मध्य प्रदेश : ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस फिर हाथ मलते रह गई?
2014 में दो सीटों से लेकर 2019 में एकमात्र छिंदवाड़ा और 2024 में पूरी तरह से हार, पार्टी में दलबदल और भाजपा के मोदी अभियान ने कांग्रेस के लिए विनाश का संकेत दिया

अक्तूबर 1984 में पार्टी नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के महीनों बाद कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव लड़ा और राज्य की सभी 40 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की. चार दशक बाद जब 4 जून को हाल में संपन्न 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित किए गए तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भी इसी तरह की उपलब्धि हासिल की और प्रदेश की सभी 29 सीटें (2000 में छत्तीसगढ़ के मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद राज्य के पास बची हुई लोकसभा सीटों की संख्या) जीत लीं.
मध्य प्रदेश—जिसे अक्सर भाजपा के वैचारिक स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की प्रयोगशाला कहा जाता है—ने पिछले दस साल में भगवा पार्टी के प्रभुत्व में धीरे-धीरे वृद्धि देखी है. जब नरेंद्र मोदी ने 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी, तब भाजपा ने मध्य प्रदेश की 29 में से 27 लोकसभा सीटें जीती थीं. गुना और छिंदवाड़ा की दो सीटें, जिनका प्रतिनिधित्व तब क्रमश: ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ करते थे, जो भाजपा के हमले के खिलाफ डटे रहे.
2019 में भाजपा के हमले को झेलने वाली एकमात्र सीट छिंदवाड़ा थी, जिसने कांग्रेस उम्मीदवार और कमलनाथ के बेटे नकुल को सांसद चुना. 2019 में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में गुना से हारने वाले सिंधिया 2020 में भाजपा में शामिल हो गए. हालांकि उन्होंने 4 जून को भाजपा उम्मीदवार के रूप में सीट जीती, लेकिन 2019 में राज्य में बचा कांग्रेस का एकमात्र गढ़, छिंदवाड़ा भी इस साल हाथ से निकल गया. इसके साथ ही मध्य प्रदेश में भाजपा ने राज्य की सभी लोकसभा सीटों पर अपना परचम लहरा दिया.
मध्य प्रदेश में भाजपा, जिसने महीनों पहले राज्य में 2023 विधानसभा चुनाव जीता था, पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, पार्टी ने छिंदवाड़ा को भी खास तौर पर निशाना बनाया, ताकि यहां पार्षदों और बूथ स्तर के कांग्रेस नेताओं का बड़े पैमाने पर दलबदल सुनिश्चित किया जा सके, ताकि मतदान पैटर्न में बदलाव हो सके. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वी.डी. शर्मा ने कहा, ''छिंदवाड़ा में जीत बूथ स्तर की रणनीति का नतीजा है, जिसे विधानसभा चुनाव से पहले लागू किया गया था. साथ ही, छिंदवाड़ा के लोग बदलाव के लिए तरस रहे थे.''
राजनैतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर ने कहा कि इसकी तुलना में, मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने ''एक पार्टी के रूप में चुनाव नहीं लड़ा. 19 अप्रैल को छिंदवाड़ा में मतदान समाप्त होने के बाद कमलनाथ ने पार्टी उम्मीदवारों के लिए प्रचार करके वास्तव में उनका साथ नहीं दिया. वरिष्ठ नेताओं और पार्टी के कुछ समर्थन से उन सीटों पर मदद मिल सकती थी, जहां पार्टी मुकाबले में थी.''
कांग्रेस का पतन
चुनाव से पहले, माना जा रहा था कि इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पास मध्य प्रदेश में आधा दर्जन से ज्यादा सीटें—भिंड, मुरैना, सतना, ग्वालियर, राजगढ़, छिंदवाड़ा, मंडला और रतलाम—जीतने का मौका है. इन सीटों पर कांग्रेस या तो वरिष्ठ पार्टी नेताओं, स्थानीय उम्मीदवारों या आदिवासियों जैसे पारंपरिक वोट बैंक के सहारे जीत की उम्मीद कर रही थी. हालांकि, भिंड, मुरैना, ग्वालियर, राजगढ़ और सतना में कांग्रेस ने सीटों पर हार के अंतर को कम करने में कामयाबी हासिल की, लेकिन वह राज्य में एक भी सीट जीतने में नाकाम रही.
मध्य प्रदेश में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन का असर राज्य कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) के अध्यक्ष जीतू पटवारी पर पड़ सकता है, जिन्हें पिछले साल दिसंबर में ही इस पद पर नियुक्त किया गया था. हालांकि, राजनैतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इन नतीजों का कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और कांतिलाल भूरिया जैसे दिग्गज नेताओं पर निर्णायक असर पड़ेगा. इसके बाद अब उन्हें कम महत्व वाले पदों पर नियुक्त किया जाएगा.
इस बीच, अगर कांग्रेस 2028 में अगले विधानसभा चुनाव में अच्छी तरह से स्थापित भाजपा को चुनौती देने की उम्मीद करती है, तो पटवारी के पास राज्य में पार्टी का आधार बनाने के लिए चार साल होंगे. इंडिया टुडे से बात करते हुए एमपी पीसीसी अध्यक्ष पटवारी ने कहा, ''मध्य प्रदेश के नतीजे कांग्रेस के लिए स्वाभाविक रूप से निराशाजनक हैं और वे पुरानी कार्यशैली में पूरी तरह से बदलाव की मांग करते हैं. आने वाले दिनों में आप राज्य में कांग्रेस पार्टी की कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन देखेंगे.''