उत्तर प्रदेश: योगी सरकार के स्कूल मर्जर फैसले का क्यों हो रहा विरोध?

यूपी में कम छात्र संख्या वाले प्राइमरी स्कूलों का दूसरे विद्यालय में विलय करने के फैसले का तेजी से विरोध हो रहा है.

मलिहाबाद के सदरपुर में बंद पड़ा एक प्राथमिक विद्यालय

लखनऊ से 35 किमी दूर मलिहाबाद में आम के बागों से घिरा एक गांव है सदरपुर. गांव के पश्चिमी छोर पर मौजूद प्राथमिक विद्यालय सदरपुर इन दिनों बंद पड़ा है. परिसर में लंबी-लंबी घास उग आई है. पास में रहने वाली आठ वर्षीया अदीबा इसी स्कूल की कक्षा तीन में पढ़ती थी.

एक रोज वह घर से स्कूल आई तो पता चला कि यह बंद हो गया है. टीचर ने उसे बताया कि अब यहां पढ़ने वाले बच्चे दूसरे स्कूल कंपोजिट विद्यालय मुजासा में पढ़ेंगे. घर से तीन किलोमीटर से ज्यादा दूरी, सुनसान रास्ता और बीच में दिल्ली जाती व्यस्त रूट वाली रेलवे लाइन पड़ने से परिजनों ने अदीबा को दूसरे स्कूल पढ़ने जाने से मना कर दिया.

अदीबा रोज अपने गांव के बंद पड़े स्कूल में आती है. कुछ देर निहारती है, फिर घर लौट जाती है. अदीबा ही नहीं, सदरपुर के प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले 30 से ज्यादा बच्चों की पढ़ाई छूटती लग रही है. यहां तैनात शिक्षा मित्र सीमा गौतम रोज परिजनों से विनती कर रही हैं लेकिन वे अपने बच्चों को मुजासा भेजने को तैयार नहीं हैं.

लखनऊ-मलिहाबाद हाइवे के किनारे मौजूद कंपोजिट स्कूल मुजासा में एक ही परिसर में प्राइमरी और जूनियर कक्षाएं, आंगनबाड़ी और ग्राम पंचायत का दफ्तर है. जगह की कमी के चलते यहां एक ही कमरे में कक्षा एक और दो की कक्षाएं चलती हैं. दो शिक्षक अगल-बगल बैठे कक्षा एक और दो के बच्चों को पढ़ाते हैं. यहां अगर सदरपुर के भी बच्चे आ गए तो उनके बैठने की व्यवस्था कैसे होगी? फिलहाल सदरपुर प्राथमिक विद्यालय का कोई भी बच्चा मुजासा आने को तैयार नहीं. वे सब बिना पढ़ाई के घर पर बैठे हैं.

मुजासा से करीब 50 किलोमीटर दूर सीतापुर-लखनऊ हाइवे के किनारे मौजूद प्राथमिक विद्यालय पालपुर को पिछले साल ही मॉडल स्कूल घोषित किया गया था. यहां बच्चों के लिए वाइफाइ, स्मार्ट क्लास की सुविधा थी. इस स्मार्ट विद्यालय का विलय तीन किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर मौजूद दूसरी ग्राम पंचायत के पूर्व माध्यमिक विद्यालय रायपुर राजा में कर दिया गया, जिसका भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका है. एक से आठ तक के बच्चों के पढ़ने के लिए महज तीन कमरे ही हैं. बारिश के दिनों में क्लासरूम से पानी टपकता है.

पूर्व माध्यमिक विद्यालय रायपुर राजा में केवल पालपुर के ही नहीं बल्कि प्राथमिक विद्यालय रायपुर राजा का भी विलय कर दिया गया है. पहले से ही जगह और जर्जर भवन की समस्या से कराह रहे पूर्व माध्यमिक विद्यालय रायपुर राजा की हालत और भी दयनीय हो जाती अगर विलय वाले स्कूलों के सभी बच्चे यहां पहुंच जाते. दूरी ज्यादा होने के कारण पालपुर प्राथमिक विद्यालय का एक भी बच्चा रायपुर राजा में पढ़ने नहीं जा रहा. कक्षा पांच में पढ़ने वाली नौ वर्षीया अनुष्का भी उन्हीं में से है जो लगातार अपनी कक्षा में अव्वल आ रही है. फिलहाल पालपुर प्राइमरी स्कूल बंद होने से अनुष्का घर बैठी है.

