मुफ्ती परिवार की राजनीतिक विरासत को कितना संभाल पाएंगी इल्तिजा?
महबूबा मुफ्ती के हिरासत में रहने के दौरान उनकी बेटी इल्तिजा पीडीपी के विरोध प्रदर्शन की बुलंद आवाज रहीं और अब वे चुनावी पारी शुरू कर रही हैं

तकरीबन 60 साल बीत चुके हैं मगर फातिमा की सियासी निष्ठा कभी भी नहीं डगमगाई. पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के संस्थापक मुफ्ती मोहम्मद सईद की घोर समर्थक फातिमा को आज भी उस दिन की धुंधली-सी याद है जब 1967 के चुनाव में अनंतनाग जिले के बिजबेहारा से पहली बार जीतकर मुफ्ती विधानसभा पहुंचे थे.
नब्बे से अधिक वसंत देख चुकीं फातिमा बुढ़ापे से जुड़ी कई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही हैं, मगर उन्होंने आज भी उस दिन की स्मृतियां संजोकर रखी हैं जब मुफ्ती उनके घर दोपहर के खाने के लिए आए थे. बिजबेहारा की संकरी गली में हजरत बाबा नसीबुद्दीन गाजी की दरगाह से कुछ मीटर की दूरी पर अपने बरामदे में बैठी फातिमा कहती हैं, ''मुफ्तियों को वोट देते वक्त मुझमें एक जोश आ जाता है.''
मुफ्ती मौलवियों के परिवार से आते हैं और उनका अपने पैतृक घर के नजदीक वाली दरगाह के साथ जुड़ाव है. बिजबेहारा विधानसभा सीट राजौरी-अनंतनाग लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है और फातिमा ने आम चुनाव में दिवंगत मुफ्ती की बेटी और पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती को वोट दिया था. हालांकि, वे हार गईं. फातिमा कश्मीरी जबान में कहती हैं, "हार जीत चुने मसले (जीत-हार कोई मुद्दा नहीं हैं). उन्होंने हमें सड़कें दीं, पाइप से पानी दिया और लोगों को नौकरियां दीं. हमारा वोट और हमारी दुआएं उनके साथ हैं. अब हमें यह पक्का करना है कि हमारी बेटी (इल्तिजा मुफ्ती) अपनी ननिहाल से जीते."
महबूबा ने अपनी बेटी को उसी बिजबेहारा-श्रीगुफवारा निर्वाचन क्षेत्र से मैदान में उतारा है, जहां से उन्होंने 1996 में पारी की शुरुआत की थी. 1999 से यह सीट पीडीपी के पास है और वरिष्ठ नेता अब्दुल रहमान वीरी ने पार्टी का यह गढ़ बचाकर रखा है. लेकिन कश्मीर के अन्य क्षेत्रों की तरह परिसीमन समिति ने इस चुनाव क्षेत्र की सीमाओं का भी फिर से निर्धारण किया है. नतीजा यह रहा कि पीडीपी के इस गढ़ का बड़ा हिस्सा अब अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में चला गया है.
श्रीनगर में अपने नाना के घर में पली-बढ़ीं इल्तिजा अगस्त 2019 में अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद खुलकर सक्रिय हुईं और सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत महबूबा की लंबी हिरासत के दौरान पीडीपी का चेहरा बन गईं. इंग्लैंड की वारविक यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्नातकोत्तर इल्तिजा स्पष्टवादी नेता हैं और अपनी भूमिका अच्छी तरह निभा रही हैं.
घर-घर जाकर वोट मांगने के दौरान यह स्पष्ट महसूस किया जा सकता है कि लोगों से जुड़ने का उनका अंदाज कितना कारगर है. बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष, युवा और बूढ़े उनके साथ चल पड़ते हैं. वे उनकी जयकार करते हैं, मालाएं पहनाते हैं, मिठाइयां खिलाते हैं और स्नेह से उनका माथा चूमते हैं, जो स्थानीय संस्कृति में सम्मान का संकेत है.
