एक ने पकड़ी रफ्तार दूसरे पर सवालों के वार
बिहार सरकार के दो डिप्टी सीएम इन दिनों लगातार चर्चा में हैं. एक भूमि विवाद निबटाने को लेकर अपनी सक्रियता की वजह से तो दूसरा बढ़ते अपराध को काबू न कर पाने की विफलता के कारण.

बिहार विधानमंडल में इन दिनों बजट सत्र चल रहा है. इस दौरान उप-मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा को बिहार विधान परिषद में विपक्षी दलों से जो कॉम्प्लीमेंट मिला, उसकी उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी. वहां राजद एमएलसी सुनील कुमार सिंह ने कहा, ''मंत्री जी का प्रयास सही में बहुत सराहनीय है. ये जिस तरह बढ़ते चले जा रहे हैं, मुझे उम्मीद है कि जल्द इसका सही फल निकलेगा.’’ सुनील परिषद में राजद के सबसे सक्रिय एमएलसी हैं.
उस रोज विधान परिषद में सुनील के अलावा कुछ और सदस्यों ने भी दलगत प्रतिबद्धताओं से हटकर सिन्हा के भू-राजस्व महाभियान की तारीफ की, जिसमें वे राज्य के अलग-अलग जिलों में जाकर जनता दरबार लगाते हैं और जमीन संबंधी विवादों का मौके पर निराकरण करते हैं. खुद सभापति अवधेश नारायण सिंह ने भी कहा, ''मंत्री जी, आपका यह अभियान बहुत पॉपुलर हो रहा है, इसका अच्छा मैसेज जा रहा है.
इसके लिए धन्यवाद आपको.’’ अगले दिन जब सिन्हा विधानसभा पहुंचे तो एआइएमआइएम नेता अख्तरुल ईमान ने भी उनकी तारीफ की. वहीं बिहार के दूसरे डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी के लिए विधानमंडल का यह सत्र बहुत खुशगवार साबित नहीं हो रहा. बजट सत्र के पहले दिन से दोनों सदनों में एक प्रतियोगी छात्रा की संदिग्ध मौत की घटना और बढ़ते अपराध को लेकर हंगामा होता रहा. सारे सवाल गृह मंत्री चौधरी की तरफ थे. उन्हें अंदर विधायकों और बाहर पत्रकारों के सवालों का सामना करना पड़ा.
13 फरवरी को विधान परिषद के बाहर नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी ने कहा, ''सम्राट चौधरी ने कहा था, अपराधियों को 24 घंटे में पकड़कर सजा दिलवाएंगे, नहीं तो इस्तीफा देंगे. बिहार में तो रोज हर जिले में हत्या और बलात्कार हो रहा है. अब क्यों नहीं इस्तीफा देते?’’
इस पर जब पत्रकारों ने चौधरी से सवाल किया तो उनका जवाब बहुत संतोषजनक नहीं था. वे कह रहे थे, ''मामा भांजे की हत्या कर रहा है, भांजा मामा की हत्या कर रहा है. इसका कोई जवाब है क्या? यहां लोकतंत्र है, जो अपराध करेगा, उसको जेल जाना होगा.’’
ये दोनों मामले बिहार के दोनों डिप्टी सीएम के काम-काज का आईना हैं. पिछले साल 14 नवंबर को बनी बिहार में एनडीए की नई सरकार में जहां सिन्हा को राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग, खान एवं भूतत्व विभाग और नगर विकास एवं आवास विभाग की जिम्मेदारी मिली, वहीं चौधरी को वह महत्वपूर्ण गृह विभाग मिला, जो बिहार में एनडीए के 20 साल लंबे शासन में पहली बार भाजपा को मिला है. पहले यह विभाग मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास था.
पिछली एनडीए सरकार में भी चौधरी और सिन्हा दोनों डिप्टी सीएम थे. मगर शुरू से यह माना जा रहा है कि ये दोनों पद में भले बराबर हैं लेकिन सरकार, एनडीए और भाजपा में चौधरी की हैसियत सिन्हा से ऊंची है. इस बार तो चौधरी आधिकारिक रूप से भी सिन्हा से आगे हैं. भाजपा ने उन्हें अपने विधायक दल का नेता चुना है. इससे पहले वे बिहार भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं. मगर इस सरकार में अपने काम-काज से सिन्हा चौधरी पर बढ़त बनाते नजर आ रहे हैं.
चौधरी और सिन्हा दोनों एक ही इलाके से हैं. सिन्हा पुराने मुंगेर जिले के लखीसराय के रहने वाले हैं, वहीं चौधरी मुंगेर के तारापुर के. इसके अलावा उनमें कोई समानता नहीं. भूमिहार जाति के 58 वर्षीय सिन्हा की राजनीति की शुरुआत संघ और भाजपा से ही हुई है. उन्होंने बूथ लेवल एजेंट से अपने करिअर की शुरुआत की.