इस तरह हजारों बच्चे बेसिक शिक्षा विभाग के तहत विलय किए गए प्राइमरी स्कूलों की गड़बड़ियों का शिकार होकर पढ़ाई से दूर हो गए हैं. ये समस्याएं उस वक्त शुरू हुईं जब 16 जून को बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार ने सभी जिलाधिकारियों को ''विद्यालयों में उपलब्ध संसाधनों का समन्वित उपयोग किए जाने के संबंध में'' विस्तृत आदेश भेजा. इसमें संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने के लिहाज से अपर्याप्त छात्र नामांकन वाले स्कूल का करीब के स्कूलों के साथ 'युग्मन' (पेयरिंग ऑफ स्कूल्स) करते हुए एक इकाई के रूप में स्थापित करने का जिक्र था. इसके बाद हर जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारियों (बीएसए) ने अपने स्तर पर यूपी में पूरे 10,827 विद्यालयों की पेयरिंग की है.

इस विलय में कई खामियां हैं. उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के उपाध्यक्ष आर.पी. मिश्र बताते हैं, ''बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से शिक्षक-छात्र अनुपात सही करने के लिए स्कूलों का विलय तो शुरू हो गया लेकिन इसके मानक नहीं स्पष्ट किए गए. विलय के लिए जारी निर्देश में कम छात्रों की कोई संख्या (मानक) नहीं तय की गई है. इस वजह से हर जिले के बीएसए अपने-अपने नियम चला रहे हैं. कहीं 10, कहीं 20 तो कहीं 50 छात्र संख्या वाले स्कूलों का भी दूसरे में विलय किया जा रहा है.'' दूरी का भी कोई ध्यान नहीं रखा गया है.

कहीं पर छात्रों को दो से तीन किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर स्कूल जाने की चुनौती है तो कहीं हाइवे और रेलवे लाइन पारकर नए स्कूल पहुंचने की जद्दोजहद है. प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित स्नातक एसोसिएशन के प्रांतीय अध्यक्ष विनय कुमार सिंह बताते हैं, ''गांव में घर के पास गरीब बच्चों का सरकारी स्कूल में पंजीकरण कराना पहले ही शिक्षकों के सामने एक बड़ी चुनौती थी.

अब विलय के बाद बच्चों के घर से स्कूल डेढ़ से तीन किलोमीटर दूर हो गए हैं. सरकार एक तरफ तो गरीबी उन्मूलन का अभियान चला रही है और दूसरी तरफ गरीब बच्चों को शिक्षा से दूर कर रही है.'' लखनऊ के बक्शी का तालाब स्थित पालपुर (सोनिकपुर) ग्राम पंचायत जैसे कई गांवों के अभिभावक परेशान हैं क्योंकि उनके गांव में एक ही विद्यालय था जिसमें वे अपने बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दिला रहे थे. अब स्कूल बंद हो गए हैं और दूरी भी बढ़ गई है तो ऐसे में अभिभावक अपने बच्चों को दूर स्कूल भेजने से कतरा रहे हैं.

कंपोजिट विद्यालय, मुजासा में एक ही कमरे में दो अलग-अलग क्लास की पढ़ाई

शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) के तहत 300 की आबादी वाले गांव में एक किलोमीटर के दायरे में 6-14 साल तक के बच्चों के लिए स्कूल अनिवार्य किया गया था. इसके तहत 2010 के आसपास हर एक किमी के दायरे में प्राइमरी स्कूल खुले और तीन किमी के दायरे और एक हजार की आबादी वाले गांवों में जूनियर हाइस्कूल खोले गए. मार्च 2018 में संसद में एक सवाल के लिखित जवाब में सरकार ने बताया था कि 2016 तक उत्तर प्रदेश में 1,62,645 प्राइमरी स्कूल थे, जिनमें से 34,151 स्कूलों में 50 से कम बच्चे पढ़ रहे थे.

