हरियाणा में सरकार पर छाया संकट क्या लोकसभा चुनावी नतीजों में भी दिखाएगा असर?

नायब सैनी की नई सरकार संकट में है लेकिन भाजपा की फौरी चिंता लोकसभा के वोट हैं

कांग्रेस नेता पूर्व मुख्यमंत्री और भूपेंद्र सिंह हुड्डा (दाएं से दूसरे) के साथ निर्दलीय विधायक धर्मपाल गोंदर, रणधीर गोलन और सोमबीर सांगवान
कांग्रेस नेता पूर्व मुख्यमंत्री और भूपेंद्र सिंह हुड्डा (दाएं से दूसरे) के साथ निर्दलीय विधायक धर्मपाल गोंदर, रणधीर गोलन और सोमबीर सांगवान

सात मई की सुबह हरियाणा के राजनैतिक हलकों में उस खबर के बाद सरगर्मी बढ़ गई जब चार निर्दलीय विधायकों ने भाजपा गठजोड़ छोड़ दिया. इससे नायब सिंह सैनी की सरकार संकट में आ गई. शाम तक इनमें से तीन सोमवीर सांगवान (दादरी), रणधीर गोलन (कुंडली) और धर्मपाल गोंदर (नीलोखेड़ी) कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ नजर आए और घोषणा की कि उन्होंने नायब सैनी सरकार से समर्थन वापस ले लिया है.

भूपेंद्र हुड्डा ने भी बिना विलंब किए सरकार को जनविरोधी बताते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर डाली. उन्होंने कहा कि सैनी को तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए. मार्च के मध्य में मनोहर लाल खट्टर से कमान संभालने वाले सैनी अब घर दुरुस्त करने में जुट गए हैं. इस संकट से पहले 90 सदस्यों के सदन में भाजपा के पास 41 विधायक थे और उसे पांच निर्दलीयों के अलावा दो छोटे दलों के सदस्यों का भी समर्थन था (10 विधायकों वाली जननायक जनता पार्टी सरकार से अलग हो गई थी).

अब इनके समर्थन वापस लेने और तथा खट्टर और एक अन्य निर्दलीय रंजीत चौटाला के इस्तीफे से सरकार अल्पमत में आ गई है, ये दोनों लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं. भाजपा के पास अब 43 सदस्य हैं जबकि विपक्ष के पास 45 हैं. हालांकि, निजी बातचीत में भाजपा के नेता कहते हैं कि जननायक जनता पार्टी के पांच विधायक उनके साथ हैं, भले ही उनकी पार्टी के प्रमुख दुष्यंत चौटाला ने कांग्रेस का समर्थन करने की घोषणा की है. 

हरियाणा अभी चुनाव की गिरफ्त में है और यहां 25 मई को 10 लोकसभा सीटों के लिए वोट डाले जाने हैं. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस चुनाव को इस साल राज्य में बाद में होने वाले चुनावी संग्राम से पहले का सेमीफाइनल मानकर लड़ रही हैं.

हालांकि, सैनी सरकार पर सदन में बहुमत साबित करने का दबाव है, लेकिन पार्टी प्रवक्ता जवाहर यादव कहते हैं, "मध्य मार्च में मुख्यमंत्री ने विश्वास मत जीता था. अब दोबारा विश्वास मत परीक्षण मुश्किल है. अगर कोई संकट हुआ तो हम अपना बहुमत साबित करेंगे."

इस बीच, सैनी करनाल सीट से विधानसभा का उपचुनाव लड़ रहे हैं जो खट्टर के इस्तीफे से खाली हुई है. मुख्यमंत्री सैनी ने मीडिया से बातचीत में समर्थन वापसी के घटनाक्रम पर कहा, "हर किसी की कुछ इच्छाएं होती हैं और कांग्रेस आजकल लोगों की इच्छाएं पूरी करने में लगी हुई है. कांग्रेस को जनता की इच्छाओं से मतलब नहीं है, वह अपनी इच्छाएं पूरी करना चाहती है."

उधर, खट्टर भी सरकार को किसी खतरे से इनकार करते हैं. उनका कहना है, "कौन किधर जाता है, किधर नहीं जाता, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. कई विधायक हमारे संपर्क में हैं." 

विपक्षी खेमे में पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा और उनके बेटे दीपेंद्र एक ऐसी धुरी बन गए हैं जो मजबूत होती जा रही है. कांग्रेस ने पिछले सप्ताह 10 उम्मीदवारों की घोषणा की, इनमें से आठ हुड्डा खेमे के हैं. दूसरी तरफ, सैनी को एक दशक का सत्ता विरोधी रुझान और जाटों का अलगाव विरासत में मिला है (समर्थन वापस लेने वाले सभी तीनों विधायक जाट हैं). हरियाणा में खेती से जुड़े जाट समुदाय का दबदबा है और वे आबादी का 27 फीसद हैं और एक पट्टी की सभी सीटों पर अहम भूमिका निभाते हैं. 

सालों से उनमें भाजपा के प्रति अलगाव की भावना घर कर गई है. सत्ता से दूरी का एहसास तब शुरू हुआ जब खत्री जाति से ताल्लुक रखने वाले खट्टर को 2014 के चुनाव में मुख्यमंत्री चुना गया जबकि आम चुनाव में जाटों ने नरेंद्र मोदी का जोरदार समर्थन किया था.

