इंदौर की साख पर बट्टा

न्यायिक आयोग की तरफ से साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया फिर शुरू करने के साथ ही इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों की गहन जांच पर अब सबकी नजरें टिकी हैं

5 जनवरी को इंदौर के भागीरथपुरा में टैंकर से पानी भरने जुटे निवासी

मध्य प्रदेश के लिए 2026 की शुरुआत बेहद खराब रही. लगातार आठ वर्ष तक भारत के 'सबसे स्वच्छ शहर' का तमगा धारण करने वाले इंदौर से दिसंबर के अंत में नल के पानी के गंदे और बदबूदार होने की सैकड़ों शिकायतें सामने आईं. फिर, पेट संबंधी बीमारियां फैलने के बाद शहर के भागीरथपुरा इलाके में पहली मौतें दर्ज की गईं. ताजा आंकड़े बताते हैं कि 30 से अधिक निवासियों की जान जा चुकी है. हक्रतों के आक्रोश के बाद मामले की न्यायिक जांच पर सबकी नजरें टिकी हैं.

हाइकोर्ट के सेवानिवृत्त जज एस.के. गुप्ता की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग ने जांच शुरू कर दी है. 9 फरवरी को आयोग ने जनता से साक्ष्य पेश करने का आह्वान किया. प्रभावित नागरिक, परिजन, चिकित्सा कर्मी, सामाजिक संगठन, ठेकेदार, अधिकारी या प्रासंगिक जानकारी रखने वाले व्यक्ति 28 फरवरी तक, उसे आयोग के पास जमा करा सकते हैं. इसमें शिकायतें, पाइपलाइन रिसाव की तस्वीरें या वीडियो, सीवेज रिसाव, निविदा दस्तावेज, कार्य आदेश, निरीक्षण रिपोर्ट, चिकित्सा रिकॉर्ड, मृत्यु प्रमाणपत्र या कोई अन्य भौतिक दस्तावेज हो सकते हैं.

कार्यवाही शुरू होने के चार सप्ताह के भीतर आयोग को अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है. 27 जनवरी को कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद न्यायालय ने सरकार के नेतृत्व में आंतरिक जांच से इनकार करते हुए 'तत्काल न्यायिक जांच' का आदेश जारी कर दिया. 

दूषित पानी से जुड़ी बीमारी
दिसंबर के अंत तक जब बड़ी संख्या में भागीरथपुरा के निवासियों के पेट संबंधी बीमारियों से ग्रसित होने की जानकारी सामने आई और यह भी देखा गया कि वहां पाइप से आने वाला पानी साफ नहीं दिख रहा तो लोगों ने दोनों बातों को एक साथ जोड़कर देखा. स्थानीय निवासियों का कहना है कि 28 दिसंबर को पहली मौत हुई. एक दिन बाद, नगरपालिका का पानी बंद कर दिया गया; टैंकर भेजे गए. 30 दिसंबर को इंदौर नगर निगम (आइएमसी) ने जांच शुरू की. पानी की मुख्य आपूर्ति लाइन में रिसाव था और पुलिस चौकी से जुड़े शौचालय से निकलने वाला गंदा पानी उसे दूषित कर रहा था.

आधिकारिक तौर पर दर्ज 16 मौतों का आंकड़ा वास्तविक संख्या के मुकाबले आधे से भी कम माना जा रहा है. हजारों लोग प्रभावित हुए हैं; 437 लोगों को अस्पतालों में भर्ती कराने की नौबत आई; इससे करीब तीन गुना अधिक लोगों की पेट की समस्याएं हुईं लेकिन उनका इलाज घर पर ही किया गया. प्रयोगशाला परीक्षणों के दौरान पानी में जानलेवा 'बहुसूक्ष्मजीव' ई. कोलाई, साल्मोनेला और विब्रियो कोलेरा मिलने की पुष्टि हुई. इसकी वजह से कई लोग सेप्सिस और लिवर तथा किडनी संबंधी बीमारियों के शिकार बने.

इंदौर का पतन
निवासी इसके लिए प्रशासन के 'दिखावटी रवैये' को जिम्मेदार मानते हैं, जिसमें बुनियादी बातों की अनदेखी की गई. संकरी गलियों वाला भागीरथपुरा 1980 के दशक में अनियोजित तरीके से बसा मोहल्ला है, जिसमें मुख्य रूप से प्रवासी मजदूर रहते थे. इसका सीवेज नेटवर्क 1990 के दशक में बिछा था; जलापूर्ति लाइन भी उसी दशक में पड़ी थी; नर्मदा जल आपूर्ति 2000 के दशक की शुरुआत में शुरू हुई. क्षतिग्रस्त पाइपलाइनों को लेकर शिकायतें 2024 से आ रही हैं. शर्मनाक पहलू यह है कि नगर निगम अधिकारियों को स्थिति का अंदाजा था लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक खींचतान के चलते इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

साल 2021 में आदेश दिया गया कि इलाके की कुछ पाइपलाइनों को बदला जाए; एचडीपीई पाइपों का उपयोग करने के लिए 2.66 करोड़ रुपए की परियोजना को मंजूरी दी गई. काम आवंटित होने में ही दो साल लग गए. सबसे अधिक पांच माह की देरी महापौर कार्यालय में हुई. केवल तीन-चौथाई काम ही पूरा हो पाया. नवंबर 2024 में शेष पाइपलाइनों को बदलने के लिए 3.26 करोड़ रुपए की परियोजना शुरू की गई (जिसे बाद में घटाकर 2.83 करोड़ रुपए कर दिया गया). निविदा जारी की गई, लेकिन मौतों की खबरें आने के बाद ही प्रक्रिया में तेजी आई.

कई लोगों का मानना है कि इंदौर के शासन पर सत्तारूढ़ भाजपा की आंतरिक राजनीति का गहरा असर पड़ता है. मध्य प्रदेश की वाणिज्यिक राजधानी होने के नाते राजनेता इस पर नियंत्रण रखना चाहते हैं, और सरकारी पद सबसे पसंदीदा अफसरों के लिए आरक्षित हैं. जिला प्रभारी मंत्री और मुख्यमंत्री मोहन यादव के राज्य के शहरी प्रशासन मंत्री और इंदौर-1 से विधायक कैलाश विजयवर्गीय के साथ रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. भागीरथपुरा इंदौर-1 विधानसभा क्षेत्र के तहत ही आता है.

विजयवर्गीय के प्रभाव को नौकरशाही निगरानी के जरिए नियंत्रित करना जाहिर तौर पर सभी मुख्यमंत्रियों की रणनीति रही है. यह आसान नहीं है. विजयवर्गीय के करीबी माने जाने वाले इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव के नगर निगम आयुक्त दिलीप यादव से संबंध अच्छे नहीं थे, जिनका उस घटना के बाद तबादला कर दिया गया. दरअसल, भार्गव ने अपने कार्यकाल में कई आयुक्तों को बदलते देखा है.

न्यायिक आयोग के गठन का कारण बनने वाली जनहित याचिकाओं में से एक को दायर करने वाले गैर-सरकारी संगठन के संस्थापक किशोर कोडवानी कहते हैं, ''स्वच्छता पुरस्कार भी साफ-सुथरा नहीं हैं. यहां कूड़े के पहाड़ क्यों हैं, जहां आग लगने की घटनाएं होती रहती हैं? इंदौर अंधों में काने राजा की कहावत को ही चरितार्थ करता है.''

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