सुर्खियों के सरताज 2024: गुमनामी से छलांग लगाकर वापसी करने वाले नेता चंद्रबाबू नायडू की कहानी

2024 लोकसभा चुनाव में गुमनामी से लंबी छलांग लगाकर चंद्रबाबू नायडू वापस उस जगह आए, जहां वे आंध्र प्रदेश और यहां तक कि केंद्र सरकार की भी किस्मत लिख रहे हैं...

Newsmakers 2024
एन. चंद्रबाबू नायडू

नारा चंद्रबाबू नायडू भारत के गणतंत्र बनने से बहुत पीछे नहीं हैं. जब वह अपने 75 साल पूरा करेगा, उसी के आसपास आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी इतने ही साल के हो जाएंगे. नायडू का जन्म अप्रैल 1950 में हुआ था.

देश के आधुनिक चुनावी लोकतंत्र बनने के सिर्फ तीन महीने बाद. अपनी जिंदगी के इस ऐतिहासिक पड़ाव पर पहुंचने से साल भर पहले 2024 में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के सुप्रीमो अपने समकालीनों के बीच चमत्कारों में से एक साबित हुए.

राजनीति के 49वें वर्ष में प्रवेश कर रहे नायडू के करियर की शुरुआत 1975 में युवा कांग्रेस नेता के तौर पर हुई और आपातकाल के साये वाले दिनों में साल 1978 में वे पहली बार विधायक बने. ग्रैंड ओल्ड पार्टी के इस 28 वर्षीय स्थानीय युवा तुर्क को 1980 में पहली बार मंत्री बनाया गया. और अब उन्होंने लगभग गुमनामी से छलांग लगाते हुए वापसी की है और राजनीति के अखाड़े राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की परिधि पर नहीं, बल्कि उसके बीच में अहम भूमिका निभा रहे हैं. साथ ही आंध्र की राजधानी का उनका सपना भी अब उनके बहुत निकट है.

सामान्य परिस्थितियों में उनकी पिछली कहानी के अंत में एक रिटायरमेंट होम की जरूरत होती: दूसरे दौर (1995-2004)में अविभाजित आंध्र प्रदेश के कट्टर सुधारवादी मुख्यमंत्री के रूप में लगभग एक दशक, और विभाजित राज्य (2014-19) के पहले सीएम के रूप में पांच साल. उसके बाद वे चुके हुए लग रहे थे. 2019 के विधानसभा चुनाव में टीडीपी ने 175 में से केवल 23 सीटें जीतीं.

तटवर्ती और दूरदराज के इलाकों में घूम-घूमकर उभरे उनके एक युवा प्रतिद्वंद्वी ने सरकार बनाई. लेकिन नायडू के लंबे करियर के आखिर में कोई शांति से भरा सूर्यास्त नहीं होना था: वर्ष 2021 उनकी पत्नी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी के बाद विधानसभा से आंसू बहाते हुए उनके वॉकआउट का गवाह बना और 2023 में राजमुंदरी सेंट्रल जेल में 53 दिनों के साथ उनका राजनैतिक करियर सबसे निचले स्तर पर पहुंचा.

पीछे मुड़कर देखें तो उनके विरोधियों को ऐसा नहीं करना चाहिए था- विशुद्ध रणनीतिक नजरिए से भी नहीं. एक चतुर-चालाक और उम्रदराज प्राणी को हर तरफ से घेर लिया गया था. भागने का कोई रास्ता था नहीं, ऐसे में उसे अस्तित्व के लिए लड़ना ही था. हमेशा की तरह तेज निगाहों ने रास्ता तलाशा: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ गठजोड़ बदले की परियोजना का पहला कदम था.

इसने एक चक्रवात-सा असर पैदा किया: एक साथ हुए विधानसभा और संसदीय चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने एकतरफा जीत हासिल की. उसे विधानसभा की 175 सीटों में से 164 और 25 लोकसभा सीटों में से 21 पर चौंका देने वाली जीत मिली. लोकसभा की 16 सीटों की अपनी व्यक्तिगत गिनती ने टीडीपी को भाजपा का सबसे बड़ा सहयोगी भी बना दिया, जो पिछले एक दशक में पहली बार बहुमत हासिल नहीं कर पाई थी. नतीजा: नायडू ने राष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में वापसी की.

मुख्यमंत्री के तौर पर उनके चौथे कार्यकाल में कई चुनौतियां हैं, पर इनका वे लुत्फ उठाएंगे: आंध्र को वैश्विक निवेश केंद्र में बदलना, इसकी छवि को कृषि प्रधान पिछड़े इलाके से आधुनिक, तकनीक से प्रेरित राज्य में बदलना, अपने ड्रीम प्रोजेक्ट अमरावती की ग्रीनफील्ड राजधानी को इसका सबसे बड़ा गौरव बनाना. इनके लिए दिल्ली के साथ जैसे भी सियासी संतुलन साधने होंगे, उसमें वे माहिर हैं.ठ्ठ

यह वापसी एक नई कहानी की शुरुआत हो सकती है. इसे नायडू 4.0 कहा जाना चाहिए. यह एक साहसी योजना है आंध्र प्रदेश को समुद्र तटवर्ती कृषि राज्य से एक चमकदार वैश्विक तकनीकी हब में बदलने की.

आई हाथ में लगाम
● नायडू की अगुआई वाली टीडीपी के 16 सांसदों के बगैर मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए बहुमत का आंकड़ा बस नामभर का ही रह पाता.

● इस राजनैतिक वापसी के साथ नायडू देश के सबसे वरिष्ठ मुख्यमंत्री बन गए हैं. वे सबसे पहले 1995 में अविभाजित आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चुने गए थे.

● उनके स्वर्ण आंध्र @2047 (गोल्डेन आंध्र प्रदेश) विजन का लक्ष्य है अगले 23 साल में राज्य की अर्थव्यवस्था को 2.4 ट्रिलियन डॉलर और समावेशी आर्थिक विकास के साथ प्रति व्यक्ति आय को 43,000 डॉलर के स्तर तक पहुंचाना.

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