वे 2010 में पहली बार बिहार विधान परिषद पहुंचे. सात साल बाद उन्हें 2017 में पहली बार मंत्री पद मिला. 2020 में उनके करिअर में उस वक्त बदलाव आया, जब उन्हें बिहार विधान परिषद में सभापति बना दिया गया. 2022 में जब नीतीश कुमार ने राजद के साथ मिलकर सरकार बनाई तो भाजपा ने विधान परिषद में उन्हें नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी दी और फिर जब नीतीश एनडीए के साथ आए तो पहली बार उन्हें डिप्टी सीएम की जिम्मेदारी मिली, जिसे वे आज तक निभा रहे हैं. पिछली सरकार में उन्हें खान एवं भूतत्व विभाग, कला एवं संस्कृति विभाग के साथ पथ निर्माण विभाग की जिम्मेदारी मिली थी. इस बार उनसे पथ निर्माण विभाग का जिम्मा लेकर राजस्व एवं भूमि सुधार का जिम्मा दिया गया.
उनके करीबी बताते हैं, ''राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग को जो मंत्री संभालता है, वह परेशान ही रहता है. इस विभाग में समस्या ही समस्या है. एक तो अंचलाधिकारियों (सीओ)पर बिना रिश्वत लिए काम न करने का आरोप रहता है. दूसरा लैंड सर्वे की जटिल जिम्मेदारी भी है. मगर इस बार विजय कुमार सिन्हा ने इस काम को चुनौती की तरह लिया.’’
इसकी शुरुआत उन्होंने 12 दिसंबर, 2025 को पटना में भूमि-सुधार जनकल्याण संवाद के रूप में की और इस अभियान को अगले सौ दिनों में राज्य के सभी जिलों तक ले जाने का लक्ष्य रखा. इस अभियान के तहत वे भूमि विवाद से जुड़े मामलों की सीधी सुनवाई करते हैं.
एक तरह से यह जनसुनवाई सरीखा होता है. शिकायती अपने आवेदन लेकर आते हैं और सभी अधिकारियों की मौजूदगी में वे इन शिकायतों की सुनवाई करते हैं, कई बार वहीं फैसला भी करते हैं. इन सुनवाइयों से राज्य में जमीन के विवाद से जूझ रहे सैकड़ों लोगों को समाधान मिला और लाखों लोगों में उम्मीद जगी कि उन्हें समाधान मिल सकता है.
दरअसल, बिहार में भूमि विवाद के उलझे रहने की बड़ी समस्या यहां का अंचल कार्यालय माना जाता है. इन दफ्तरों से भ्रष्टाचार की भरपूर शिकायतें आती हैं. इसलिए जब सिन्हा ने इन संवादों के जरिए अंचल कार्यालय के अधिकारियों को कसूरवार ठहराना और उन्हें कार्रवाई पर मजबूर करना शुरू किया तो लोगों को लगा कि दशकों से कुंद सिस्टम बदल रहा है.
राज्य में बढ़ता भूमि विवाद सरकार के लिए मुसीबत का सबब बन गया है. सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि राज्य में 80 फीसद से ज्यादा आपराधिक मामलों की जड़ भूमि विवाद है. खुद सिन्हा ने सदन को बताया कि हर साल भूमि विवाद की वजह से राज्य में एक हजार से ज्यादा जानें जाती हैं.
इसके अलावा उद्योग और विभिन्न इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास परियोजनाओं के लिए राज्य में जमीन की कमी रहती है. इसलिए भूमि विवाद और भूमि सुधार बिहार सरकार की प्राथमिकता सूची में आ गया है. इसके लिए पिछली सरकार ने भूमि सर्वेक्षण का अभियान शुरू किया था मगर विवादों में आने की वजह से उस अभियान को रोकना पड़ा. सिन्हा ने नए तरीके से इस समस्या को हल करने की कोशिश की है.
वहीं दूसरी तरफ भाजपा को पहली बार गृह विभाग मिला है और इसकी जिक्वमेदारी चौधरी को दी गई है. इसकी वजह यह भी रही कि अब तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पारंपरिक तरीकों से अपराध नियंत्रण करते रहे हैं, जबकि भाजपा के नेता पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के बुलडोजर और एनकाउंटर नीति से प्रभावित रहे हैं. वे बिहार में भी इसे लागू करना चाहते थे.
इसलिए जब चौधरी के पास गृह विभाग आया तो उनकी ब्रांडिंग बुलडोजर बाबा के तौर पर भी की गई, हालांकि सदन में उन्होंने इससे इनकार किया. इस बीच अपराधियों को पांव में गोली मारने की परंपरा भी शुरू हुई, जिसे हाफ एनकाउंटर का नाम दिया गया. मगर इस तरह के ऐक्शन से अपराध नियंत्रण में कोई खास मदद नहीं मिली.
जब चौधरी से इस बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था, ''अपराध के आंकड़े इसलिए बढ़े नजर आ रहे हैं क्योंकि हाल के वर्षों में अपराध की रिपोर्टिंग बढ़ गई है. जहां तक अपरहण के मामलों में बढ़ोतरी की बात है, तो इसके तहत दर्ज 19,768 मामलों में से 14,000 'शादी की नीयत’ से घर से भागने के हैं. इस दौरान फिरौती या हत्या के लिए सिर्फ 158 मामलों में ही अपहरण किया गया.’’