उसके बाद से चीजें कभी बराबरी के स्तर पर नहीं आईं. पिछले दशक में नाराज करने वाली लगातार कई घटनाएं हुईं: 2016 में जाटों का हिंसक आरक्षण आंदोलन, किसान आंदोलन, दिल्ली में पहलवानों का विरोध, जिसे खापों का भी समर्थन मिला. पंजाब के किसान संगठनों के साथ तनाव और आंदोलन के ताजा हालात ने इसकी आग में घी का ही काम किया है.

पंजाब की तरह जाटों के नेतृत्व वाले किसान संगठनों ने जाट बहुल गांवों में भाजपा नेताओं के घुसने पर रोक लगा दी है. जमीनी खबरों से संकेत मिल रहा है कि कांग्रेस सभी जाट बहुल सीटों सिरसा, हिसार, सोनीपत और रोहतक में मजबूत है. 

पर इसकी भी काट है. सैनी प्रदेश के स्थानीय कृषक गैर-जाट पिछड़ी सैनी जाति से ताल्लुक रखते हैं. यहां इसमें मजबूत रणनीतिक निरंतरता दिखाई देती है. सैनी को खट्टर के बनाए गैर-जाट जातियों के गठजोड़ पर भरोसा है.

वर्ष 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में राज्य के करीब 70 फीसद गैर-जाटों और 50 फीसद जाटों ने भाजपा के लिए मतदान किया. उस समय भाजपा ने सभी 10 लोकसभा सीटें जीतीं और पार्टी को उम्मीद है कि 25 मई को एक बार फिर जाट उसका समर्थन करेंगे. लोकसभा के चुनाव नतीजे राज्य के नेताओं का हौसला बढ़ा और डिगा सकते हैं, इसका प्रदेश सरकार पर असर दिखेगा.

चुनावों में जीत के लिए कांग्रेस ने हुड्डा को बनाया हरियाणा का बॉस

फसल चक्र या क्रॉप रोटेशन अपनाना खेत के लिए अच्छा हो सकता है लेकिन जरूरी नहीं कि राजनीति के मामले में भी ऐसा ही हो. कम से कम कांग्रेस ने हरियाणा में अपनी पार्टी के लिए कुछ इसी तरह का फैसला किया है यानी रोटेशन न अपनाने का और इस बार कर्ताधर्ता बनाया है तेजतर्रार भूपेंद्र सिंह हुड्डा को.

प्रत्याशी चुनने से लेकर जातिगत समीकरणों को नए सिरे से साधने और प्रचार की दिशा तय करने तक के काम अपने हाथ में लेते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने पार्टी के भीतर अपने सभी प्रतिद्वंदियों को पीछे छोड़ दिया.

उनकी नजरें स्पष्ट रूप से इस साल के अंत में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों पर है लेकिन विडंबना देखिए कि वे आम चुनाव का इस्तेमाल अपने शस्त्रागार के परीक्षण के लिए सेमीफाइनल के तौर पर कर रहे हैं. आप के टिकट पर चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी सहित राज्य के 10 में से आठ उम्मीदवार रोहतक के इस जाट नेता की सौगंध खाते हैं. 

यहां तक कि सामान्य समय में हुड्डा विरोधी रुख रखने वाली और गांधी परिवार की वफादार कुमारी शैलजा भी उनकी ताकत के आगे नतमस्तक होते हुए हलचल भरे शहर अंबाला का चुनावी मैदान को छोड़कर राज्य के पश्चिमी सिरे के सिरसा जाने पर राजी हो गईं. यहां उनका मुकाबला हुड्डा के एक और दुश्मन अशोक तंवर से है जो पाला बदलकर भाजपा में चले गए हैं.

बड़ी तस्वीर देखें तो हुड्डा से अदावत रखने वाले कुलदीप बिश्नोई, विनोद शर्मा, नवीन जिंदल जैसे नेता जिन्होंने कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र को कभी दिलचस्प बना दिया था, अब दूसरे खेमे में जा चुके हैं. पाला बदलने वालों ने भी हालात उलझाए हैं.

हुड्डा के चचेरे भाई और हिसार के सांसद बृजेंद्र सिंह मार्च में कांग्रेस में आ गए थे और फिर अप्रैल में उनके पिता चौधरी बीरेंद्र सिंह भी आ गए. चौधरी बीरेंद्र ने 2014 में हुड्डा के प्रभुत्व को चुनौती देते हुए बगावत की और भाजपा में चले गए. तब उन्हें केंद्रीय मंत्री का पद भी मिला था.

लेकिन पिता पुत्र की जोड़ी फिर कट गई है क्योंकि बृजेंद्र को हिसार से टिकट नहीं मिला है. दो और हुड्डा विरोधी किरण चौधरी और रणदीप सुरजेवाला असंतुष्ट हैं. लेकिन यह हरियाणा है. यहां 10 सीटों की सीमित संख्या में दूसरे दर्जे के खिलाड़ियों को कैसे मौका दिया जा सकता है.

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