झारखंड : हेमंत सोरेन पर अब किस घोटाले को लेकर लग रहे आरोप?
जिस फंड को खनन से प्रभावित लोगों के कल्याण पर खर्च किया जाना था, कथित रूप से उसमें करोड़ों रुपयों का हुआ फर्जीवाड़ा

जमीन घोटाले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को फौरी राहत मिली नहीं कि उन पर एक और घोटाले का आरोप लग गया है. सीधे तौर पर नहीं, बल्कि एक आईएएस अधिकारी विजया जाधव के रास्ते इसकी आंच उन तक पहुंची है. एक आरटीआई के खुलासे और भाजपा के आरोप के मुताबिक, केवल बोकारो जिले में इसमें 631 करोड़ रुपए का घोटाला हुआ. यह हेराफेरी जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) के जरिए हुई है.
आरोपों के मुताबिक, बोकारो जिले के एक स्कूल में साल 2022-23 में 13.10 लाख रुपए से बाला (बिल्डिंग ऐज लर्निंग ऐड) पेंटिंग कराई गई. उसी स्कूल में 2024 में भी 4.79 करोड़ रुपए इसी बाला पेंटिंग पर खर्च कर दिए गए. यानी पूरे स्कूल भवन की जितनी लागत नहीं थी, उससे ज्यादा दीवार पेंटिंग पर खर्च किए गए.
पूरे जिले में इसके ऊपर 60 करोड़ रुपए डीएमएफटी फंड से खर्च किए गए. कौशल विकास के नाम पर छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए प्रति छात्र 1 लाख रुपए का बिल लगाया गया और पूरे जिले में इसके नाम पर 40 करोड़ रुपए खर्च हुए. जिस भवन को कौशल विकास केंद्र दिखाया गया, वह बंद मिला. पूरे जिले के कुल 967 सरकारी स्कूलों में तड़ित चालक यानी लाइटनिंग कंडक्टर लगाने के लिए पांच अलग-अलग दरें तय की गईं. एक ही कंपनी को कभी प्रति यूनिट 1.80 लाख रुपए तो कभी 5.37 लाख रुपए भुगतान किए गए.
RTI से यह सारी जानकारी निकालने वाले वकील डॉ. राजकुमार बताते हैं, ''जिस डिजिटल मैट की कीमत खुले बाजारों में 10 हजार रुपए है, उसके लिए प्रति यूनिट 1.25 लाख रुपए से ज्यादा भुगतान किया गया. कुल 1,666 आंगनबाड़ी केंद्रों में ये लगाई गई हैं. स्कूलों में टैब लैब बनाने के लिए एक ही दिन में एक ही कंपनी को दो अलग दर से भुगतान हुए. पहले टेंडर में 60 स्कूलों में टैब लैब लगाने के लिए प्रति यूनिट 8.30 लाख रुपए तो उसी तारीख में दूसरे टेंडर में मात्र 20 स्कूलों के लिए प्रति यूनिट 24.95 लाख रुपए भुगतान किए गए.'' वे कहते हैं, ''जिन चीजों पर डीएमएफटी के पैसे खर्च हुए, उसके बाजार मूल्य और सरकार ने जो भुगतान किया, उसके बीच 631 करोड़ रुपए का फर्क है. साफ है, इतने पैसे का घोटाला हुआ.''
ये कथित घोटाले जब हुए, उस दौरान विजया जाधव बोकारो की जिलाधिकारी थीं. नियम के मुताबिक, डीएमएफटी के तहत कोई भी जिलाधिकारी 5 करोड़ रुपए से ज्यादा का टेंडर नहीं निकाल सकता. इससे ज्यादा के लिए उन्हें कैबिनेट मंजूरी की जरूरत होती है. मगर बोकारो में 13 करोड़ रुपए से ज्यादा के टेंडर निकाल दिए गए. इस खुलासे पर हाइकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया. मामले की पहली सुनवाई बीते 16 सितंबर को हुई. कोर्ट ने राज्य सरकार को शपथपत्र दायर करने कहा है.
