गुजरात में भरभराते पुलों से लोग परेशान, क्या करेगी बीजेपी सरकार?
भाजपा भले ही होशियारी से इसे एक सामान्य दुर्घटना की तरह पेश कर रही है लेकिन पार्टी के अंदरूनी सूत्र स्वीकार करते हैं कि लगातार दुर्घटनाओं ने पार्टी को परेशान किया है

दशहरे से ठीक एक दिन पहले, उत्तरी गुजरात के बनासकांठा जिले के पालनपुर शहर में एक त्रासदी हुई. एक निर्माणाधीन रेलवे ओवरब्रिज का एक हिस्सा ढह गया, जिससे दो लोगों की जान चली गई. पिछले कुछ वर्षों में राज्य को परेशान करने वाली ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं. पालनपुर हादसा उसी शृंखला में नवीनतम घटना है. फिर ज्यादा देर नहीं लगी और हादसे ने राजनैतिक रंग ले लिया. पार्टियां एक दूसरे पर आरोप लगाने लगीं और एक दूसरे को जिम्मेदार भी ठहराने लगीं.
विपक्षी कांग्रेस ने दावा किया कि फ्लाईओवर का निर्माण करने वाली कंपनी को अहमदाबाद नगर निगम (एएमसी) ने 2017 में ब्लैकलिस्ट कर दिया था क्योंकि उसकी बनाई सड़कें मॉनसून की पहली बारिश में ही बह गईं थीं. कांग्रेस विधायक दल के नेता अमित चावड़ा ने कहा, "सरकारी रिकॉर्ड में जीपीसी इन्फ्रास्ट्रक्चर के कामकाज को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज होने के बावजूद, 2021 में यह ठेका उसे दे दिया गया." उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कंपनी ने 2019 चुनाव से पहले भाजपा को करोड़ों रुपए का चंदा दिया था और यह ठेका एक प्रकार से उस उपकार को चुकाने के लिए दिया गया था.
भाजपा सरकार ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि जीपीसी इन्फ्रास्ट्रक्चर को ठेका मिलने में सरकार और पालनपुर के शहरी स्थानीय निकाय की कोई भूमिका नहीं थी. एक शहरी योजनाकार जिन्होंने दो दशकों तक सरकार के साथ मिलकर काम किया है, बताते हैं कि सरकार ने ठेका किसी और कंपनी को दिया था लेकिन ब्लैक लिस्टेड जीपीसी ने उस कंपनी से सब कॉन्ट्रैक्ट (उप-ठेका) हासिल कर लिया. एक ऐसा राज्य जिसने विकास के महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित कर रखे हों, वहां पुल ढहने की घटनाएं निर्माण की गुणवत्ता और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की निगरानी पर गंभीर सवाल उठाती हैं.
सितंबर में, राजकोट में एक गणेश पंडाल दर्शन के दौरान, नाले को ढंकने के लिए लगाया गया एक कंक्रीट स्लैब खिसक गया जिससे 20 लोग नाले में गिर गए. उनमें से एक की मौत हो गई और कम से कम एक दर्जन घायल हो गए. इससे पहले जून में, तापी जिले में मिंधोला नदी पर बने पुल, जिसका उद्घाटन होने वाला था, का एक हिस्सा ढह गया था. हालांकि इसमें किसी की जान तो नहीं गई, लेकिन इस पुल को जल्द ही वाहनों के आवागमन के लिए खोला जाना था. यह दुर्घटना अगर उद्घाटन के बाद हुई होती तो क्या होता, इसकी कल्पना मात्र से लोग भारी सदमे में थे.
कांग्रेस ने आंकड़े जुटाए हैं, जिसके मुताबिक, पालनपुर दुर्घटना गुजरात में महज दो साल के भीतर दर्ज की गई कम से कम दसवीं घटना है. इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि यह मोरबी फुट ओवरब्रिज ढहने की त्रासदी की पहली बरसी से ठीक एक पखवाड़े पहले हुई. पिछले साल हुए मोरबी हादसे में 135 लोगों की जान चली गई थी. हर दुर्घटना के बाद राज्य में राजनैतिक हंगामा मचा.
एक बड़े विवाद के बाद, एएमसी ने सितंबर में अहमदाबाद के व्यस्त ट्रैफिक जंक्शन पर मौजूद हटकेश्वर ओवरब्रिज को ध्वस्त करने के लिए निविदाएं जारी कीं, जिसे आईआईटी-रुड़की की एक जांच समिति ने उपयोग के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था. फ्लाईओवर को 2017 में जनता के लिए खोला गया था लेकिन चार साल में यह खस्ताहाल हो गया जिसके कारण आखिरकार जून 2022 में इसे बंद करना पड़ा. इन परियोजनाओं की देखरेख सड़क और भवन विभाग करता है जो मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के पास है. उन्होंने पालनपुर दुर्घटना के कारणों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया. लेकिन एक दिन बाद, वित्त मंत्री कनुभाई देसाई ने आधिकारिक जांच रिपोर्ट आने से पहले ही यह कह दिया कि दुर्घटना घटिया सामग्री के कारण नहीं बल्कि 'निर्माण कारीगरी में दोष' के कारण हुई.
भाजपा भले ही होशियारी से इसे एक सामान्य दुर्घटना की तरह पेश कर रही है लेकिन पार्टी के अंदरूनी सूत्र स्वीकार करते हैं कि लगातार दुर्घटनाओं ने पार्टी को परेशान किया है. कैबिनेट बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए, देसाई ने कहा कि सरकार नीतियों में कुछ बदलाव की सोच रही है जिससे ठेके के आवंटन में सबसे कम बोली लगाने वालों की तुलना में, गुणवत्ता को प्राथमिकता दी जा सके.
वरिष्ठ शहरी योजनाकार का कहना है कि हालांकि ठेके देने में एक नई मानक संचालन प्रक्रिया की सख्त आवश्यकता तो है, लेकिन न्यूनतम लागत पर विचार किए बिना अच्छी गुणवत्ता सुनिश्चित करना बस पुरानी शराब को पहले से ज्यादा महंगी बोतल में परोसने वाली बात होकर रह जाएगी. वे कहते हैं, "यह संकट प्रशासन में मौजूद गहरी सड़ांध को दर्शाता है जिसे नियंत्रित करने में सरकार असमर्थ है." उन्होंने यह भी कहा, "अयोग्य इंजीनियरों को प्रोमोट किया गया है. जांच हमेशा वे ही अधिकारी करते हैं जो इस समस्या का कारण होते हैं. कागज पर तो किसी योजना में कोई खामी नजर नहीं आएगी लेकिन काम करने के तरीके में बड़ी भारी खामियां हैं."
जून में, सुदूर बिहार के भागलपुर में एक निर्माणाधीन पुल के दूसरी बार ढहने की घटना की गूंज गुजरात तक सुनाई पड़ी थी. कारण- बिहार के पुल को बनाने वाली कंपनी, एसपी सिंगला कंस्ट्रक्शन के पास गुजरात में भी दो प्रमुख पुल परियोजनाओं की जिम्मेदारी है, जो अब पूरी होने वाली हैं. इसके अलावा, गुजरात मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने सूरत में वाया डक्ट्स और स्टेशनों के निर्माण का कार्य भी उसी फर्म को दिया है. अब, बड़ा सवाल यह है कि आखिर कितनी जानें गंवाने के बाद इस संकट से निबटने का सही रास्ता खोजा जाएगा?