सूरत का हीरा उद्योग अब खस्ताहाल क्यों हो रहा है?

वैश्विक आर्थिक सुस्ती के बीच बदलती बाजार की दशा-दिशा ने सूरत की समृद्धि के प्रतीक हीरा उद्योग को मानो ग्रहण ही लगा दिया है

सूरत में काम में जुटे छोटे हीरा कारोबारी
सूरत में काम में जुटे छोटे हीरा कारोबारी

दूसरों के जीवन में चमक बिखेरने वाले कुछ लोगों का जीवन कई बार गहरे अंधकार में घिरा होता है. कुछ ऐसा ही हाल गुजरात के उन कारीगरों का भी है जो हीरे की चमक को निखारने के लिए उसकी पॉलिश करने के पेशे से जुड़े हैं.

राज्य में इनकी अनुमानित संख्या 8,00,000 के करीब है, वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही काम करते आ रहे हैं. पर अब उनके लिए आजीविका चलाना मुश्किल होता जा रहा है. उद्योग के आंतरिक सूत्रों की मानें तो पिछले कुछ महीनों में करीब 15,000 लोगों ने अपनी नौकरी गंवाई है.

यही नहीं, अनिश्चित भविष्य से हताश होकर उनमें से कई अपनी जान तक दे चुके हैं. इन्हीं में सूरत के 55 वर्षीय वीनू मोराडिया भी शामिल थे. इसी साल अपनी नौकरी खो देने के बाद वीनू के लिए छह लोगों के परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो गया था. हताश होकर उन्होंने एक घातक कदम उठाया और जून के शुरू में अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों के साथ आत्महत्या कर ली. परिवार में रह गई 25 वर्षीय रुशिता और उसका 22 वर्षीय भाई पार्थ. घटना से आहत रुशिता ने भी तीन दिन बाद जान देने की कोशिश की, लेकिन किसी तरह उसे बचा लिया गया.

भारत में हीरे की खदानें भले ही बहुत पहले खत्म हो चुकी हों लेकिन तराशे और पॉलिश किए गए हीरों की आपूर्ति के मामले में यह दुनिया में अग्रणी देश बनकर उभरा और इसका श्रेय मुख्यत: गुजरात के हीरा कारोबारियों की व्यावसायिक क्षमता को जाता है. वित्त वर्ष 2023 में 1.4 लाख करोड़ रुपए से अधिक मूल्य के कच्चे हीरे आयात किए गए. तराशने और चमकाने के बाद देश का तैयार हीरों का निर्यात वित्त वर्ष के दौरान करीब 2 लाख करोड़ रु. पर पहुंच गया, जो दुनिया में कुल हीरा निर्यात का करीब 20 फीसद रहा. हालांकि, पहले कोविड-19 और फिर यूक्रेन-रूस जंग की वजह से भारत में कच्चे हीरों की आपर्ति घटी है. बदली स्थितियों ने कारोबार के सबसे निचले तबके पर सबसे ज्यादा असर डाला है, जिसमें हीरे पॉलिश करने वाले कारीगर और अन्य छोटे व्यापारी शामिल हैं.

राज्य में हीरा तराशने और पॉलिश करने वाले 90 फीसद कारीगरों को अकेले सूरत ही रोजगार देता है, जो यहां की 4,000 कंपनियों (के साथ ही अहमदाबाद, बोरसद और सौराष्ट्र के भावनगर और अमरेली जिलों के छोटे शहरों और गांवों में स्थित 4,000 अन्य कंपनियों) के लिए काम करते हैं. इस साल मई से अब तक यहां आत्महत्या की कम से कम 22 घटनाएं सामने आई हैं. उद्योग में अनिश्चितता से उपजे वित्तीय संकट और नौकरियां जाने को इसकी मुख्य वजह बताया जा रहा है. 

वहीं, 40 वर्षीय भरत कमानिया जैसे लोग भी हैं जो हालात से उबरने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं. मूलत: भावनगर के महुवा के रहने वाले कमानिया को सौराष्ट्र में सिंचाई के पानी के अभाव की वजह से 1994 में अपने खेतिहर मजदूर माता-पिता के साथ सूरत आने को बाध्य होना पड़ा. उन्होंने 15 साल की छोटी उम्र में हीरों को पॉलिश करने का काम शुरू किया और मध्यम दर्जे की कई कंपनियों के साथ काम किया. लेकिन मई में उन्हें उस फर्म ने नौकरी से निकाल दिया जहां वे पिछले दो साल से काम कर रहे थे.

अब, वे इधर-उधर छोटे-मोटे काम करके किसी तरह प्रति दिन 300-400 रुपए कमा पाते हैं. यह उनके प्रति माह 25,000 रुपए मासिक वेतन के आधे से भी कम है. हालांकि, अपने परिचितों के उलट कमानिया महुवा वापस नहीं लौटना चाहते. कमानिया का कहना है, ''वहां जाकर भी मुझे एक खेतिहर मजदूर के तौर पर काम करना पड़ेगा या फिर मजबूरी में किसी छोटी-मोटी हीरा पॉलिशिंग फर्म में कम वेतन वाली नौकरी करनी पड़ेगी. यहां तो शिक्षा के अधिकार कोटे की बदौलत मेरे दोनों बच्चों को अच्छे स्कूलों में शिक्षा मिल रही है.'' उनके चेहरे पर चिंता की स्पष्ट लकीरों के बीच उम्मीद का सहारा भी साफ नजर आता है.

