"जंगलराज" के नैरेटिव के सामने विकास का लालटेन जलाने में कितना सफल होंगे तेजस्वी?

​बिहार का सियासी माहौल बेहद गरम. यहां राजद प्रमुख तेजस्वी यादव ने युवाओं से जुड़े मुद्दों को प्रधानमंत्री मोदी की अपील और नीतीश कुमार पर बुरी तरह आश्रित भाजपा से मुकाबले में औजार बनाया

वैशाली के हाजीपुर में 29 अप्रैल की रैली में राजद नेता तेजस्वी यादव
वैशाली के हाजीपुर में 29 अप्रैल की रैली में राजद नेता तेजस्वी यादव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 अप्रैल को मुंगेर की चुनावी रैली में कहा, "हमारी कोशिश संतुष्टीकरण है, उनकी (कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्ष) तुष्टीकरण की..." उन्होंने करीब 30 मिनट के भाषण में बेहतर कल के तमाम वादे और विपक्ष पर वार करने में कोई कोताही नहीं बरती.

बिहार में लालू प्रसाद और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के दौर को "जंगल राज" से लेकर कांग्रेस की आम आदमी की संपत्ति पर 'बुरी नजर' (खूब चर्चा में आए 'विरासत कर' मामले) जैसे तमाम आरोपों से भाजपा के स्टार प्रचारक ने एनडीए का मोर्चा मजबूत करने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी.

पिछले कई बार की तरह इस बार भी भगवा पार्टी का प्रचार अभियान काफी हद तक प्रधानमंत्री मोदी की अपील पर आश्रित है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी सभाएं और रोड शो कर रहे हैं, लेकिन उनके भाषण आम तौर पर कुछ माह पूर्व तक उनके साथ सत्ता साझा कर चुके राजद की आलोचना और मोदी की तरह ही लालू के जंगल राज की पुरानी यादों को जगाने तक सीमित होते हैं. हालांकि, तब से गांधी सेतु के नीचे गंगा में बहुत पानी बह चुका है और ऐसे नैरेटिव से मतदाताओं को अपनी ओर खींचना आसान नहीं है. 

दरअसल, अब चुनावी नैरेटिव पर लालू प्रसाद के बेटे तथा राजद अध्यक्ष तेजस्वी यादव की पकड़ ज्यादा पुख्ता दिखती है. 34 वर्षीय राजद नेता 29 अप्रैल तक करीब 75 सभाएं कर चुके थे. वे नौकरी-रोजगार और नौजवानों को मजबूती देने तथा रोजी-रोटी के मुद्दों को उठा रहे हैं, जो लोगों को ज्यादा भा रहे हैं.

हफ्ते-दर-हफ्ते सियासी पारा चढ़ता जा रहा है (बिहार में आखिरी चरण तक वोट पड़ेंगे) और तेजस्वी ने प्रधानमंत्री पर हमले भी तेज कर दिए हैं. वे उन्हें "झूठ के मैन्युफैक्चरर और थोक डीलर" करार दे रहे हैं. युवा राजद नेता की पकड़ मौके पर मजबूत होती दिखती है, मगर एक दरार पाटने की चुनौती भी मुंह बाए खड़ी है: कुछ तबकों में राजद के मुख्य जनाधार यादवों को लेकर दुविधा कैसी तोड़ी जाए. 

माहौल तेजस्वी के पक्ष में तैयार हो सकता है, इस खबर से विरोधी खेमा भी अनजान नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी ने अप्रैल के अंत में गया की रैली में "जंगल राज" जैसी आम बातों के बाद "स्मार्टफोन रखने वाले स्मार्ट युवाओं" की ओर रुख किया. उन्होंने कहा, "बताओ, क्या स्मार्टफोन को लालटेन (राजद का चुनाव चिह्न) से चार्ज कर सकते हैं? लालटेन युग में फंसे ये लोग बिहार को कभी आगे नहीं बढ़ने देंगे." कुछ ही घंटों में तेजस्वी का चुटीला जवाब आ गया.