कुछ साल बाद ये आंकड़े और कम हो गए. फरवरी में केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया था कि पिछले 10 साल में देश भर में करीब 90,000 सरकारी स्कूल बंद हुए हैं, जिनमें से करीब 25,000 स्कूल अकेले उत्तर प्रदेश में हैं. इसीलिए यूपी सरकार ने 50 छात्रों से कम वाले प्राइमरी स्कूलों के दूसरे स्कूलों में विलय का निर्देश दिया है. विलय के लिए सरकार ने 50 छात्रों की संख्या को मानक बनाया है लेकिन कुछ स्कूल ऐसे हैं जहां ज्यादा बच्चे होने के बावजूद उनका विलय किया गया है. उत्तर प्रदेश की शिक्षा महानिदेशक कंचन वर्मा का तर्क है, ''कुछ प्राथमिक स्कूल तो इतने छोटे हैं कि वहां पर संसाधनों का उपयोग ही नहीं हो पा रहा. एक या दो शिक्षक ही तैनात हैं. एक ही शिक्षक पहली से पांचवीं तक की कक्षा में सारे विषय पढ़ा रहा है.''

शिक्षा विभाग के तमाम दावों के बावजूद बच्चे विलय वाले स्कूल में पढ़ने को तैयार नहीं हैं. अधिकारियों का दावा है कि इन स्कूलों की पेयरिंग अभिभावकों और शिक्षकों की सहमति से की गई है. लेकिन कई जगह अभिभावक इसका विरोध कर रहे हैं. ऐसे ही हालात में ज्यादा दूरी होने पर छात्र संख्या बढ़ने और अन्य स्थानीय परिस्थितियों का हवाला देकर देवरिया में 30 स्कूलों की पेयरिंग निरस्त की गई है. लखनऊ के मुख्य विकास अधिकारी अजय जैन ने आदेश जारी कर विलय किए गए 169 स्कूलों के लिए तीन नोडल शिक्षकों की तैनाती की है. ये शिक्षक विलय किए गए स्कूलों में पुराने स्कूल के सभी बच्चों को लाने का प्रयास करेंगे. इस तरह पढ़ाने से पहले शिक्षक छात्रों को स्कूल लाने की जद्दोजहद कर रहे हैं.

बेसिक शिक्षा परिषद के अंतर्गत आने वाले स्कूलों में 2022-23 में नामांकन 1.92 करोड़ के अधिकतम स्तर पर पहुंच गया था. हालांकि, 2023-24 में यह आंकड़ा घटकर 1.68 करोड़ रह गया, यानी 24 लाख छात्रों की कमी. 2024-25 में नामांकन और घटकर 1.48 करोड़ रह गया, यानी 20 लाख छात्रों की कमी. कुल मिलाकर, सरकारी स्कूलों में लगातार तीन शैक्षणिक वर्षों में 44 लाख छात्रों की कमी देखी गई. मई माह में चालू 2025-26 सत्र में नामांकन का आंकड़ा करीब एक करोड़ के आसपास था, जिससे 2022-23 से छात्रों की कुल संख्या में लगभग 90 लाख की गिरावट आ चुकी है. अगर विलय किए गए स्कूलों में पुराने स्कूल के छात्र नहीं लौटे तो इस बार बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूल रिकॉर्ड 'ड्राप आउट' दर्ज करेंगे.

