अलावा नए सत्र से जेंडर सेंसिटाइजेशन वर्कशॉप अनिवार्य करने की योजना है. प्रो. के.के. सिंह का कहना है, ''किसी भी स्तर पर दोष सिद्ध होने पर कड़ी कार्रवाई की जा रही है.''

हालांकि वरिष्ठ शिक्षक मानते हैं कि संस्थान को पारदर्शिता बढ़ानी होगी. जांच रिपोर्टों का सार सार्वजनिक करना, शिकायतों की वार्षिक रिपोर्ट जारी करना और बाहरी विशेषज्ञों को समिति में शामिल करना भरोसा बढ़ा सकता है. साथ ही, जूनियर डॉक्टरों के लिए मेंटरशिप प्रोग्राम, स्पष्ट आचार संहिता और डिजिटल कम्युनिकेशन के नियम तय करना भी जरूरी है. मोबाइल मैसेज या सोशल मीडिया के दुरुपयोग की शिकायतें बताती हैं कि पेशेवर सीमाएं स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं. ऐसे में केजीएमयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में यौन उत्पीड़न की बढ़ती शिकायतें केवल व्यक्तिगत चूक का परिणाम नहीं मानी जा सकतीं. 

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