भाजपा इस मौके को कैसे छोड़ती! उसने 8 सितंबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. पूर्व सीएम और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने चेतावनी दी, ''हेमंत सोरेन इसकी जांच के आदेश दें वरना दूसरी बार जेल जाने के लिए तैयार रहें. अफसरों के अलावा सीएम खुद इसमें शामिल हैं. उनके संरक्षण और जानकारी में यह लूट हुई है. आइटीआइ का इस्तेमाल करने वाले लोगों को धमकाया जा रहा है.'' उन्होंने आरोप लगाया कि सोरेन ने बिहार में चुनाव लड़ने के लिए यह घोटाला किया है.
जेएमएम ने पलटवार किया. पार्टी के प्रवक्ता मनोज पांडेय ने कहा, ''बाबूलाल मरांडी सर ऊंचा कर थूकने का प्रयास कर रहे हैं. कोई मुखिया अगर घोटाला कर देगा तो क्या वह बात मुख्यमंत्री तक जाएगी? उनको जानकारी होनी चाहिए कि डीएमएफटी की मॉनिटरिंग स्थानीय जन प्रतिनिधि करते हैं.'' जेएमएम गठबंधन की साथी कांग्रेस की बोकारो विधायक श्वेता सिंह कहती हैं, ''जिस
आईएएस अधिकारी विजया जाधव पर इस घोटाले का आरोप है, उनकी शिकायत मैंने मार्च में ही एसीबी से की थी. हमारी सरकार ऐसे किसी अधिकारी को छोड़ने वाली नहीं.'' वहीं, जाधव ने सफाई दी है, ''सभी कार्यादेश समिति की बैठक में सभी सदस्यों की सहमति के बाद पारित किए गए. कहीं कोई गड़बड़ी नहीं है. जिस टेंडर में जितनी न्यूनतम राशि थी, उसी पर टेंडर दिया गया है.''
सभी 24 जिलों में किसी न किसी खनिज का खनन किया जा रहा है. 2024 में दिसंबर तक सभी जिलों को मिलाकर कुल 13,859.46 करोड़ रुपए आए थे. उनमें से 9,568.5 करोड़ रुपए सिर्फ कोयला से मिले थे. केंद्र सरकार ने सितंबर 2015 में प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना शुरू की थी.
राज्यों को निर्देश दिया था कि इसे डीएमएफटी के तहत शामिल करें. उसके मुताबिक, किसी जिले में चल रहे कुल खनन की 10 से 30 फीसद रॉयल्टी जिला के खाते में देनी होती है. इसका मुख्य उद्देश्य खनन प्रभावित क्षेत्रों में विकास और लोगों के स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारने पर खर्च करना है.
अब इन उद्देश्यों की पूर्ति का तरीका देखिए. बोकारो स्टील सिटी टाउनशिप में 1.08 करोड़ रुपए की लागत से ओपन जिम, रांची के मैक्लुस्कीगंज में 86 लाख रुपए की लागत से डाकबंगला, चतरा जिले के विभिन्न थानों में 1.15 करोड़ की लागत से शौचालय मरम्मत और 4.25 करोड़ में हैंडपंप लगा दिया. यह सब प्रधान महालेखाकार ने 2022 में अपनी ऑडिट रिपोर्ट में बताया था. ये सभी गड़बड़ियां 2016 से 2021 तक हुईं. रघुबर दास और हेमंत सोरेन, दोनों के कार्यकाल में यह हुआ.
अब इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर RTI कार्यकर्ता पंकज कुमार यादव ने 9 सितंबर को हाइकोर्ट में पीआइएल दायर की. उन्होंने कोर्ट से अपील की है कि 2016 से अब तक पूरे राज्य में इस तरह की गड़बड़ियों की जांच कराने का आदेश दिया जाए. अब देखना है कि कोर्ट का क्या रुख रहता है.