उन्होंने एक्स पर लिखा, "मोदीजी, कीचड़ में सना कमल (भाजपा का चुनाव चिह्न) भी मोबाइल फोन चार्ज नहीं कर सकता." फिर यह भी जोड़ा, लालटेन कम-से-कम "रोशनी तो देती है." इतना ही नहीं, राजद प्रमुख के मांस-मछली खाने की आदत, ज्यादा बच्चों के लिए लालू की खिल्ली से लेकर विपक्ष की मंगलसूत्र और घर के सोने पर नजर, शायद ही कोई मुद्दा इस चुनावी मौसम में अछूता है.

दावेदार

तेजस्वी हाजीपुर में 29 अप्रैल को भाषण खत्म करने से पहले ठहरे. फिर बोले 'चुप चाप', और भीड़ में गूंजा, "लालटेन छाप." यह सिर्फ नारा भर नहीं है, बल्कि गहरा संदेश भी है. तेजस्वी के इरादे साफ हैं, वे मुखर होकर बोलने के बजाए शालीनता से राजद के लिए समर्थन जुटाना चाहते हैं. उनकी जाति यानी यादवों को बड़बोला माना जाता है.

इन दिनों चुनाव प्रचार में तेजस्वी के सहयोगी हाल ही में महागठबंधन का हिस्सा बने विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के प्रमुख मुकेश सहनी हैं. रैलियों में भाषण की शुरुआत अक्सर सहनी करते हैं और कहते हैं कि भाजपा उनके तीन विधायक उड़ा ले गई. उसके बाद तेजस्वी बात को आगे ले जाते हैं कि भाजपा ने न सिर्फ विधायकों को छीन लिया, बल्कि उनके 'चाचाजी' (नीतीश कुमार) को भी 'हाइजैक' कर लिया.

तेजस्वी खास रणनीति के तहत अपने परिवार पर मुख्यमंत्री के तीखे हमलों के बावजूद सीधे उन पर निशाना साधने से बचते हैं. वे अक्सर यही कहते हैं, "जहां रहें, स्वस्थ रहें." जाहिर है, लक्ष्य उन समुदायों को साधना है जो नीतीश के समर्थक हैं.

बेहद सजगता के साथ चुनाव अभियान संभालते तेजस्वी ने अपनी खास शैली से नेतृत्व कौशल का परिचय दिया है और उनके व्यक्तित्व का यह पहलू लोगों को चकित कर रहा है. वैशाली में तेजस्वी ने मोदी के 'भाइयो-बहनो' वाले संबोधन की खास अंदाज में नकल उतारी, और खगड़िया में दिखा दिया कि भीड़ के साथ नजदीकी जुड़ाव कैसे कायम किया जा सकता है. उन्होंने मोदी पर जमकर व्यंग्य बाण छोड़े और लोगों को उनके एक दशक लंबे कार्यकाल में हुए बदलावों पर सोचने को बाध्य कर दिया.

रैलियों में वे मोदी पर कटाक्ष करते हैं और 2014 और 2019 के भाजपा के अधूरे वादों की याद दिलाते हैं. यही नहीं, बिहार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करने के लिए वे अक्सर रैलियों में कुछ लोकोक्तियों या 'जीना यहां, मरना यहां' जैसी फिल्मी गीतों की टुकड़ियां गाकर लोगों को मुग्ध कर देते हैं. राज्य के युवा, खासकर 18-29 वर्ष आयु वर्ग के 20 फीसद से ज्यादा मतदाता उनके हर शब्द पर झूमते नजर आते हैं.

सैकड़ों युवाओं को मोबाइल फोन पर तेजस्वी के भाषण रिकॉर्ड करते देखा जा सकता है. वाकई, प्रचार की शुरुआत से ही उन्हें शायद ही कोई ओछी बात करते सुना गया. वे लगातार 'इंडिया' ब्लॉक के सबको साथ लेकर चलने के एजेंडे की बात करते हैं और हमेशा मंच पर बिहार के विविध समुदायों को साथ रखते हैं.

