बिना बर्फबारी के बीत रही कश्मीर की सर्दियां बढ़ा रही इन लोगों की मुश्किलें
पिछली तीन सर्दियों में पर्यटकों की भारी भीड़ ने कश्मीर पर्यटन विभाग को खेल और अन्य गतिविधियों जैसे आयोजनों के लिए प्रेरित किया था

चारों तरफ बर्फ की मोटी परत से ढके ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और हरे-भरे ढलानों के बीच बहती जलधाराएं...धरती के स्वर्ग कश्मीर की कल्पना करते हुए किसी के भी जेहन में यही तस्वीर उभरती है. लेकिन जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों ने दुनिया के अन्य हिस्सों की तरह इन नजारों को भी कुछ धूमिल कर दिया है. इस वर्ष इसका सबसे ज्यादा असर नजर आया. भीषण ठंड में बिना बर्फ के पहाड़ों की चोटियां एकदम सूनी नजर आ रही हैं और घाटियां भी बर्फ की परत से वंचित हैं जबकि यही ज्यादातर लोगों की आजीविका का साधन है.
जलवायु परिवर्तन के कारण बदला परिदृश्य 8,500 फुट की ऊंचाई पर स्थित दुनिया के सबसे ऊंचे स्की रिजॉर्ट्स में एक गुलमर्ग में कहीं ज्यादा साफ तरीके से नजर आ रहा है. देवदार के जंगलों के बीच मखमली बर्फ से घिरा एक लंबा-चौड़ा और प्राकृतिक सुंदरता से भरा यह क्षेत्र स्कीइंग के शौकीनों के लिए स्वर्ग से कम नहीं है. सर्दियों के समय तो यहां का नजारा अद्भुत होता है.
नवंबर से मध्य अप्रैल तक यह बर्फ से पूरी तरह ढंका रहता है और फिर जून तक ऊपरी इलाकों में हर तरफ बर्फ की एक मोटी चादर बिछी रहती है. लेकिन इस बार यह नजारा नदारद है. ढलानों पर बर्फ का नामो-निशान नहीं है और ऊंची चोटियों पर भी महज पतली-सी परत ही नजर आ रही है. आमतौर पर शून्य से नीचे रहने वाला तापमान भी अब 5 डिग्री सेल्सियस के आसपास ठहरकर हैरान कर रहा है.
गुलमर्ग के पास नीलसर तकिया यूसुफ शाह गांव के गुलजार अहमद चोपन कहते हैं, "बर्फ की हमारे लिए वही अहमियत है जो कृषि क्षेत्रों के लिए सिंचाई की है. यह सूखे जैसी स्थिति है." आसपास के गांवों के अन्य लोगों की तरह चोपन भी गर्मियों में पर्यटकों को घोड़े पर बैठाकर आजीविका चलाते हैं. सर्दियों में वे पर्यटकों को स्लेज की सवारी कराते हैं.
पांच बच्चों के पिता चोपन कहते हैं, "यह पहली बार है जब हम जनवरी के मध्य में आजीविका के लिए घोड़ों पर निर्भर हैं." चोपन के लिए इस समय बच्चों की ट्यूशन फीस भर पाना भी दूभर हो गया है. उनका स्लेज एक तरफ लोहे की बाड़ से बंधा पड़ा है. उनके मुताबिक, "मैं सुबह 9 बजे से पर्यटकों का इंतजार कर रहा हूं, अब घूमने आने वालों की संख्या भी बहुत कम हो गई है. पहले तो मैं हर साल पर्यटकों को स्लेज की सवारी कराकर हर रोज 1,500-2,000 रुपए कमा लेता था. अब मुश्किल से 350-400 रुपए की कमाई हो पाती है."
पर्यटकों ने गुलमर्ग के लगभग सभी होटल फरवरी अंत तक बुक करा रखे थे, जिनमें अधिकांश स्कीइंग करने वाले थे. लेकिन बिना बर्फबारी वाली सर्दी के कारण कई लोगों ने यात्रा रद्द कर दी. कोलाहोई ग्रीन हाइट्स में बर्फ के बीच बना देश का पहला ग्लास इग्लू कैफे पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय रहा है.
अब, खाली ग्लास इग्लू क्यूबिकल्स होटल के महाप्रबंधक हामिद मसूदी की चिंता बढ़ा रहे हैं. वे स्कीइंग के लिए स्की, बूट, चश्मे और स्नोबोर्ड जैसे सामान किराए पर देने वाली दुकानों की दुर्दशा के बारे में भी बताते हैं. मसूदी कहते हैं, "हमारे पास तो फिर भी कुछ पर्यटक हैं लेकिन इन दुकानों में काम करने वाले लोगों और स्की प्रशिक्षकों का क्या होगा जो सर्दियों के महीनों में होने वाली कमाई पर निर्भर हैं."
बर्फबारी न होने के कारण खेलो इंडिया विंटर गेम बाधित होने से प्रशासन को भी नुकसान हो रहा है. पिछली तीन सर्दियों में पर्यटकों की भारी भीड़ ने कश्मीर पर्यटन विभाग को खेल और अन्य गतिविधियों जैसे आयोजनों के लिए प्रेरित किया था. गोल्फ क्लब परिसर में मौजूद सहायक निदेशक, गुलमर्ग पर्यटन जाविद-उर-रहमान कहते हैं कि स्की लिफ्ट से लेकर होटल तक सब कुछ पर्यटकों की मेजबानी के लिए तैयार है बस एकमात्र अभाव यही है कि बर्फ नहीं है.
मौसम विज्ञान के नजरिये से पश्चिमी विक्षोभ की कमी के कारण जनवरी में लंबे समय तक शुष्क मौसम रहा, जबकि यही बर्फबारी का चरम मौसम होता है. कश्मीर में सर्दियों की सबसे कठिन अवधि को चिल्ले कलां कहा जाता हैं, जिसमें 21 दिसंबर के आसपास से अगले 40 दिनों तक तापमान अक्सर शून्य से 15 डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाता है. साथ ही काफी बर्फबारी और बारिश होती है.
श्रीनगर में भारतीय मौसम विभाग के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. मुख्तार अहमद का कहना है कि बर्फबारी में कमी की वजह से कश्मीर में कृषि, बिजली, पेयजल, सिंचाई और पहले से ही घट रहे ग्लेशियरों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. वे शुष्क मौसम को ग्लोबल वार्मिंग और अल नीनो का नतीजा बताते हैं. वे बताते हैं, "पहले तो बारिश बर्फीले फाहों के रूप में होती थी और अक्तूबर से मार्च तक होती थी. लेकिन अब बेहद सर्द अवधि दिसंबर-जनवरी तक ही सीमित हो गई है. इस वर्ष तो अल नीनो की वजह से जनवरी ही शुष्क बीत रही है."
- मोअज्जम मोहम्मद, गुलमर्ग में