कंचन वर्मा स्कूलों की पेयरिंग में शिक्षकों, शिक्षा मित्र को लेकर की गई व्यवस्था की जानकारी देते हुए बताती हैं, ''शिक्षा मित्र विलय वाले स्कूलों में अपनी सेवाएं देगा. अगर स्वैच्छिक समायोजन के चलते शिक्षकों का ट्रांसफर नहीं हुआ है तो शिक्षक भी विलय वाले स्कूल में तैनात होंगे.'' यहां भी दुविधा है. अगर विलय किए गए स्कूल के शिक्षक भी दूसरे स्कूल भेजे गए और वहां स्थिति सरप्लस की हो गई तो क्या होगा? अगर दोनों स्कूल में हेड मास्टर हैं तो क्या एक स्कूल में दो हेडमास्टर होंगे? इसी तरह एक स्कूल में दो शिक्षा मित्र नहीं हो सकते.

प्राथमिक स्कूलों की पेयरिंग ने यूपी की राजनीति को गरमा दिया है. इसके खिलाफ सभी राजनैतिक दल विरोध में उतर आए हैं. समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस मुद्दे पर 'हमें चाहिए पाठशाला, बंद करो मधुशाला' का स्लोगन दिया है. पार्टी के नेता स्कूली बच्चों के साथ बंद हुए प्राथमिक विद्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं. इस पूरे प्रकरण में विपक्षी दलों की आक्रामकता के सामने यूपी के बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संदीप सिंह की चुप्पी भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को अखर रही है. अगर स्कूलों को लेकर ऐसा माहौल बना रहा तो इसकी कीमत भगवा खेमे को अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव में चुकानी पड़ेगी.

यूपी बोर्ड: विवादों की उपस्थिति

माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों और छात्रों की ऑनलाइन हाजिरी के आदेश का हो रहा विरोध. यूपी बोर्ड पर अधिकार से परे जाकर आदेश देने का लग रहा आरोप 

लखनऊ के मेहंदीगंज स्थित एक हजार से ज्यादा विद्यार्थियों वाले श्री योगेश्वर ऋषि कुल इंटर कॉलेज में सुबह आठ बजे से पहला पीरियड क्लास टीचर का होता है. क्लास टीचर एक-एक विद्यार्थी की उपस्थिति रजिस्टर में दर्ज करते हैं. लेकिन जुलाई से हर छात्र की मौजूदगी ऑनलाइन दर्ज करने के यूपी बोर्ड के फरमान से शिक्षकों के माथे पर पसीना आ रहा है. एक क्लास टीचर बताते हैं, ''विद्यालय में सिस्टम एक है, इसमें सभी 1,000 से ज्यादा विद्यार्थियों की उपस्थिति का ब्योरा भरने में सुबह के दो-तीन घंटे लग जा रहे हैं.''

लखनऊ शहर में तो गनीमत है पर दूरदराज के इलाकों में मौजूद माध्यमिक स्कूलों में तो और भी दिक्कतों का सामना कर पड़ रहा है. श्रावस्ती के एक माध्यमिक विद्यालय के प्रिंसिपल बताते हैं, ''मेरा स्कूल शहर से 40 किलोमीटर दूर है. जंगल के पास होने के चलते यहां पर इंटरनेट की समस्या है. यहां व्हाट्सऐप भी नहीं चलता, ऑनलाइन अटेंडेंस तो दूर की बात है.'' यह महज कुछ स्कूलों की बानगी नहीं, उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद या यूपी बोर्ड के 28,000 से ज्यादा स्कूलों में ज्यादातर छात्रों-शिक्षकों की ऑनलाइन उपस्थिति के नए फरमान से शिक्षक दिक्कतों का सामना कर रहे हैं.

वर्ष 2025 की बोर्ड परीक्षाओं में परीक्षर्थियों को पहली बार डिजिलॉकर में अंकपत्र भेजने जैसे सफल तकनीकी प्रयोग करने से उत्साहित यूपी बोर्ड ने 30 जून को उपस्थिति ऑनलाइन दर्ज करने का आदेश जारी किया था. बोर्ड के सचिव भगवती सिंह की तरफ से जारी आदेश में 1 जुलाई से माध्यमिक विद्यालयों में ऑनलाइन उपस्थिति बोर्ड के ही तैयार कराए गए मोबाइल ऐप या परिषद की वेबसाइट पर दर्ज करने का निर्देश दिया गया. आदेश के अनुसार, पहले पीरियड में प्रिंसिपल को यह हाजिरी अपलोड करनी होगी.