तेजस्वी ने अपनी असली क्षमता तो 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान दिखाई, जब उन्होंने जद (यू)-भाजपा गठबंधन के खिलाफ राजद गठबंधन का नेतृत्व किया और 75 विधायकों (243 सदस्यीय सदन में) के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे. अगस्त 2022 में नीतीश महागठबंधन में लौटे तो उनके डिप्टी बनकर 17 महीने तक उन्होंने अपनी इस छवि को और चमकाया. देर रात अस्पतालों में निरीक्षण के लिए पहुंचने से लेकर करीब 5,00,000 सरकारी नौकरियों के सृजन तक डेढ़ साल में तेजस्वी की प्रतिष्ठा बढ़ी है. नीतीश भले अब अपने पूर्व उप-मुख्यमंत्री के योगदान को 'बेमानी' बता रहे हों लेकिन उन्होंने काम के बूते शायद लोगों के मन में अपनी जगह पक्की कर ली है.

शायद यह इससे भी जाहिर होता है कि वे लगातार बिहार पहुंच रहे एनडीए के दिग्गज नेताओं से अकेले ही मोर्चा ले रहे हैं. इसमें सहनी उनके साथी हैं—जिनकी पार्टी वीआईपी तीन सीटों गोपालगंज, मोतिहारी और झंझारपुर में चुनाव लड़ रही है. ईबीसी के तहत अधिसूचित निषाद, मल्लाह और सहनी उपजातियां सहनी की पार्टी का प्रमुख जनाधार हैं, जिनकी आबादी करीब पांच फीसद है.

तेजस्वी और सहनी सोशल मीडिया पर एकदम हिट जोड़ी बन गए हैं. हेलिकॉप्टर की सवारी के दौरान दोनों को मछली खाते दिखाने वाले पोस्ट को हजारों लाइक्स मिले. इसमें सहनी यह कहते भी सुने गए कि "बहुतों को मिर्च लगेगा" और फिर हुआ भी वही. वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने राजद नेता को नवरात्र में मांसाहार करने और तुष्टीकरण की राजनीति के लिए घेरा. तेजस्वी ने कहा कि यह क्लिप पहले की है और उन्होंने आलोचकों के 'कम आइक्यू' को उजागर करने के लिए डाला था.

बिहार की आबादी में मुस्लिम-यादव (एम-वाई) करीब 32 फीसद हैं, जो राजद का मजबूत आधार हैं. लेकिन तेजस्वी का मानना है कि दोतरफा मुकाबले में एनडीए को हराने के लिए यह पर्याप्त नहीं होगा. यही वजह है कि जाति समीकरणों को लेकर उन्होंने काफी व्यावहारिक रुख अपनाया और पूर्णिया, औरंगाबाद और नवादा जैसी प्रमुख सीटों पर कुशवाहा और ईबीसी नेताओं को उतारा.

इसमें मुंगेर में पूर्व जद (यू) अध्यक्ष ललन सिंह के मुकाबले सजायाफ्ता कुर्मी डॉन अशोक महतो की पत्नी अनीता देवी के अलावा औरंगाबाद में अभय कुशवाहा, नवादा में श्रवण कुशवाहा और वैशाली में उच्च जाति के नेता मुन्ना शुक्ला जैसे विवादास्पद नाम भी शामिल हैं. गया के पंचानपुर में एक निजी स्कूल चलाने वाले एनडीए समर्थक रहे जितेंद्र कुमार मानते हैं कि अपने सामाजिक जनाधार का विस्तार करने के लिए औरंगाबाद और नवादा में कुशवाहा उम्मीदवारों को उतारने के राजद के फैसले ने उनके समुदाय के बीच सेंध लगा दी है, जो एनडीए समर्थक माना जाता है.

राजद की रणनीति में 2023 में बिहार में हुआ जाति सर्वेक्षण काफी मददगार रहा है, जिसमें यह बात सामने आई कि ओबीसी (27 फीसद) और ईबीसी (36 फीसद) मिलकर राज्य की 13 करोड़ आबादी में 63 फीसद हैं. पार्टी ने 23 उम्मीदवार उतारे हैं जिनमें नौ यादव, दो मुस्लिम और तीन कुशवाहा हैं. करीब 25 फीसद उम्मीदवार महिलाएं हैं, जिनमें लालू की दो बेटियां भी हैं.

