हरियाणा में विधानसभा की तैयारियां शुरू, जानिए बीजेपी-कांग्रेस में किसका पलड़ा भारी
सैनी से उम्मीद है कि वे बीजेपी का गैर-जाट ओबीसी सपोर्ट बढ़ाकर जाट वोटों के नुक्सान की भरपाई करेंगे

इस साल हरियाणा की राजनीति में कुछ अप्रत्याशित-सी घटनाएं हुई हैं. 12 मार्च को बिना किसी तरह की भनक के मनोहर लाल खट्टर का अचानक इस्तीफा देना उतना ही चौंकाने वाला था जितना 2014 में मुख्यमंत्री के रूप में उनकी ताजपोशी होना. उसी सप्ताह दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व वाली जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) ने जाहिरा तौर पर लोकसभा चुनाव में सीटों पर समझौते को लेकर अपना रास्ता अलग कर लिया. फिर मई में तीन निर्दलीय विधायकों ने नई नायब सिंह सैनी सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिससे सरकार नाजुक बहुमत पर आ गई. लोकसभा चुनाव के नतीजों ने भी कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया और राज्य की 10 सीटें बीजेपी और कांग्रेस के बीच बराबर-बराबर बंट गईं.
अब जबकि हरियाणा में विधानसभा चुनाव के लिए तैयारियां शुरू हो गई हैं, ऐसे में हरेक पक्ष राज्य की 90 सीटों पर दावा जमाने के लिए अपनी रणनीति को धार देने में जुट गया है. बेशक, इतिहास की घटनाएं इस बात की गवाह हैं कि राज्य ने किसी भी पार्टी को लगातार दो कार्यकाल से ज्यादा का मौका नहीं दिया है. अगर भूपिंदर सिंह हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस के पास 2004 से 2014 तक सत्ता की कमान रही तो 2014 की मोदी लहर ने बीजेपी को दो बार राज्य की सत्ता दिला दी. इस बार, बीजेपी भी सत्ता में बने रहने का खामियाजा और हुड्डा के फिर से उभार जैसी दो चुनौतियों का सामना कर रही है. साफ है कि इतिहास को गलत साबित करने के लिए बीजेपी को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ेगी.
खट्टर को हटाना बीजेपी का अपनी तैयारी के लिहाज से चीजें दुरुस्त करने की दिशा में पहला प्रयास था. गैर जाट मुख्यमंत्री जाटों की नाराजगी दूर करने की दृष्टि से शायद उपयुक्त न था. प्रदेश के जाट पहले आरक्षण, फिर कृषि कानूनों और आखिर में महिला पहलवानों के समर्थन पर नाराज होते गए. खट्टर ने जो कुछ भी अच्छा काम किया, इन सब मुद्दों पर उपजी नाराजगी ने उसको ढक दिया, फिर चाहे वह सभी के फायदे वाली अनूठी फसल मूल्य नीतियां हों जिससे हरियाणा ने वित्त वर्ष 24 में कृषि की 8.5 फीसद की शानदार वृद्धि दर हासिल की. प्रदेश में जाट कुल आबादी का 27 फीसद हैं. उनके वोटों के छिटकने का असर लोकसभा चुनाव में भी दिखा. लोकनीति सीएसडीएस जनमत सर्वेक्षण ने नोट किया कि कैसे 2019 की तुलना में 63 फीसद जाटों ने कांग्रेस को वोट दिए जबकि 2019 में करीब आधे जाट बीजेपी के साथ थे. इस कारण बीजेपी को जाट बहुत इलाकों की पांच में से सिर्फ एक सीट—भिवानी महेंद्रगढ़—मिली और बाकी कांग्रेस के पास चली गईं.
खट्टर के ही पदचिन्हों पर चलने वाले मुख्यमंत्री सैनी किसान और गैर जाट पिछड़े समुदाय के हैं. उनके गुरु खट्टर शहरी पंजाबी खत्री परिवार के, अविवाहित और आरएसएस के प्रचारक थे जो कभी हरियाणा के राजनैतिक परिवार से नहीं जुड़े रहे. किसी जाट नेता की गैरमौजूदगी में बीजेपी को कम ही उम्मीद है कि चुनाव से पहले जाट वोट उसके साथ आएंगे. इसलिए वह गैर जाट पिछड़े वोटों को एकजुट करने की कोशिश कर रही है, उसे उम्मीद है कि सैनी के पिछड़ी जाति का होने से उसे ये वोट हासिल करने में मदद मिलेगी. विधानसभा चुनाव में सैनी ही पार्टी का नेतृत्व करेंगे, यह बात केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 29 जून को पंचकूला में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए स्पष्ट कर दी. अगर 1967 में 241 दिन का राव बीरेंद्र सिंह का कार्यकाल छोड़ दें तो सैनी राज्य में पिछड़े समुदाय के पहले मुख्यमंत्री हैं. राव के बेटे, बीजेपी के ही इंद्रजीत सिंह अब सैनी के पद के लिए दावेदार हैं. उनकी दलील है कि बीजेपी को दक्षिण हरियाणा में अपना आधार मजबूत करना होगा जहां से उसे पांच लोकसभा सीटें—फरीदाबाद, गुरुग्राम, भिवानी-महेंद्रगढ़, कुरुक्षेत्र और करनाल—मिली हैं. लेकिन सैनी को शाह के स्पष्ट समर्थन से इंद्रजीत की उम्मीदों पर पाला पड़ गया दिखता है.
