रेवड़ी के बजाय भविष्य पर दांव
चुनावी साल में बिना बड़े लोकलुभावन ऐलानों के पेश बजट में योगी सरकार ने तकनीक, कौशल विकास, शिक्षा और कृषि पर जोर देकर दीर्घकालिक विकास मॉडल का राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की

यही जुनून, यही ख्वाब मेरा है. दिया जला के रोशनी कर दूं, जहां अंधेरा है.'' उत्तर प्रदेश विधानसभा में 11 फरवरी को बजट भाषण के दौरान वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने जैसे ही ये पंक्तियां पढ़ीं, सत्ता पक्ष की बेंचों से जोरदार तालियां गूंज उठीं. शेर के जरिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व और संकल्प का उल्लेख केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि इसमें राजनैतिक संकेत भी था.
ऐसे कयास लग रहे थे कि दूसरे कार्यकाल के अंतिम पूर्ण बजट में योगी सरकार चुनावी साल को देखते हुए बड़े लोकलुभावन ऐलान कर सकती है. लेकिन बजट के आंकड़े और प्राथमिकताएं कुछ अलग कहानी कहते नजर आए. 9,12,696.35 करोड़ रुपए के आकार वाला यह बजट पिछले वर्ष की तुलना में करीब 12.9 प्रतिशत बड़ा है.
सरकार ने 43,565 करोड़ रुपए की नई योजनाओं की घोषणा जरूर की, लेकिन किसी बड़ी कर्जमाफी, प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण या व्यापक मुफ्त योजनाओं (फ्रीबी) से परहेज किया. इसके बजाय पूरा जोर तकनीक, कौशल, शिक्षा, कृषि और बुनियादी ढांचे के जरिए दीर्घकालिक विकास मॉडल पर दिखाई दिया. यही इस बजट का राजनैतिक और आर्थिक संदेश भी माना जा रहा है.
तकनीक पर बड़ा दांव
बजट में आइटी और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर के लिए 2,059 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया जो पिछले वर्ष की तुलना में 76 प्रतिशत अधिक है. यह वृद्धि प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि स्पष्ट रणनीतिक संकेत है. सरकार उत्तर प्रदेश को डिजिटल अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है. 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (एआइ) को पहली बार बजट के केंद्र में लाया गया है. उत्तर प्रदेश एआइ मिशन के लिए 225 करोड़ रुपए का प्रावधान, 49 आइटीआइ में एआइ लैब की स्थापना और एआइ सेंटर ऑफ एक्सिलेंस तथा डेटा लैब्स के लिए 32.82 करोड़ रुपए का आवंटन बताता है कि सरकार भविष्य की तकनीकों में निवेश को रोजगार सृजन से जोड़कर देख रही है.
साइबर सुरक्षा संचालन केंद्र के लिए 95 करोड़ रुपए की योजना डिजिटल विस्तार के साथ आने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखती है. डेटा सेंटर पार्कों के लिए 30,000 करोड़ रुपए के संभावित निवेश का लक्ष्य और अब तक 21,342 करोड़ रुपए के निवेश की प्रक्रिया यह दिखाती है कि राज्य खुद को 'टेक इन्फ्रास्ट्रक्चर हब' के रूप में स्थापित करना चाहता है. आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ प्रो. आर.के. सिंह का कहना है कि यह बजट अल्पकालिक राहत से ज्यादा दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा पर केंद्रित है.
उनके मुताबिक, ''एआइ, डेटा सेंटर और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में निवेश, आने वाले पांच से दस वर्षों में उच्च कौशल वाली नौकरियों का आधार तैयार करेगा. यह संकेत है कि राज्य सस्ते श्रम मॉडल से आगे बढ़कर ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की ओर जाना चाहता है.'' राजनैतिक विश्लेषक और लखनऊ के प्रतिष्ठित अवध गर्ल्स डिग्री कॉलेज की प्राचार्य बीना राय इसे चुनावी जोखिम के साथ लिया गया फैसला मानती हैं. उनके अनुसार, ''चुनावी साल में मुफ्त योजनाओं की बजाय टेक और कौशल पर फोकस करना बताता है कि सरकार अपने प्रदर्शन और विकास मॉडल पर भरोसा कर रही है.''