चौधरी ने 20 फरवरी को विधानसभा में अपने विभाग का पक्ष रखा: 2025 में पुलिस ने 3.86 लाख लोगों को गिरफ्तार किया. इनमें हत्या और डकैती के लगभग 7,000, लूट के लगभग 2,500 और पुलिस पर हमले के लगभग 2700 आरोपी हैं. उन्होंने कहा, ''उस मामले में (नीट) राबड़ी देवी जी ने कहा, एक मंत्री का बेटा शामिल है. मैंने कहा आप नाम बताइए, मैं 24 घंटे में गिरफ्तार करूंगा. मगर उन्होंने नाम नहीं बताया.’’
चौधरी ने कहा, ''पिछले बीस साल से बिहार में सुशासन का राज चल रहा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ऐसा इको सिस्टम खड़ा किया है कि किसी को कुछ करने की जरूरत नहीं है. हम भी थाने तक नहीं जाते. पिछले 20 साल से मुख्यमंत्री जी गृह विभाग देख रहे थे. मुखिया नीतीश कुमार ही हैं, आखिरी फैसला उन्हीं का होता है.’’
दिलचस्प है कि इन दोनों उप-मुख्यमंत्रियों के बीच अदावत भी हमेशा से रही है. 2021 में जब सिन्हा विधान परिषद के अध्यक्ष थे, एक ऑनलाइन सवाल का जवाब न देने पर उन्होंने तत्कालीन सरकार में मंत्री चौधरी को टोका था. इस पर चौधरी ने उन्हें कह दिया था, ''ज्यादा व्याकुल नहीं होना है.’’
इस जवाब से भड़के सिन्हा ने कहा था, ''इस शब्द को आपस (वापस) लीजिए.’’ इस भिड़ंत को आज भी याद किया जाता है. उसके बाद से दोनों नेताओं के बीच असहजता और प्रतिद्वंद्विता शुरू हो गई. आज वह प्रतिद्वंद्विता प्रतिस्पर्धा में बदलती नजर आती है.
आज भले ही भाजपा में चौधरी को ज्यादा तरजीह दी जा रही है, मगर सच यह है कि पार्टी के इनर सर्कल में वे बाहरी ही समझे जाते हैं. समता पार्टी, राजद और जद (यू) की राजनीति करने वाले सम्राट महज आठ साल से ही भाजपा में हैं. 2018 में उन्होंने पार्टी की सदस्यता ली. बिहार की महत्वपूर्ण पिछड़ी जाति से आने वाले चौधरी को पार्टी ने 2021 में पंचायती राज मंत्री बनाया तो 2022 में विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बना दिया. 2023 में उनको प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई और जनवरी, 2024 में डिप्टी सीएम का पद दे दिया.
महज कुछ महीने पहले तक चौधरी बिहार भाजपा के निर्विवादित रूप से सबसे बड़े नेता माने जाते रहे थे और नीतीश सरकार में नंबर दो होने की वजह से उन्हें उनका उत्तराधिकारी भी समझा जा रहा था. लेकिन पिछले दिनों नितिन नबीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष और संजय सरावगी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद चौधरी की स्थिति वैसी नहीं रही.
राजनैतिक टीकाकार प्रियरंजन भारती कहते हैं, ''भाजपा के भीतर उनको लेकर नाराजगी भी रहती है. हाल के वर्षों में चुनावी टिकट और निगम और बोर्ड के सदस्यों के तौर पर चौधरी पर पार्टी के पुराने लोगों के बदले अपने करीबियों को बढ़ावा देने के भी आरोप हैं. वहीं सिन्हा चूंकि भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता रहे हैं, इसलिए उनको लेकर सहजता है.’’
इन दोनों उप-मुख्यमंत्रियों के कामकाज पर टिप्पणी करते हुए टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, ''चौधरी को भाजपा ने उनकी जाति की वजह से लगातार पुश किया. मगर किसी जिम्मेदारी में वे बहुत सफल रहे हों, ऐसा लगता नहीं. अभी तो कानून-व्यवस्था इस सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो रही है.’’
हालांकि पुष्पेंद्र यह भी जोड़ते हैं कि ''सिन्हा ने पिछले टर्म में बहुत प्रभावशाली काम नहीं किया था. हां, इस बार उनकी सक्रियता जरूर दिखती है. वे जमीन विवाद के पीछे भ्रष्टाचार, अनियमितता को सुलझाते दिखते हैं. मगर यह सिर्फ लैंड इनटाइटलमेंट को ठीक करने से नहीं सुलझेगा. क्या वे बिहार में भूमिहीनता की समस्या को सुलझा पाएंगे? अभी तो बस इतना कहा जा सकता है कि वे काम करते नजर आ रहे हैं.’’
फिलहाल, धारणा में सिन्हा को बढ़त है और चौधरी को अपनी कार्यशैली चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है.
सिन्हा विभिन्न आदेशों और जनसुनवाइयों के जरिए राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में काम करते नजर आते हैं जबकि गृह मंत्री चौधरी राज्य में कानून-व्यवस्था पर उठ रहे सवालों से परेशान हैं.