केसीआर के लिए 'हाथी' की सवारी कितने फायदे की?
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बीआरएस के बीच वोट शेयर में अंतर बमुश्किल दो फीसद था. बसपा को 1.4 फीसद वोट मिले थे जिससे केसीआर को गठबंधन में फायदा होने की उम्मीद है

राजनीति में एक साल बहुत लंबा अरसा होता है और इस बात को भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) से बेहतर शायद कोई और न समझ पाए. उनके लिए तो अब तेलंगाना की 17 लोकसभा सीटों के लिए योग्य उम्मीदवार तक ढूंढ़ पाना मुहाल हो गया है.
अक्तूबर 2022 में पार्टी का नाम बदलने के साथ केसीआर ने अपनी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने के लिए न जाने कितनी भव्य योजनाएं बना रखी थीं. लेकिन अब हाल यह है कि उनके नौ मौजूदा सांसदों में से तीन भाजपा और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं और हताश केसीआर को 5 मार्च को आम चुनाव के लिए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) संग गठबंधन की घोषणा करने पर मजबूर होना पड़ा.
नवंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद बहुत से लोग बीआरएस के टिकट पर चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं हैं. बीआरएस के चुने कुछ नेता इस धारणा की वजह से भी चुनाव लड़ने के अनिच्छुक हैं कि मतदाताओं में अभी भी पार्टी के प्रति नाराजगी है. पार्टी के 39 विधायकों में से कई के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी से मुलाकात करने से भी केसीआर की बेचैनी खासी बढ़ गई है. चर्चा तो यहां तक है कि संसदीय चुनाव संपन्न होने के बाद बीआरएस का एक धड़ा पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो सकता है.
आगामी लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी लड़ाई की संभावना जताई जा रही है जबकि 2019 में दोनों पार्टियों ने कुल मिलाकर सात लोकसभा सीटें जीती थीं. कम से कम चार पूर्व बीआरएस विधायक भाजपा में शामिल हो चुके हैं. वहीं, कुछ वरिष्ठ बीआरएस नेताओं को कांग्रेस की तरफ से टिकट दिए जाने पर मंथन जारी रहने की बात भी कही जा रही है.
दूसरी तरफ, केसीआर की पार्टी को अब मायावती की बसपा का सहारा मिला है. पूर्व आईपीएस अफसर आर.एस. प्रवीण कुमार की अध्यक्षता वाली बसपा की राज्य इकाई ने हालिया विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीती थी. लेकिन केसीआर अपनी पार्टी के अस्तित्व में बने रहने पर ही छाए संकट से उबारने के लिए एक और गणना पर भरोसा कर रहे हैं. विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस और बीआरएस के बीच वोट शेयर में अंतर बमुश्किल दो फीसद (बीआरएस के 37.3 फीसद के मुकाबले 39.4 फीसद) था और इसमें बहुत अधिक बदलाव नहीं हुआ होगा. बसपा को इस चुनाव में 1.4 फीसद वोट मिलने के मद्देनजर केसीआर को उम्मीद है कि बीआरएस-बसपा गठबंधन जीत के लिए निर्णायक साबित होगा.
हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि दोनों पार्टियों के वोटों को साथ ला पाना एक चुनौती है. अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर रणनीतिक लाभ उठा पाने की स्थिति में यह गठबंधन बसपा को अधिक फायदा पहुंचा सकता है. विधानसभा चुनाव में सिरपुर सीट से हारने वाले प्रवीण को नगरकुरनूल लोकसभा सीट पर बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है. नलसार यूनिवर्सिटी, हैदराबाद से जुड़े हरथी वागीशन कहते हैं, ''बीआरएस उन्हें साधने की कोशिश कर रही है ताकि कुछ महत्वपूर्ण वोट बैंक अपने पाले में कर सके. दूसरी तरफ प्रवीण कुमार दलितों की आवाज मुखरता से उठाने के लिए लोकसभा पहुंचने के उत्सुक हैं.''