कर्नाटक: कांग्रेस की योजनाओं के सामने मोदी ट्रंप कार्ड कितना होगा असरदार?

कर्नाटक में पीएम नरेंद्र मोदी के करिश्मे और उनकी फ्लैगशिप स्कीमों के असर से निबटने के लिए कांग्रेस सीएम सिद्धरामैया की कल्याणकारी गारंटी योजनाओं पर भरोसा कर रही

कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया कांग्रेस के दूसरे नेताओं के साथ बेंगलोर की एक रैली में
कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया कांग्रेस के दूसरे नेताओं के साथ बेंगलोर की एक रैली में

—अजय सुकुमारन

लोकसभा चुनाव में कर्नाटक में एक विरोधाभास हमेशा दिखाई देता है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 2004 से ही लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतती रही है लेकिन अभी तक एक भी विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाई. वहीं, कांग्रेस कर्नाटक में इन दो दशकों में दो बार स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आ चुकी है लेकिन इस अवधि में हुए चार लोकसभा चुनाव में उसे कभी इकाई अंकों से ज्यादा सीटें नहीं मिलीं.

यह रुझान स्वाभाविक तौर पर यह बताता है कि जब संसदीय चुनावों की बात आती है तो राज्य में भाजपा का पलड़ा भारी रहता आया है. मगर विडंबना यह है कि इसी बात ने 2024 में पार्टी पर भारी दबाव आयद कर दिया है. खास तौर पर ऐसे समय में जब उसके लिए दक्षिणी राज्यों में अपनी सीटों की संख्या को अधिकतम सीमा तक ले जाना बेहद अहम हो गया है.

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि 2019 के चुनाव में भाजपा ने तकरीबन क्लीन स्वीप करके अपने लिए एक रिकॉर्ड कायम किया था. उसने राज्य में लोकसभा की 28 में से 25 सीटें जीती थीं और अकेले निर्दलीय का समर्थन हासिल करके विपक्ष को महज दो सीटों पर समेट दिया था. तो क्या भाजपा उस कामयाबी को दोहरा सकती है या फिर उससे भी बेहतर कर सकती है?

पार्टी ने नवंबर में इस लक्ष्य की तरफ बढ़ना शुरू किया, जब उसने दिग्गज लिंगायत नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के बेटे बी.वाई. विजयेंद्र को राज्य इकाई की अध्यक्षता सौंपकर अपने कायाकल्प की दिशा में कदम बढ़ाए. निश्चित तौर पर यह मई 2023 के विधानसभा चुनाव की करारी हार के बाद अधबीच सुधार की कोशिश थी. जुलाई 2021 में उसने येदियुरप्पा को हटाकर बासवराज बोम्मई को कमान सौंपी थी. मई 2023 में पार्टी को मिली तगड़ी हार के कई कारणों में यह बदलाव भी प्रमुख था. उस चुनाव में कांग्रेस ने पारंपरिक तौर पर भाजपा के समर्थक रहे वीरशैव-लिंगायत सरीखे राज्य के प्रमुख समुदायों का समर्थन हासिल कर लिया था.

साथ ही भाजपा ने कर्नाटक के दूसरे बड़े जाति समूह वोक्कलिगा के समर्थन पर निर्भर रहने वाली पार्टी जनता दल (सेक्युलर) के साथ सीटों के बंटवारे का समझौता किया. दबदबा रखने वाली इन जातियों को गोलबंद करने की इस कोशिश ने कांग्रेस को अल्पसंख्यकतारु यानी अल्पसंख्यकों, हिंदुलिदावारु यानी पिछड़े वर्गों और दलितारु यानी दलितों के बीच अपना समर्थन आधार और मजबूत करने के लिए मजबूर कर दिया. यह समूह कन्नड़ नामों के पहले अक्षरों से मिलकर बने छोटे नाम 'अहिंदा' से जाना जाता है और जो मुख्यमंत्री सिद्धरामैया के अभियान का मुख्य आधार है.

एक रैली के दौरान मैसूरू सीट से भाजपा प्रत्याशी, प्रदेश पार्टी अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र और जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी (दाएं)

भाजपा की सबसे बड़ी ताकत अलबत्ता अब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता है. राजनैतिक विश्लेषक प्रो. ए. नारायण कहते हैं, "पिछले चुनाव में भाजपा को जो फायदे हासिल थे, वे अब भी कायम हैं. मगर सत्तारूढ़ पार्टी होने के नाते कांग्रेस इस बार ज्यादा मजबूत स्थिति में है." इसीलिए कांग्रेस के अभियान के मूल में जनकल्याण वाली वे योजनाएं या गारंटियां हैं जो सिद्धारमैया सरकार ने पिछले साल मई में सत्ता में आने के बाद शुरू की हैं.