यही नहीं, गैरहाजिर बच्चों की अनुपस्थिति का कारण भी लिखना होगा. इसके बाद बोर्ड और शिक्षक आमने-सामने आ गए हैं. उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश मंत्री आर.के. त्रिवेदी कहते हैं, ''विरोध उपस्थिति का नहीं है, जो दोहरी व्यवस्था है उसका है. रजिस्टर पर जब उपस्थिति दर्ज ही हो रही है तो ऑनलाइन भी दर्ज करने से पठन-पाठन प्रभावित हो रहा है.''

त्रिवेदी के मुताबिक, कई स्कूल ऐसे हैं जहां इंटरनेट काम नहीं करता और न ही कंप्यूटर पर काम करने में दक्ष बाबू हैं. ऐसे में ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करने की चुनौतियों से शिक्षकों का समय खराब हो रहा है. वहीं कुछ शिक्षक आदेश को ही गलत ठहरा रहे हैं. गोरखपुर में सहजनवा के एक मिडिल स्कूल के प्रिंसिपल कहते हैं, ''ऑनलाइन अटेंडेंस का आदेश माध्यमिक शिक्षा निदेशालय की तरफ से आना चाहिए. यूपी बोर्ड एक परीक्षा एजेंसी है. बोर्ड को इस तरह का आदेश करने का कोई अधिकार नहीं.''

लखनऊ के एक स्कूल में ऑनलाइन हाजिरी की जद्दोजहद

हालांकि भगवती सिंह सभी आरोपों को खारिज करते हैं. वे कहते हैं, ''2022-23 में माध्यमिक शिक्षा परिषद की नई मान्यता शर्तों में यह स्पष्ट लिखा है कि हर विद्यालय ऑनलाइन अटेंडेंस भेजेगा. हमने इसी का पालन सुनिश्चित किया है.'' उनके मुताबिक, जब दूरदराज के स्कूलों में यूपी बोर्ड परीक्षाएं करा लेता है, सीसीटीवी से निगरानी हो जाती है तो ऑनलाइन उपस्थिति भी दर्ज की जा सकती है.

इससे बोर्ड उन छात्रों को चिन्हित कर सकेगा जो अपनी पसंद के परीक्षा सेंटर की आस में कई सरकारी स्कूलों में पंजीकरण करा लेते हैं. इस तकनीकी व्यवस्था को पूरी तरह अपनाने के लिए यूपी बोर्ड के प्रयागराज स्थित मुख्यालय को भी ई-ऑफिस में तब्दील किया गया है. इसके तहत विद्यालयों और छात्रों की समस्याओं के निबटारे की कार्रवाई अब ऑनलाइन ही होगी.

यह कोई पहला मौका नहीं है जब ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कराने की व्यवस्था को शिक्षकों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा हो. पिछले साल जुलाई में बेसिक शिक्षा परिषद ने सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति को डिजिटल करने का निर्णय लिया था. प्राथमिक शिक्षकों से लोकेशन के साथ अपनी रियलटाइम उपस्थिति दर्ज कराने की अपेक्षा की गई थी.

पारदर्शी व्यवस्था लागू करने की बेसिक शिक्षा विभाग की इस कवायद को शिक्षकों के तीखे प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था. नतीजा: बेसिक शिक्षा विभाग को शिक्षकों की ऑनलाइन हाजिरी व्यवस्था से कदम पीछे खींचने पड़े थे. अब कुछ ऐसे ही नतीजे की आस लेकर माध्यमिक शिक्षा परिषद से जुड़े विद्यालयों के शिक्षक विरोध पर उतर आए हैं. पर यूपी बोर्ड फिलहाल अपने कदम पीछे खींचने को कतई तैयार नहीं.

माध्यमिक शिक्षा परिषद की नई मान्यता शर्तों में हर विद्यालय को ऑनलाइन अटेंडेंस भेजने का जिक्र है.

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