दिल्ली : धूल झाड़कर आम आदमी पार्टी फिर से मैदान में

आप नेता और पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के जेल से बाहर आने के बाद आने वाले विधानसभा चुनाव में आप की उम्मीदों को हौसला मिला है. संकटों से घिरी पार्टी अब आगे की रणनीति बनाने में जुटी

जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर आए मनीष सिसोदिया के साथ 10 अगस्त को आप नेता संजय सिंह, गोपाल राय और आतिशी
जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर आए मनीष सिसोदिया के साथ 10 अगस्त को आप नेता संजय सिंह, गोपाल राय और आतिशी

दिल्ली की मंत्री आतिशी ने शहर में एक जमावड़े को संबोधित करते हुए कहा, ''आज सत्य की जीत हुई है'' और यह कहते-कहते वे रो पड़ीं. यह 9 अगस्त को उस वक्त की बात है जब खबर आई ही थी कि आप के दूसरे नंबर के नेता मनीष सिसोदिया को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी है.

सिसोदिया आबकारी नीति या 'शराब घोटाले'—इस पर निर्भर है कि आप किस राजनैतिक नजरिये से इसे देखना चाहते हैं—के केस में गिरफ्तारी के बाद पिछले 17 महीनों से जेल में थे. आबकारी महकमे के भी प्रभारी रहे पूर्व उपमुख्यमंत्री सिसोदिया प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की तरफ से दर्ज इस मामले के केंद्र में हैं.

आरोप है कि पार्टी ने कुछ चुनिंदा लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए नई आबकारी नीति बनाई और सैकड़ों करोड़ रुपए की रिश्वत ली गई. यह दिल्ली के चुनाव से बमुश्किल छह महीने पहले उस पार्टी के लिए नया जीवनदान था जिसके मुख्य नेता पिछले दो सालों के दौरान कई चरणों में जेल में रहे हैं (आप सुप्रीमो और मुख्य रणनीतिकार अरविंद केजरीवाल अब भी सीखचों के पीछे हैं).

जमानत का मतलब बरी होना नहीं है. लेकिन सिसोदिया मानते हैं कि जमानत के बाद कोई मामला ही नहीं है. जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''पूरा मामला जमानत को लेकर था क्योंकि इसमें कोई दम नहीं है. इसीलिए उन्होंने करीब 20,000 पन्नों की चार्जशीट तैयार की और गवाहों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त बनाई. यह सब मामले को घसीटते रहने और जमानत का विरोध करने के लिए था (देखें इंटरव्यू: राजनीति एक लंबा गेम है).''

सिसोदिया का मानना है कि धनशोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के प्रावधान केवल इसलिए लगाए गए ताकि जमानत मिलना मुश्किल हो. वे कहते हैं, ''इस किस्म के कानून का इस्तेमाल आतंकवादियों की फंडिंग रोकने के लिए किया जाता है, यह आम लोगों को जमानत देने से इनकार करने के लिए नहीं है.''

फिलहाल आप के खेमे में थोड़ी राहत है. हालांकि केजरीवाल के लिए यह राहत महज कागजों पर है. सुप्रीम कोर्ट ने 12 जुलाई को दिल्ली के मुख्यमंत्री को अंतरिम जमानत दे दी, पर वे अब भी तिहाड़ जेल में हैं. (नोट - बीते 13 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल को भी जमानत दे दी और अब वे जेल से बाहर हैं) ऐसा इसलिए क्योंकि जब वे ईडी के धनशोधन मामले में जेल में थे, तभी जमानत मिलने के महज दो हफ्ते पहले 26 जून को उन्हें सीबीआई ने 'गिरफ्तार' कर लिया.

उन पर भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश के आरोप थे. कांग्रेस के नेता और बड़े वकील अभिषेक मनु सिंघवी इसे 'इंश्योरेंस अरेस्ट' (एक केस में जमानत तो दूसरे में जेल डालना) कहते हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री के कानूनी सलाहकार ने 12 जुलाई को माइक्रोब्लॉगिंग साइट एक्स पर लिखा, ''हमारी दलीलों और अपनी कमजोरियों को जानते हुए केंद्र सरकार को प्रतिकूल आदेश (सुप्रीम कोर्ट का 12 जुलाई का निर्देश) का अंदेशा था और इसलिए सीबीआइ ने पूरे एक साल बाद केजरीवाल को गिरफ्तार कर लिया; एक साल पहले उनसे पूछताछ के बाद और जब वे ईडी की हिरासत में थे.''

