ओडिशा में प्रदर्शनकारियों के निशाने पर क्यों हैं बांग्ला भाषी?
गांव फूंक डाला, व्यापारियों को कैद कर लिया, मजदूरों पर हमला किया. ओडिशा में यह सब शुरू तो बांग्लादेशी-विरोधी सोच के साथ हुआ था, मगर देखते-देखते यह बांग्ला भाषियों के खिलाफ नफरत में बदल गया

बंगाल और ओडिशा को दो भागों में बांटने वाली रेखा आधुनिक नक्शानवीस की देन है. अपने मूल रूप में तो दंडभुक्ति एक ही जीवन-जगत का हिस्सा था. नदियों, व्यापारियों, तीर्थयात्रियों, देवी-देवताओं, कवियों, कलाकारों और प्रतीकों का बुना एक जीवनजाल.
बंगाल की खाड़ी की तटरेखा ने इसे बांटा नहीं बल्कि एकजुट किया. लेकिन इतिहास के विरोधाभासों की चरम सीमा देखनी हो तो 2025 का उत्तरार्ध सबसे उम्दा मिसाल है. ओडिशा में अवैध प्रवासन के खिलाफ चला अभियान, जो उस समय काफी लोकप्रिय हुआ.
अब संदेह, नफरत और हिंसा की खतरनाक लहर बन गया है और निशाने पर हैं बांग्ला भाषी प्रवासी.
पूरे ओडिशा में सामने आ रही घटनाओं में एक समानता दिख रही है और यह काफी चिंताजनक भी है—एक ही समय में मुसलमान और बंगाली होना पहली नजर में किसी अपराध से कम नहीं लगता. दिसंबर से ठीक पहले नयागढ़ में मुर्शिदाबाद के चार छोटे कारोबारियों को पुलिस ने रोका और 72 घंटे के अंदर अपना सामान समेटने का फरमान सुनाया.
उनके आधार कार्ड और मतदाता पहचानपत्र छीन लिए गए, उनके बांग्ला बोलने के तरीके को तुरंत 'विदेशी' होने का प्रमाण मान लिया गया. वे बिक्री के लिए रखे गर्म कपड़ों और अन्य चीजों समेत लाखों का सामान छोड़कर भाग गए. अगस्त में भुवनेश्वर में मुर्शिदाबाद के आठ मजदूरों पर आधी रात को भीड़ ने अचानक हमला किया.
उन्होंने बोतलें, डंडे फेंके और उन पर 'बांग्लादेशी मवेशी चोर' होने का आरोप लगाया. अफसरों ने भी इसमें पूरा साथ दिया. जुलाई में इस समूह के सैकड़ों लोगों को संदेह के आधार पर हिरासत में लिया गया, फिर छोड़ दिया गया. बढ़ता गुस्सा
पर जैसा कि अक्सर पूरे भारत में देखा जा रहा है, इस वैमनस्य की जड़ें और भी गहरी हैं. जो लोग बांग्ला बोलते हैं, उन्हें पहले ही संदेह की नजर से देखा जाता है—इसमें धर्म कोई मायने नहीं रखता. ताजी मिसाल भयावह हिंसा की घटना के तौर पर सामने है. जगह: एमवी-26, ओडिशा के मलकानगिरी का एक गांव. इसका ब्यूरोक्रेटिक नाम इसका इतिहास बताने के लिए काफी है.
दरअसल, यह उन बस्तियों में से एक है जिन्हें उस समय पूर्वी पाकिस्तान से भागकर आए हिंदू शरणार्थियों के लिए बसाया गया था. अब यहां एक नई सरहद खिंच गई है, यह एक नए विभाजन की पटकथा बनता जा रहा है.
घटनाक्रम की शुरुआत सबसे पहले एक कोया आदिवासी महिला लेक पोडियामी की सिर कटी लाश एक नदी में मिलने के साथ हुई. एमवी-26 से एक बंगाली सुभरंजन मंडल को गिरफ्तार किया गया. इसने एक नई इबारत लिख दी. करीब 5,000 लोगों की भीड़ ने उस बस्ती पर धावा बोल दिया जहां करीब सौ बंगाली परिवार रहते हैं. उनके घरों, सामान और गाड़ियों में आग लगा दी गई. अब राख के इन्हीं ढेरों के बीच पुलिस और अर्धसैनिक बल के जवान पहरा दे रहे हैं.