एनडीए के आंकड़े

भाजपा के "चार सौ पार" लक्ष्य के लिए बिहार अहम राज्य है. यहां पिछले दो लोकसभा चुनाव में उसके गठबंधन को कुल 40 सीटों में से 31 और 39 सीटें हासिल हुईं. नीतीश और उनके जद (यू) की वापसी से उसका उत्साह बढ़ा है, मगर इसमें अब कोई शंका नहीं कि किसका पलड़ा भारी है. पहली बार भाजपा 17 सीटों पर लड़ रही है, जो जद (यू) की 16 से एक अधिक है. एनडीए में तीन अन्य पार्टियां हैं—चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को पांच, जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) को एक-एक सीट मिली है. 

प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, भाजपा के उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, लोजपा के चिराग पासवान

मगर एनडीए के पास समस्याओं की कमी नहीं है. नीतीश के महागठबंधन और एनडीए के बीच पाला बदलते रहने से विश्वनीयता और रुतबा घटा है, उनकी सुशासन बाबू की छवि को भी झटका लगा है. उनका पारंपरिक लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) भले उनके साथ रहे, नीतीश को शायद पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा भाजपा की जरूरत है. 

अप्रैल के मध्य में गया और पूर्णिया में मोदी की रैलियों से मुख्यमंत्री की गैर-मौजूदगी ने भी संभावित दरार की अटकलों को हवा दी, हालांकि वे 26 अप्रैल को मुंगेर की रैली में प्रधानमंत्री के साथ मंच पर थे और ललन सिंह के लिए वोट मांगा. मगर अफवाहों का सिलसिला जारी है. यह भी साफ नहीं है कि चिराग पासवान के छह फीसद पासवान वोटरों को किस तरह लुभाया जाएगा. जद (यू) और लोजपा के बीच कटुता रही है और कोई नहीं जानता कि उनके बीच वोट ट्रांसफर कैसे हो पाएगा.

मोदी शो

मुंगेर के सफियाबाद मैदान में 26 अप्रैल को उमड़ी भीड़ में "मोदीजी को जय श्रीराम" का नारा गूंज उठा. पहली कतार में महिलाओं ने भाजपा का झंडा थाम रखा था और प्रधानमंत्री के कटआउट लहरा रही थीं. मोदी माइक पर आए, तो लोगों में उत्साह की लहर दौड़ गई. जो नीतीश के भाषण के दौरान ठंडा था. कोई संदेह नहीं कि शो का स्टार कौन है.

बिहार में मोदी ही हैं जो एनडीए के लिए वोट जुटाएंगे. गठबंधन की उम्मीदें उच्च जातियों, कुछ ईबीसी समूहों और नीतीश कुमार के लव-कुश समीकरण पर टिकी हैं. सहयोगी चिराग पासवान और मांझी से दलित वोटों की उम्मीद है. 

एनडीए की व्यापक योजना सामाजिक विभाजन पर फिर से लौटने की है. यह धारणा है कि यादव दबदबे से सतर्क कुछ तबके राजद का समर्थन करने से परहेज करेंगे. इसके अलावा सहयोगी कांग्रेस का बोझ तेजस्वी पर भारी पड़ रहा है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी अब तक केवल एक बार 20 अप्रैल को भागलपुर की सभा में बोले हैं. भाजपा के स्टार प्रचारकों की भीड़ की तुलना में यह बेहद कमजोर प्रदर्शन है. 

एनडीए मोदी, राम मंदिर, किसान निधि और पांच किलो मुफ्त अनाज के लाभार्थियों की बड़ी आबादी पर भरोसा कर रहा है. 
एनडीए और महागठबंधन दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ नैरेटिव गढ़ा है. चिलचिलाती धूप और जनता की उदासीनता से पहले दोनों चरणों में हुए कम मतदान ने विशेषज्ञों के लिए भी आकलन मुश्किल कर दिया है. एनडीए मोदी के निर्णायक नेतृत्व का जिक्र कर रहा है, तो महागठबंधन बेरोजगारी और ग्रामीण संकट को उजागर कर रहा है. नतीजा इस पर निर्भर करेगा कि आखिर किस नैरेटिव का असर वोटरों पर सबसे ज्यादा पड़ता है. 

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