यह केस अब तक एक पेचीदा कानूनी गाथा बन चुका है जो पिछले दो साल से निचली अदालतों, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. ताजा मोड़ इस मामले में दाखिल पूरक चार्जशीट है, जिसमें ईडी ने अभियुक्त नंबर 37 और 38 के रूप में क्रमश: केजरीवाल और आम आदमी पार्टी (आप) को नामजद किया है. ईडी के मुताबिक, केजरीवाल घोटाले के 'सरगना और मास्टरमाइंड' हैं. ईडी 20 महीनों से भी ज्यादा वक्त से इस मामले की जांच कर रहा है. उसने भारत भर में करीब 250 छापों के बाद 40 आरोपियों की पहचान की और अब तक 16 गिरफ्तारियां की हैं.

जांच का सार यह है कि आप को 2022 में कम से कम 100 करोड़ रुपए की रिश्व मिली, जिसका इस्तेमाल उन्होंने पंजाब (जहां इसने सरकार बनाई) और गोवा में विधानसभा चुनावों के लिए किया. शराब उद्योग के कुछ कारोबारी हितों ने नीति में अपने व्यवसायों को फायदा पहुंचाने के बदले आप को रकम का कथित भुगतान किया.

हमला ही सबसे अच्छा बचाव

पहले दिन से ही आप ने इस मामले को सियासी और कानूनी दोनों ही तरह से लड़ा है और इसके पीछे एक केंद्रीय रणनीति है: हमला ही सबसे अच्छा बचाव है, विवाद के कारणों पर सवाल उठाना. इसका कानूनी बचाव गिरफ्तारी की जरूरत और वैधता को सामने लाता है और अभियोजन पक्ष के गवाहों की मंशा पर सवाल उठाता है. निचली अदालतों में केजरीवाल ने खुलेआम आरोप लगाया है कि एजेंसियों और भाजपा ने गवाहों को मजबूर किया. सिंघवी कहते हैं, ''आखिरकार, सजा (दोषी ठहराना) तो होगी नहीं. लिहाजा प्रक्रिया ही सजा है.''

यह रणनीति अंतत: कारगर होती लग रही है. केजरीवाल की अंतरिम जमानत और सिसोदिया की हालिया रिहाई के बाद, एक अन्य आरोपी, बीआरएस नेता और पूर्व सीएम के.सी. चंद्रशेखर की बेटी के. कविता को भी पांच महीने बाद 27 अगस्त को जमानत मिल गई.

कविता कहती हैं, ''हम कानूनी और राजनैतिक रूप से लड़ेंगे. मुझे सिर्फ राजनीति की वजह से सलाखों के पीछे डाला गया.'' उनकी जमानत पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों की 'निष्पक्षता' की कमी के लिए आलोचना भी की. न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और के.वी. विश्वनाथन की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पूछा, ''अभियोजन पक्ष को निष्पक्ष होना चाहिए. आप चुन-चुनकर [किसे अभियोजित करना चाहते हैं] नहीं कर सकते. निष्पक्षता कहां है?'' दरअसल, सिसोदिया के फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि पीएमएलए मामलों में भी जमानत अपवाद नहीं बल्कि नियम है.

कानूनी रूप से हालात बेहतर होने के साथ ही आप ने इस लड़ाई को अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लड़ने का फैसला किया है. 'केजरीवाल आएंगे' जमीनी स्तर पर इसका सबसे नया अभियान है. सिसोदिया विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में नियमित पदयात्रा कर रहे हैं और लोगों को बता रहे हैं कि उनके बाहर आने के बाद अब कुछ ही समय में दिल्ली के सीएम जेल से बाहर आ जाएंगे.

आप को दिल्ली में अपनी बेहद स्थानीय ताकत का एहसास है. जब शराब विवाद अपने चरम पर था तब 2022 में उसने दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) चुनाव में शानदार जीत दर्ज की.

वह नुक्कड़ सभाओं जैसे प्रचार अभियान में भाजपा के हाथों सताए जाने की कहानी बुन रही है. यह आप की 'कमजोर-लाचार को ताकतवर के सामने खड़ा करने' की राजनीति के लिए सही है. केजरीवाल की पत्नी सुनीता, जो उनकी गिरफ्तारी के बाद प्रचार करने के लिए आगे आई थीं, हरियाणा में नियमित रूप से ऐसा ही कर रही हैं, जहां पार्टी जल्द ही सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का मंसूबा बना रही है.

उसके मंत्री, सांसद और विधायक जैसे नेता टीवी पर बोल रहे हैं और उसका विशाल ऑनलाइन समर्थन आधार विभिन्न आधार पर 'घोटाले' की कहानी को तार-तार करने की कोशिश कर रहा है. आप विधायक दुर्गेश पाठक कहते हैं, ''वे दिल्ली सरकार के काम को ठप चाहते हैं और केजरीवाल को तस्वीर से गायब करना चाहते हैं. क्योंकि वे हमसे राजनैतिक रूप से लड़ नहीं सकते. लेकिन इसके बावजूद, दिल्ली के लिए हमारा अच्छा काम बंद नहीं हुआ है.''