सैनी अब भले ही गैर पिछड़े वोटों को एकजुट करने की रणनीति बना रहे हों लेकिन उनका काम इतना आसान भी नहीं है. सीएसडीएस के आंकड़ों के अनुसार, सिर्फ जाट वोटों ने ही इस बार बीजेपी का साथ नहीं छोड़ा है बल्कि पार्टी के दलित आधार को भी चोट पहुंची है जो 2019 में 58 फीसद से गिरकर इस बार 24 फीसद रह गया है. इस बीच, ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने ऊंची जातियों (ब्राह्मण, बनिया, राजपूत, पंजाबी हिंदुओं) में सेंध लगाई है और उसने इस तबके में बीजेपी के 74 फीसद वोट शेयर में से आठ फीसद ले लिया है. सीएसडीएस सर्वे बताता है कि इसी तरह गुर्जर, अहीर-यादव आदि जैसी पिछड़ी जातियों में भी उसका वोट शेयर 2019 के 73 फीसद से घटकर अब 44 फीसद रह गया. हरियाणा में मुकाबला अब दो ध्रुवीय हो गया है क्योंकि जननायक जनता पार्टी, इंडियन नेशनल लोकदल और बसपा के वोटों को हुआ नुकसान हुड्डा के नेतृत्व में कांग्रेस के पास आ गया है.
एक बार फिर से उठ खड़े हुए हुड्डा का इरादा लोकसभा चुनाव वाला माहौल बनाए रखने का है. कांग्रेस के जाट नेता राज्य में एक महीने के लिए 'कार्यकर्ता सम्मेलन' कर रहे हैं. इस दौरान उनका इरादा कार्यकर्ताओं को पार्टी की चुनाव गारंटी के बारे में बताना और इसके अलावा बेरोजगारी, महंगाई, किसान आंदोलन, अग्निपथ योजना, परिवार पहचान पत्र में खामियों जैसे मसले उठाना है. उन्होंने कहा भी है कि अगर वे सत्ता में आए तो परिवार पहचान पत्र योजना को रद्द कर देंगे.
लेकिन हुड्डा को पार्टी के भीतर की गुटबाजी का सामना भी करना पड़ रहा है. उनके ज्यादातर प्रतिद्वंद्वी बीजेपी में शामिल हो गए हैं जिनमें उनकी पूर्व मंत्रिमंडल सहयोगी किरण चौधरी, विनोद शर्मा और सावित्री जिंदल शामिल हैं. उनके कजिन चौधरी बीरेंद्र सिंह सरीखे दूसरे नेता बीजेपी में एक दशक बिताने के बाद भले ही कांग्रेस में आ गए हों पर वे अभी भी उनसे नाराज हैं. यही स्थिति कैप्टन अजय यादव और रणदीप सिंह सुरजेवाला की है. अब यह देखना है कि कांग्रेस आलाकमान उन्हें उम्मीदवार चुनने और अभियान चलाने के लिए खुले हाथ देता है या नहीं.
इस बीच सैनी ने भी चीजें दुरुस्त करने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं. राज्य में 50,000 सरकारी नौकरियों का रास्ता बनाया गया है. मुख्यमंत्री किसान और खेतिहर मजदूर जीवन सुरक्षा योजना, डॉक्टर बी.आर. आंबेडकर आवास नवीनीकरण योजना, मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना जैसी सामाजिक क्षेत्र की कई योजनाओं को दुरुस्त किया जा रहा है. हरियाणा में बीजेपी के नेता कहते हैं कि इन योजनाओं के ज्यादातर लाभार्थी दलित या पिछड़े हैं.
पार्टी कार्यकर्ताओं को 'मिशन 100' (विधानसभा चुनाव में बाकी दिन) और घर-घर पहुंचने का अभियान शुरू करने का निर्देश दिया गया है. खट्टर ने कहा है कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता (दलित) परिवारों तक जाएंगे और कांग्रेस के झूठ (बीजेपी केंद्र की सत्ता में आई तो आरक्षण हटा देगी) और उसके 'कुशासन' में 'दलितों पर हुए जुल्म' के बारे में बताएंगे. खट्टर भले ही केंद्र में मंत्री बन गए हों लेकिन राज्य में उनका असर मौजूद है. सैनी को अपने गुरु की छाया से निकलना होगा, वह भी बहुत जल्द. एक बार मतदान की तारीखों की घोषणा हो जाने, आचार संहिता लागू हो जाने के बाद 3 महीने के लिए उनकी नीतिगत पहल के कदम सीमित हो जाएंगे.