सीमा के ठीक उस पार पश्चिम बंगाल में तटीय क्षेत्र दीघा ने भी कुछ इसी तर्ज पर गुस्से का इजहार करना मुनासिब माना. नवंबर में स्थानीय दुकानदारों ने यह मांग उठानी शुरू कर दी कि पर्यटन नगरी में सामान बेचने वाले करीब 150 ओडिया व्यापारियों को यहां से बाहर निकाल दिया जाए. जिला प्रशासन ने भी इससे सहमति जताई और इन लोगों को बाहर करने के आदेश को गैर-कानूनी कब्जेदारों के खिलाफ व्यापक मुहिम का रूप दिया गया. बहरहाल, ओडिया लोगों ने अपनी परेशानी को लेकर कुछ स्थानीय सामाजिक संगठनों से संपर्क साधा और वे मदद के लिए आगे भी आए. इसके साथ ही उन्हें निकालने के आदेश वापस ले लिए गए.
फिर ओडिशा के बालेश्वर की बात करते हैं. तो यहां स्थित चंदनेश्वर दीघा के पीड़ितों का घर है. यहां के तमाम लोग दीघा में छोटे-मोटे कारोबार चलाकर अपनी आजीविका कमाते हैं. स्थानीय लोगों ने यहां बसे बंगाली व्यापारियों से अपनी दुकानें बंद करके चले जाने को कहा. भले ही इसके पीछे गहरी नफरत की भावना नहीं छिपी थी लेकिन एक तरह से बदले की कार्रवाई जरूर थी. इन्हें सुलझाने के प्रयासों ने माहौल शांत करने में कोई खास मदद नहीं की.
केवल इस्लामोफोबिया ही नहीं
इतिहासकार पहले के शांतिपूर्ण माहौल को याद करते हैं. निवेदिता मोहंती कहती हैं कि एक समय था जब ये समुदाय केवल रसगुल्ले की उत्पत्ति जैसे मामूली मुद्दों पर ही आपस में बहस करते थे. नालंदा यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर कशफ गनी कहते हैं कि ये क्षेत्र हर मोर्चे पर एक दूसरे के साथ जुड़े थे, मसलन: दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार, मराठों के खिलाफ युद्ध, ओडिशा के कुछ हिस्सों पर बंगालियों का शासन और ओडिया लेखकों का बांग्ला कहानियों को अपनी लिपि में लिखना आदि.
महिषादल राज कॉलेज के अरिंदम चक्रवर्ती बताते हैं कि बालेश्वर के रेमुना स्थित ओडिया साहित्य के महान विद्वान फकीर मोहन सेनापति के विद्यालय को ओडिया कुलीन वर्ग ने नहीं बल्कि एक बंगाली जमींदार ने वित्त पोषित किया था और जगन्नाथ रथ यात्रा बंगाल में भी उतनी ही धूमधाम से निकाली जाती है, जितनी पुरी में. विद्वानों की आम राय यही है कि वर्तमान में जो कुछ हो रहा है वह इस्लामोफोबिया की बढ़ती भावना का अपनी सीमाएं तोड़कर और आगे निकल जाने का मामला है.
हालांकि, घटनाओं को गौर से देखें तो यह एक अधिक जटिल अंतर्संबंधों में उलझी नजर आती है. सबसे ज्यादा पीड़ित वे लोग होते हैं जो अपनी गरीबी के कारण मौसमी प्रवास और श्रम पर निर्भर रहने को मजबूर होते हैं.
खास बातें
> हत्या की एक वारदात के बाद एमवी-26 नामक गांव में भीड़ ने जमकर तोड़फोड़ की
> बदले वाली भावना के तहत बालेश्वर में बंगाली कारोबारियों को चले जाने कहा गया