दिल्ली की शिक्षा मंत्री आतिशी ने इस महीने कई सरकारी स्कूल भवनों का उद्घाटन किया. राज्य सरकार विभिन्न मुद्दों के बारे में नौकरशाही और उपराज्यपाल कार्यालय को नियमित रूप से लिख रही है. इसके पीछे विचार यह है कि शो जारी रहना चाहिए, जो भाजपा के लिए भारी परेशानी की बात है. भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज कहती हैं, ''वे (केजरीवाल) सत्ता की लालसा में इतने मदहोश हैं कि सीएम की कुर्सी नहीं छोड़ेंगे.'' उनका दावा है कि केजरीवाल के जेल में रहने की वजह से राजधानी में ''नीतिगत पक्षाघात'' है.

चुनावी बॉन्ड का पेच

चुनावी बॉन्ड से हुए खुलासे आप के जवाबी हमले को काफी हद तक हथियार मुहैया करा रहे हैं. इस साल केजरीवाल की गिरफ्तारी से एक हक्रते पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद तत्कालीन चुनावी बॉन्ड के दानकर्ताओं और प्राप्तकर्ताओं का ब्यौरा 14 मार्च को सार्वजनिक किया गया था. खुलासे से पता चला कि शराब घोटाले के आरोपी पी. सरथ चंद्र रेड्डी की अरबिंदो फार्मा ने राजनैतिक पार्टियों, खासकर भाजपा को काफी चंदा दिया था.

खासकर, अरबिंदो फार्मा ने अप्रैल 2021 और नवंबर 2023 के बीच 52 करोड़ रुपए के चुनावी बॉन्ड खरीदे, जिसमें से 34.5 करोड़ रुपए भाजपा को गए (लाभ उठाने वाली अन्य पार्टियों में वाइएसआरसीपी और टीडीपी शामिल हैं). कंपनी ने सरथ की गिरफ्तारी के ठीक पांच दिन बाद 15 नवंबर, 2022 को भाजपा के पक्ष में 5 करोड़ रुपए के बॉन्ड खरीदे. जून 2023 में सरथ के सरकारी गवाह बनने के बाद, उस साल नवंबर में भाजपा को 25 करोड़ रुपए का अतिरिक्त चंदा दिया (अदालत ने उसके बाद सरथ को माफ कर दिया).

पिछले साल इसी मामले में गिरफ्तार किए गए और इस साल मार्च में जमानत पर रिहा होने वाले आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह आरोप लगाते हैं, ''इससे साबित होता है कि शराब घोटाले की जांच में भाजपा ने ही रिश्वत ली है.''

पैसा कहां है?

तत्कालीन दिल्ली के मुख्य सचिव नरेश कुमार की ओर से एलजी वी.के. सक्सेना को सौंपी गई 2022 की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि शराब नीति में थोक विक्रेताओं को 12 फीसद लाभ मार्जिन देने का वादा किया गया था, बशर्ते वे आप को 6 फीसद रिश्वत के रूप में लौटा दें. सक्सेना ने ही इस रिपोर्ट के बाद सीबीआइ जांच की सिफारिश की थी. अब केजरीवाल और आप के अन्य नेता यह जानने की मांग कर रहे हैं, ''पैसा कहां है?''

उनका तर्क है कि अगर उन्होंने 100 करोड़ रुपए की रिश्वत ली होती, तो किसी न किसी रूप में फंड का पता लगाया जा सकता था. केजरीवाल कई बार कहा है, ''एक चवन्नी तक नहीं मिली.'' ईडी का दावा है कि पैसे का इस्तेमाल गोवा और पंजाब चुनावों में किया गया था. उसने हाल ही में यह भी कहा है कि घोटाले में केजरीवाल के संबंध और मनी ट्रेल को साबित करने की जांच पूरी हो गई है और वे इसे अदालत के सामने रखेंगे.

इस बीच, भाजपा भी हरकत में है. दिल्ली की सभी सात लोकसभा सीटों को बड़े अंतर से जीतने के बाद वह उत्साहित है. सिसोदिया जैसे आप नेताओं को भरोसा है कि जब दिल्ली विधानसभा चुनाव की बात आएगी, तो लोग वफादारी बदलेंगे और उन्हें वोट देंगे, जैसा कि 2020 में हुआ था. लेकिन इसमें अभी छह महीने का वक्त है. क्या संघर्षरत पार्टी लड़ाई जारी रख पाएगी?

- अभिषेक जी. दस्तीदार

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