हर बार के मुकाबले इस मॉनसून केरल में इतना संक्रमण क्यों फ़ैल रहा?

केरल में आमतौर पर भी मॉनसून के दौरान संक्रामक बीमारियों का ज्यादा फैलाव देखा जाता है, मगर इस साल संक्रमण के और ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं

केरल में फैली दुर्लभ बीमारी
केरल में फैली दुर्लभ बीमारी

दरअसल, केरल में एक 'दिमाग-भक्षक' अमीबा ने बीते दो महीनों में तीन बच्चों की जान ले ली और एक अन्य को संक्रमित किया. यह अमीबा गर्म ताजा पानी के जलाशयों में फलता-फूलता है. बच्चों की उम्र पांच से 14 साल के बीच थी. वे प्राइमरी अमीबिक मेनिंगोएनसिफेलाइटिस (पीएएम) से संक्रमित पाए गए थे. यह दुर्लभ बीमारी है जो नेगलेरिया फाउलेरी नाम के रोगाणु के जरिए फैलती है. संक्रमण दिमाग के ऊतकों को नष्ट करता है, जिससे ज्यादातर मामलों में मौत हो जाती है.

हाल के वर्षों में निपाह और जीका वायरसों का प्रकोप हो या डेंगू और रैट फीवर सरीखी दूसरी वेक्टर-जनित और जूनोटिक (पशुओं से इंसान में होने वाली) बीमारियों का अत्यधिक प्रसार हो, हर मॉनसून में केरल की जन-स्वास्थ्य व्यवस्था पर बहुत भारी दबाव नजर आया है. बावजूद इसके कि यहां 1,278 सरकारी और 2,062 निजी अस्पतालों का व्यापक नेटवर्क है. स्वास्थ्य विभाग की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जुलाई के मध्य तक संक्रामक रोगों ने 144 लोगों की जानें लील लीं. उनमें से 121 की मौत तो 1 जून के बाद दर्ज हुई. 67 मौतें लेप्टोस्पायरोसिस या रैट फीवर से हुईं.

यह बैक्टीरिया से होने वाला संक्रमण है, जो चूहों और खेत के जंतुओं के मूत्र के संपर्क में आने से फैलता है. केवल 13 जुलाई तक बुखार से ग्रस्त 12,204 लोग अस्पतालों में भर्ती हुए. उनमें से 438 को डेंगू होने का पता चला.

स्वास्थ्य मंत्री वीणा जॉर्ज स्थिति की गंभीरता को स्वीकार करती हैं. वे यह भी दावा करती हैं कि स्वास्थ्य विभाग इससे निबटने के लिए 'पूरी तरह तैयार' है. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, "राज्य में आमतौर पर भी मॉनसून के दौरान संक्रामक बीमारियों का ज्यादा फैलाव देखा जाता है. मगर इस साल संक्रमण के और ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं. हमने स्थानीय निकायों को हेल्थ ऑडिट करवाने और जनता को चेताने के लिए अलर्ट किया है."

बीते दो दशकों में जो कारक—भू उपयोग के पैटर्न में बदलाव, प्रदूषित नदियां, गंदे पानी की खराब निकासी और पानी भरे धान के खेत—संक्रामक बीमारियों के फैलने में योगदान देते रहे हैं, वे मॉनसून के दौरान और भी तीव्र हो जाते हैं. एडीज मच्छर के काटने से फैलने वाला डेंगू राज्य में 1998 में सामने आया. कुछ जिलों तक सिमटी यह बीमारी अब पूरे राज्य को चपेट में ले चुकी है. इसी तरह लेप्टोस्पायरोसिस 1980 के दशक में दुर्लभ बीमारी के तौर पर दर्ज थी. बीते दशक में यह बड़ा खतरा बन गई. विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन कहते हैं, "लेप्टोस्पायरोसिस ने साल 2020 से 1,000 से ज्यादा लोगों को मार डाला. देश में सबसे अच्छी स्वास्थ्य प्रबंधन प्रणाली होने का दावा करने वाली सरकार के लिए यह शर्म की बात है."

स्वास्थ्य प्रबंधन पर मुख्यमंत्री के सलाहकार डॉ. बी. इकबाल इस संकट से निबटने के लिए समन्वित कार्य योजना की मांग करते हैं. वे कहते हैं, "संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए मच्छरों और कीटों पर असरदार नियंत्रण, समुचित साफ-सफाई और स्वच्छ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है." उनसे सहमति जाहिर करते हुए जनस्वास्थ्य कार्यकर्ता डॉ. वी. रमणकुट्टी कहते हैं, "बार-बार होने वाली बीमारियों पर काबू पाने के लिए जरूरत के हिसाब से जनस्वास्थ्य उपाय जरूरी हैं. संक्रामक रोगों पर नियंत्रण का सबसे अच्छा तरीका रोकथाम है. फिलहाल इसी की कमी है."

तिरुवनंतपुरम स्थित जवाहरलाल नेहरू ट्रॉपिकल बॉटेनिक गार्डन ऐंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डॉ. विनोद कुमार टी.जी. का कहना है कि इस अनदेखी का बहुत ज्यादा असर गरीबों पर पड़ा है. सरकार इस बढ़ती चुनौती का किस तरह जवाब देती है, वह राज्य के लोगों को बीमारी के भारी बोझ से बचाने में बेहद अहम होगा.

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