एक छोटे-से गांव दुपत्यार में इल्तिजा लोगों से कहती हैं, "केंद्र हमारी नौकरियां, जमीन और संसाधन हड़पने की कोशिश कर रहा है. यह चुनाव हमारे भविष्य और पहचान को बचाने के लिए है, इस मौके को गंवाना नहीं है. शेरनी का बच्चा शेर होता है. मैं विधानसभा में आपके लिए शेर की तरह लड़ूंगी." उत्साहित लोग जोरदार आवाज में नारे लगाते हैं, "न झुकने वाली पीडीपी, न बिकने वाली पीडीपी."
पीडीपी को वैसे तो पूरी घाटी में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी लड़ाई अपने इसी गढ़ में है. इल्तिजा को नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के उम्मीदवार बशीर अहमद वीरी से कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ रहा है. वीरी पिछले दो चुनाव बेशक हार गए थे लेकिन पिछले एक दशक में उन्होंने पीडीपी के वोटों में बड़ी सेंध लगाई है. 2015 में भाजपा के साथ पीडीपी के अलोकप्रिय गठबंधन ने इसमें उनकी बड़ी मदद की है. भगवा पार्टी ने यहां से अपने पुराने सहयोगी सोफी यूसुफ को मैदान में उतारा है.
कई लोगों ने इल्तिजा को अनंतनाग पूर्व या पहलगाम से मैदान में उतारने का सुझाव दिया था, लेकिन उनकी मां ने फैसला किया कि उनका घरेलू क्षेत्र सबसे मुनासिब रहेगा. इसके लिए उन्होंने पुराने सिपहसालार वीरी को अनंतनाग पूर्व सीट पर लड़ने को भेज दिया (जो उनके कट्टर समर्थकों को अच्छा नहीं लगा). बिजबेहारा उन पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है जहां आम चुनाव में पीडीपी ने बहुत मामूली ही सही लेकिन बढ़त बनाई थी और इसे 'सुरक्षित सीट' माना जाता है.
पीडीपी के एक नेता का कहना है कि 2018 के झटके के बाद से महबूबा बहुत असुरक्षित महसूस करने लगी हैं. अब चुनाव से ऐन पहले टिकट बंटवारे को लेकर नाराजगी के कारण बहुत-से नेताओं ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. हाल ही में पद छोड़ने वाले एक युवा नेता का कहना है, "कई नए-नवेले लोगों को मौका दिया गया है लेकिन हमें मना कर दिया गया क्योंकि महबूबा पार्टी में ऐसे किसी नेता को नहीं देखना चाहतीं जो उनकी बेटी के समानांतर खड़ा हो सकता है."
पीडीपी अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है, मगर इल्तिजा इससे बहुत फिक्रमंद नहीं हैं. वे पहले ही अपनी सीट के सभी 87 गांवों और 17 वार्डों को कवर कर चुकी हैं. आगे का काम आसान नहीं है, मगर इल्तिजा को लगता है कि जीतने के बाद नाममात्र की शक्तियों वाली विधानसभा में भी सार्वजनिक मुद्दों के लिए वे ऐसी जोरदार आवाज उठाएंगी जिसे अनदेखा नहीं किया सकेगा.
वे कहती हैं, "अगले सीएम की हैसियत एक नगरपालिका के मेयर जितनी रहने वाली है. फिर भी आप मुद्दों पर कितनी मजबूती से आवाज उठाते हैं, यह बहुत मायने रखता है." इल्तिजा एक और बैठक के लिए निकल रही हैं. दरगाह के पास से गुजर रहे तीन बुजुर्ग उन्हें देखकर कहते हैं कि वे इल्तिजा का समर्थन करेंगे क्योंकि वे मुफ्ती की नातिन हैं. 70 साल के दाढ़ी वाले एक व्यक्ति कहते हैं, "जिन लोगों ने मुफ्तियों का फायदा उठाया, उनकी बदौलत नौकरियां पाईं, उन्होंने यहां मुफ्तियों को छोड़ दिया है. मैं उनमें से नहीं हूं. उनके सत्ता में आने से बहुत पहले मुझे नौकरी मिल गई थी."
बिजबेहारा-श्रीगुफवारा निर्वाचन क्षेत्र से 1,00,000 से ज्यादा मतदाताओं ने पहले चरण के तहत 18 सितंबर को वोट डाले हैं. 8 अक्टूबर को जब नतीजे आएंगे तो यह इल्तिजा और मुफ्ती परिवार के लिए भी काफी अहम दिन साबित होगा.
- मोअज्जम मोहम्मद