कौशल विकास से रोजगार
व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास के बजट में पहली बार 88 प्रतिशत वृद्धि करते हुए 3,349 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है. प्रदेश में 286 राजकीय आइटीआइ और लगभग 2,963 निजी आइटीआइ संचालित हैं. टाटा टेक्नोलॉजीज के सहयोग से 149 आइटीआइ के उन्नयन का काम शुरू हो चुका है और 62 अन्य संस्थानों में कार्य प्रगति पर है. कौशल विकास मिशन के प्रशिक्षण व्यय के लिए 1,000 करोड़ रुपए, दस्तकार प्रशिक्षण योजना के लिए 836 करोड़ रुपए और प्रोजेक्ट प्रवीण के लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान दर्शाता है कि सरकार पारंपरिक और आधुनिक, दोनों तरह के कौशल को बढ़ावा देना चाहती है.
प्राविधिक शिक्षा के बजट में 72 प्रतिशत वृद्धि कर 2,365 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है. पॉलीटेक्निक संस्थानों में एक्सिलेंस सेंटर और स्मार्ट क्लासरूम की स्थापना उद्योगों की मांग के अनुरूप मानव संसाधन तैयार करने की दिशा में कदम है. श्रम और रोजगार मामलों के जानकार अजय माथुर का मानना है कि यदि इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ तो उत्तर प्रदेश से होने वाला कौशल पलायन कम हो सकता है. वे कहते हैं, ''राज्य के युवाओं को बाहर जाने के बजाय स्थानीय उद्योगों में अवसर मिलेंगे. लेकिन चुनौती गुणवत्ता और उद्योग से वास्तविक जुड़ाव सुनिश्चित करने की है.''
शिक्षा में बुनियादी मजबूती
बेसिक शिक्षा के लिए 77,622 करोड़ रुपए का प्रावधान प्राथमिक ढांचे को मजबूत करने की कोशिश है. यूनिफॉर्म, बैग, जूते और स्टेशनरी के लिए 650 करोड़ रुपए, 75 जिलों में मॉडल कंपोजिट विद्यालय, स्मार्ट स्कूल योजना और शिक्षकों के लिए कैशलेस चिकित्सा सुविधा जैसी योजनाएं सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी सुधार का मिश्रण हैं. राजनैतिक विश्लेषक बताते हैं कि चुनावी साल में शिक्षकों का समर्थन योगी सरकार के लिए एक बड़ा 'बूस्ट' हो सकता है. इसीलिए परिषदीय विद्यालयों के शिक्षकों और शिक्षणेतर कर्मियों के लिए कैशलेस चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करने के लिए नई योजना लाई गई है.
इसके लिए लगभग 358 करोड़ रुपए की व्यवस्था प्रस्तावित है. सहायता प्राप्त गैर-सरकारी विद्यालयों की सुरक्षा ऑडिट में मानकों पर खरे न उतरने वाले विद्यालयों की देख-रेख की नई योजना के अंतर्गत 300 करोड़ रुपए की व्यवस्था भी बजट में है. माध्यमिक शिक्षा के लिए 22,167 करोड़ रुपए और उच्च शिक्षा के लिए 6,591 करोड़ रुपए का प्रावधान युवाओं को प्रतिस्पर्धी बनाने के लक्ष्य को रेखांकित करता है. रानी लक्ष्मीबाई स्कूटी योजना के लिए 400 करोड़ रुपए और एआइ प्रमाणन शुल्क की भरपाई जैसी पहलें संकेत देती हैं कि सरकार तकनीकी शिक्षा को सीधे रोजगार से जोड़ना चाहती है. राजनैतिक रूप से यह संदेश महत्वपूर्ण है.