कल्याण का गारंटी कार्ड

बीते 10 महीनों में कांग्रेस ने अपनी जनकल्याण गारंटियों पर 33,468 करोड़ रुपए खर्च किए हैं. इन योजनाओं का फायदा कर्नाटक के तकरीबन 4.5 करोड़ लाभार्थियों तक पहुंच रहा है. अलग-अलग सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए सरकार के एक बड़े अफसर दावा करते हैं कि जितने लाभार्थियों का लक्ष्य रखा गया था उनमें से 95 फीसद को अब तक कवर किया जा चुका है.

कर्नाटक में 5 अप्रैल को कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति की कमान संभालने वाले विनय कुमार सोराक कहते हैं, "इनमें कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ और ये कार्यक्रम लाभार्थी के समुदाय का ख्याल रखे बगैर लागू किए गए थे." सोराक का कहना है कि इससे पार्टी को भाजपा के वोट अपने पाले में लाने और अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने का "ऐसा मौका मिला जो पहले कभी नहीं  मिला" था. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को आखिरी बड़ी कामयाबी 1999 में मिली थी जब उसने 45.41 फीसद वोट हिस्सेदारी जुटाकर 18 सीटें जीती थीं.

उसके बाद से तो एक के बाद एक संसदीय चुनाव में उसने सिर्फ ढलान ही देखी और भाजपा मजबूत पसंदीदा पार्टी के तौर पर उभरी. विंडबना यह है कि बीते 20 साल में कांग्रेस ने सबसे अच्छा प्रदर्शन 2014 में किया, जब राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी रसातल में थी और कर्नाटक में 42.15 वोट हिस्सेदारी के साथ उसने नौ सीटें जीतीं. इत्तेफाकन उस वक्त पार्टी कर्नाटक में सत्ता में थी और यह मुख्यमंत्री के तौर पर सिद्धारमैया का पहला कार्यकाल था.

सोराक कहते हैं कि इस बार मुख्य चुनावी मुद्दे महंगाई और बेरोजगारी हैं. कांग्रेस अपनी गारंटियों पर भरोसा करके चल रही है, तो भाजपा भी मोदी सरकार की सबसे अहम योजनाओं को इतनी ही प्रमुखता देते हुए मतदाताओं के बीच जा रही है. बेंगलोर में 2 अप्रैल को भाजपा के बूथ स्तर के कार्यकर्ता सम्मेलन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि कर्नाटक में केंद्र की जनकल्याण योजनाओं के तीन करोड़ लाभार्थी हैं. हालांकि उस बैठक में शाह ने यह आरोप लगाकर लड़ाई का एक और मोर्चा खोल दिया कि सिद्धारमैया सरकार ने सूखा राहत का प्रस्ताव पेश करने में तीन महीने की देरी की जिससे समय पर धनराशि जारी नहीं की जा सकी. 

केंद्र बनाम राज्य

उसी दिन हड़बड़ी में बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में शाह के आरोप पर पलटवार करते हुए कर्नाटक के राजस्व मंत्री कृष्णा बायरेगौड़ा ने उन पर "जख्म पर नमक छिड़कने" का आरोप लगाया. राज्य के 236 में से 223 उप-जिलों में फैले व्यापक सूखे का सामना कर रही कर्नाटक सरकार ने 23 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर करके नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फंड (एनडीआरएफ) के तहत वित्तीय सहायता जारी करवाने की मांग की, जो अक्तूबर में केंद्र की अंतरमंत्रालयीन समिति के मैदानी आकलन के पूरा होने के बाद से ही लंबित है.

कर्नाटक में 26 अप्रैल और 7 मई को दो चरणों में मतदान होना है. सिद्धारमैया सरकार और मोदी की हुकूमत के बीच टकराव चुनाव की मुख्य थीम में से एक के तौर पर उभर रहा है. सिद्धारमैया अपनी चुनाव रैलियों में सबसे ज्यादा कर देने वाले राज्यों में से एक होने के बावजूद कर्नाटक के साथ हो रहे 'सौतेले' बर्ताव को लेकर हमला करते हैं. मगर भाजपा के राज्य प्रमुख विजयेंद्र को लगता है कि स्थानीय मुद्दे पर अपना चुनाव अभियान चलाने से कांग्रेस को मदद नहीं मिलेगी. वे कहते हैं, "लोग काफी स्मार्ट हैं और समझते हैं कि यह चुनाव कर्नाटक का नहीं बल्कि देश का भविष्य तय करेगा."

राजनैतिक विश्लेषक प्रो. संदीप शास्त्री को लगता है कि कर्नाटक में कांग्रेस के जुड़वां मुद्दों में भी गारंटी योजनाएं ज्यादा असरदार हैं. उनके शब्दों में, "सवाल यह है कि क्या यह कहना कि राज्य स्तर पर केंद्र हमारे खिलाफ भेदभाव कर रहा है...मतदाता को प्रभावित करेगा?" इसके अलावा कर्नाटक के पिछले चुनाव नतीजे दिखाते हैं कि मतदाता विधानसभा और लोकसभा चुनावों में हमेशा अलग-अलग ढंग से वोट डालते हैं. शास्त्री याद करते हैं कि 2014 में उन्होंने जिस सर्वे पर काम किया था, उसमें 90 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा था कि वे सिद्धारमैया सरकार से खुश थे. तो भी भाजपा ने 17 सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस को नौ सीटें ही मिलीं.

