राजस्थान: शिक्षा पर जारी सियासी टकराव से छात्रों का कैसे हो रहा नुकसान?
राजस्थान में किताबों पर विवाद कोई नई बात नहीं है. एक बार फिर शिक्षा विभाग ने इतिहास के किताब को बदलने का फैसला किया है.

राजस्थान में जिस तरह हर पांच साल में सरकारें बदल रही हैं उसी तर्ज पर स्कूली पाठ्यपुस्तकें बदलने का भी रिवाज बन गया है. ये बदलाव नई खोज, नए विषय के लिए नहीं बल्कि सियासी विचारधारा के आधार पर हो रहे हैं.
जब से आरएसएस की पृष्ठभूमि से आए मदन दिलावर शिक्षामंत्री बने हैं तब से कुछ ज्यादा ही बवाल मचा हुआ है. ताजा विवाद राजस्थान में कक्षा 11वीं और 12वीं में पढ़ाई जा रही आजादी के बाद का स्वर्णिम इतिहास किताब पर सामने आया है.
प्रदेश में अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में कोर्स में शामिल की गई इस किताब को शिक्षा मंत्री दिलावर ने यह कहकर स्कूलों से वापस मंगवा लिया कि इसमें गांधी-नेहरू परिवार का महिमामंडन किया गया है. शिक्षा मंत्री के फैसले से पूर्व किताब के प्रकाशन पर ढाई करोड़ रुपए से ज्यादा राशि खर्च कर दी गई और इसकी 4.80 लाख प्रतियां स्कूलों में वितरित की जा चुकी थीं.
विवाद पर गहलोत का कहना था, ''आजादी के बाद का स्वर्णिम भारत किताब पर रोक लगाकर उसे स्कूलों से वापस मंगवाने का फैसला पूरी तरह हास्यास्पद है. करोड़ों रुपए की किताबों को रद्दी करने से बेहतर होता कि भाजपा देश के विकास में अपने प्रधानमंत्रियों के योगदान के कुछ अतिरिक्त पृष्ठ छपवाकर उन्हें किताब में शामिल कर लेती.''
इस पर दिलावर का तंज था, ''किताब में सरदार वल्लभभाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री, डॉ. बी.आर. आंबेडकर और जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे नेताओं का नाम तक नहीं है. सिर्फ गांधी-नेहरू परिवार का महिमामंडन है. पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत और पूर्व सीएम वसुंधराराजे का जिक्र भी नहीं है.''
यहां पर बता दें कि आजादी के बाद का स्वर्णिम भारत किताब में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर 23 पेज हैं जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कार्यकाल की जानकारी डेढ़ पन्नों में है. किताब में दिवंगत राजीव गांधी के जीवन और उनके कार्यकाल पर 11 पेज हैं. जवाहर लाल नेहरू के 11 चित्र, इंदिरा गांधी के आठ चित्र, राजीव गांधी और मनमोहन सिंह के चार-चार चित्र शामिल किए गए. किताब में आंबेडकर, शास्त्री और सरदार पटेल जैसे नेताओं को भी अपर्याप्त स्थान देने के आरोप लगाए जा रहे हैं.
कुछ दिनों पहले सरकार ने कक्षा 12वीं के कोर्स में शामिल पूर्व आइएएस अफसर हर्ष मंदर की अदृश्य भारत—उम्मीद व साहस की कहानियां और माधव गाडगिल की पुस्तक जीवन की बहार को हटाकर सज्जन सिंह यादव की भारत की वैक्सीन विकास गाथा और राजस्थान भाषा की किताब चिड़ी को मोती लादीओ को शामिल कर लिया.
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष और पूर्व शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा का कहना है, ''मोदी ने कोई ऐसा काम ही नहीं किया जो देश के विकास में योगदान में गिना जाए तो किताब में उनका झूठा बखान कैसे किया जाता?'' राजस्थान में किताबों पर विवाद कोई नई बात नहीं है. पहले 'अकबर महान' का पाठ गायब किया जा चुका है. विवाद की वजह कुछ भी हो पर शिक्षा पर सियासी टकराव छात्रों और सरकारी खजाने पर तो भारी पड़ ही रहा है.
खास बातें
> 'आजादी के बाद का स्वर्णिम भारत' किताब को सरकार ने वापस मंगवाया.
> इसमें पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर 23 पेज जबकि नरेंद्र मोदी कार्यकाल पर डेढ़ पेज थे.