महिला और किसान पर ध्यान
बजट में महिला आइटीआइ, बालिका आवासीय विद्यालय, स्कूटी योजना, सैनिटरी नैपकिन योजना और महिला स्वयं सहायता समूहों को एआइ प्रशिक्षण जैसी पहलों से सरकार ने महिलाओं को विकास के केंद्र में रखने का प्रयास किया है. महिलाओं के मुद्दों को मुखरता से उठाने वाली समाजसेवी सुमन रावत का मानना है कि महिला मतदाता पिछले कुछ चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं. मुफ्त राशन और उज्ज्वला जैसी योजनाओं के बाद अब शिक्षा, कौशल और स्वास्थ्य से जुड़ी पहलें महिला मतदाताओं को दीर्घकालिक सशक्तीकरण का संदेश देती हैं. वहीं कृषि क्षेत्र के लिए 10,888 करोड़ रुपए का प्रावधान, जो पिछले वर्ष से 20 प्रतिशत अधिक है, बताता है कि सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नजरअंदाज नहीं कर रही. यूपीएग्रीज परियोजना,
एग्रीएक्सपोर्ट हब, सोलर पंप योजना, निजी नलकूपों के लिए 2,400 करोड़ रुपए की बिजली सहायता और प्राकृतिक खेती के लिए प्रावधान किसानों को लागत कम करने और आय बढ़ाने की दिशा में कदम हैं. उद्यान, फूड प्रोसेसिंग, दुग्ध विकास और मत्स्य क्षेत्र में बड़े आवंटन ग्रामीण क्षेत्रों में वैल्यू एडिशन और रोजगार सृजन की कोशिश है. पशुधन और गो-आश्रय स्थलों के लिए 2,000 करोड़ रुपए का प्रावधान सामाजिक और राजनैतिक दोनों संदेश देता है. कृषि अर्थशास्त्री डॉ. ममता जोशी का कहना है कि ''यदि एग्रीएक्सपोर्ट हब और खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां जमीन पर उतरती हैं तो किसानों को बेहतर बाजार और मूल्य मिल सकता है. लेकिन सफलता लॉजिस्टिक्स और निर्यात क्षमता पर निर्भर करेगी.''
राजनैतिक संदेश क्या है
यह बजट स्पष्ट रूप से तीन स्तरों पर संदेश देता है. पहला, राज्य खुद को टेक और मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करना चाहता है. दूसरा, युवा और महिला मतदाताओं को अवसर आधारित सशक्तीकरण का भरोसा देना. तीसरा, किसानों को लागत राहत और बाजार विस्तार का संकेत. हालांकि कुछ आर्थिक विशेषज्ञ योगी सरकार के ताजा बजट पर संदेह भी जाहिर कर रहे हैं. लखनऊ में विद्यांत कॉलेज में अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर मनीष हिंदवी का कहना है कि बजट में तकनीक, एआइ और कौशल विकास पर बड़े प्रावधान जरूर किए गए हैं, लेकिन इनके लिए स्पष्ट रोजगार लक्ष्य और समयबद्ध परिणामों की रूपरेखा सामने नहीं रखी गई.
उनके मुताबिक, आइटी और डेटा सेंटर निवेश की घोषणाएं केवल देखने में प्रभावशाली हैं, साथ ही निजी निवेश के वास्तविक प्रवाह और स्थानीय युवाओं को मिलने वाले प्रत्यक्ष रोजगार के आंकड़े अस्पष्ट हैं. कृषि और कौशल योजनाओं में भी आवंटन बढ़ा है, लेकिन पिछली योजनाओं के मूल्यांकन और उनकी सफलता दर पर ठोस डेटा नहीं दिया गया. बिना पारदर्शी मॉनिटरिंग के बड़े बजट आवंटन अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे.
लोकलुभावन घोषणाओं से दूरी बनाकर सरकार ने यह दिखाने की कोशिश जरूर की है कि वह वित्तीय अनुशासन और विकास मॉडल पर टिके रहना चाहती है. दूसरे कार्यकाल के अंतिम पूर्ण बजट में योगी सरकार ने मुफ्त योजनाओं की चमक के बजाय तकनीक, कौशल और उत्पादन आधारित विकास मॉडल पर दांव लगाया है. अब नजर इस पर रहेगी कि ये घोषणाएं जमीन पर कितनी तेजी और प्रभावशीलता से उतरती हैं, क्योंकि आखिरकार चुनावी वर्ष में असली परीक्षा आंकड़ों की नहीं, उनके असर की होती है.