गठबंधन मजबूत स्थिति में

2019 में कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) की मिली-जुली सरकार थी, जिसमें जेडी(एस) के सर्वेसर्वा एच.डी. देवेगौड़ा के बेटे एच.डी. कुमारस्वामी मुख्यमंत्री थे. हालांकि, लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ने का कांग्रेस-जेडी(एस) का फैसला नुक्सानदेह साबित हुआ और दोनों ही दलों को एक-एक सीट से संतोष करना पड़ा. जबकि भाजपा ने राज्य में अपना अब तक का सबसे शानदार प्रदर्शन करते हुए 25 सीटें जीतीं.

हालांकि, इस बार जेडी(एस) भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा है. समझौते के तहत जेडी(एस) को तीन सीटें मिली हैं जबकि बाकी 25 सीटें वरिष्ठ सहयोगी भाजपा के खाते में आई हैं. लेकिन जमीनी स्तर पर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच नजदीकी स्थापित होना अभी नामुमकिन ही नजर आ रहा है. विजयेंद्र के मुताबिक, पार्टी दो बातों पर खास ध्यान केंद्रित कर रही है—एक जेडी(एस) के साथ मिलकर चुनाव लड़ना और 'सभी 28 सीटों पर जीतकर' एक नया रिकॉर्ड बनाना.

यह लक्ष्य हासिल करने के लिए भाजपा ने अपने कई मौजूदा सांसदों का टिकट काट दिया है. दरअसल, पार्टी ने केवल 10 सीटों पर अपने प्रत्याशी दोहराए हैं, बाकी 15 पर नए उम्मीदवार उतारे हैं. इसमें मैसूरू के अलावा पार्टी के तटीय गढ़ दक्षिण कन्नड़ और उत्तर कन्नड़ भी शामिल हैं. यही नहीं, तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों को भी चुनाव मैदान में उतारने पर जोर दिया गया—भाजपा के बासवराज बोम्मई और जगदीश शेट्टार और जेडी(एस) के कुमारस्वामी.

बहरहाल, एक महीने पहले जब उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप दिया जा रहा था, तो हटाए गए या फिर नजरअंदाज कर दिए गए असंतुष्ट स्थानीय नेताओं ने खासी नाराजगी जाहिर की. शास्त्री कहते हैं, "अगर उन्हें (भाजपा को) अपना वर्चस्व बरकरार रखना है तो 100 फीसद स्ट्राइक रेट की जरूरत होगी. लेकिन मौजूदा हालात में यह एक कठिन लक्ष्य नजर आता है क्योंकि पार्टी को इससे पहले कभी भी इतने असंतोष का सामना नहीं करना पड़ा है." भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी की मानें तो ये सब छोटी-छोटी बातें हैं और इस चुनाव में आखिरकार मोदी फैक्टर ही स्थानीय उम्मीदवारों के समर्थन पर भारी पड़ेगा. वे इसके बजाय कांग्रेस उम्मीदवारों की सूची की ओर इशारा करते हुए सवाल उठाते हैं, "उन्होंने कहां पर कोई गंभीर उम्मीदवार उतारा है?"

कांग्रेस की अपनी चुनौतियां हैं

उसके केवल पांच उम्मीदवारों को ही पूर्व में लोकसभा चुनाव लड़ने का अनुभव है, जबकि छह उम्मीदवार राज्य के मंत्रियों के बच्चे हैं. बहरहाल, कर्नाटक के वन, पारिस्थितिकी और पर्यावरण मंत्री ईश्वर खंडारे इसका बचाव करते हुए कहते हैं कि यह अच्छी बात है, पार्टी युवाओं को आगे बढ़ा रही है. खंडारे कहते हैं, "जब हम युवा भारत की बात करते हैं तो युवाओं को राजनीति में आना चाहिए."

उन्हें पूरा भरोसा है कि उनका 26 वर्षीय बेटा सागर खंडारे—जो लॉ ग्रेजुएट है और कर्नाटक में सबसे कम उम्र का उम्मीदवार है—बीदर में जीत हासिल करेगा, जहां भाजपा असंतोष का सामना कर रही है. खंडारे का दावा है कि कांग्रेस राज्य में 15 से 20 सीटें जीतेगी. वहीं, विजयेंद्र कहते हैं, "हर दिन हमारा ग्राफ बढ़ रहा है." विजयेंद्र के मुताबिक, भाजपा-जेडी(एस) 22 सीटों पर आसानी से जीत हासिल करने की स्थिति में हैं, जबकि शेष छह में मुकाबला कड़ा है. वे कहते हैं, "दिन-ब-दिन स्थितियां भाजपा के लिए बेहतर हो रही हैं, न कि कांग्रेस के लिए."

भाजपा को यह भरोसा भी है कि उसका मोदी ट्रंप कार्ड कर्नाटक विधानसभा चुनाव से उलट नतीजे लाने में मददगार साबित होगा.

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