सूरत के वराछा रोड इलाके में एक छोटे से एसी दफ्तर में बैठे 30,000 सदस्यीय गुजरात डायमंड वर्कर्स यूनियन के उपाध्यक्ष भावेश टांक का दावा है कि उनके पास हर दिन कम से कम 10 बेरोजगार हीरा-पॉलिश कारीगर आते हैं जो नई नौकरी दिलाने या पूर्व नियोक्ताओं के साथ वेतन और ग्रेच्युटी भुगतान के मुद्दे को निबटाने में मदद चाहते हैं. वे बताते हैं, ''वैसे तो कोविड लॉकडाउन के समय से ही धीरे-धीरे कम दिन काम कराने, कम काम पर कम वेतन देने या त्योहारों के आसपास अवकाश के पैसे न देने जैसी चीजें शुरू हो गई थीं. लेकिन, इस साल की शुरुआत में लोगों को सीधे तौर पर काम से निकाला जाने लगा. 2008 की वैश्विक मंदी के बाद यह पहली बार है कि जब पॉलिश करने वालों कारीगरों को इतनी बड़ी संख्या में नौकरी से निकाला गया है.''

आखिर, भारतीय हीरा उद्योग पर छाए संकट की असली वजह क्या है? वैसे संकट के संकेत सबसे पहले तब उभरे जब महामारी के बाद वैश्विक बाजारों में हीरे जैसे लग्जरी उत्पादों की चमक नहीं लौटी. तीन साल बाद अब अमेरिकी और यूरोपीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही हैं, वहीं चीन में लॉकडाउन बढ़ने की वजह भारतीय निर्यात बाजार और सिमट गया है. दरअसल, भारत में तराशे और पॉलिश किए गए 35 फीसद हीरे तो चीन जाते हैं और इसमें हांगकांग की भी बड़ी हिस्सेदारी रहती है.

इसके अलावा, कई वजहों से आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है. रूस के बाद हीरों का सबसे बड़ा भंडार बोत्सवाना में है. इस सदी से पहले तक ब्रिटिश कंपनी डी बीयर्स—जो दुनिया की सबसे बड़ी खनन कंपनी है और जिसका बोत्सवाना के साथ करार है—ने करीब 80 फीसद हिस्सेदारी के साथ कच्चे हीरों की वैश्विक आपूर्ति पर एकाधिकार कायम कर रखा था. लेकिन, हालिया दशकों में रूसी कंपनी अलरोसा मार्केट लीडर के तौर पर उभरी है, जिसकी हिस्सेदारी 2021 में डी बीयर्स के 27.5 फीसद की तुलना में 27.8 फीसद रही. भारत-रूस की नजदीकियों को देखते हुए सूरत के हीरा कारोबारी भी डी बीयर्स की जगह अलरोसा पर निर्भरता बढ़ाकर काफी खुश थे.

फिर, फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद हालात बदलने लगे. पश्चिमी देशों ने अलरोसा से बड़े हीरों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया तो सूरत ने कम कीमत वाले छोटे हीरों को मंगाना जारी रखा. लेकिन इस साल सितंबर में भ्रष्टाचार निवारण संबंधी यूक्रेन की राष्ट्रीय एजेंसी ने अपनी एक रिपोर्ट में अलरोसा के साथ व्यापार जारी रखने की वजह से सूरत के हीरा कारोबारियों को 'अंतरराष्ट्रीय युद्ध प्रायोजक' करार दे डाला. फिर जी-7 देशों ने इस पर कड़ी नजर रखना शुरू कर दिया कि वहां से आयातित प्रत्येक हीरे का स्रोत क्या है और उसे कहां से कहां भेजा गया. इसने भारतीय रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) को यह बयान जारी करने पर बाध्य किया कि अलरोसा के साथ हर तरह का व्यवसाय निलंबित कर दिया गया है.

अलरोसा के परिदृश्य से बाहर होने पर डी बीयर्स पर सूरत की निर्भरता बढ़ गई है. और सारा पेच यहीं आकर फंस गया है. जुलाई 2023 में डी बीयर्स ने बोत्सवाना के साथ अपना पांच दशक पुराना करार आगे बढ़ाया, जिसने करीब 15 साल पहले ही यह अनिवार्य कर दिया था कि स्थानीय स्तर पर खनन वाले कच्चे हीरे उन्हीं हीरा कंपनियों को मिल सकेंगे जो देश के भीतर ही अपनी प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करेंगी. इस शर्त को हाल में सख्ती से लागू किया गया है, और भारत में सबसे बड़ी हीरा क्राफ्टिंग कंपनियों में से एक श्री रामकृष्ण एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड उन कंपनियों में शामिल हैं, जो इसका अनुपालन कर रही हैं. इसके संस्थापक और अध्यक्ष गोविंद ढोलकिया बताते हैं, ''हमने 20 पॉलिश कारीगरों को सूरत से बोत्सवाना भेजा है और 20 स्थानीय लोगों को काम पर रखा है.''

टांक बेहद अफसोस के साथ कहते हैं, "बड़ी कंपनियां पूरे उद्योग को अफ्रीका पहुंचा रही हैं. हमारे पॉलिश कारीगरों को लालच देकर अफ्रीकियों को प्रशिक्षण देने के लिए ले जाया जाता है और फिर उनका शोषण होता है." सूरत की करीब 25 फर्मों ने वहां इकाइयां स्थापित की हैं. डी बीयर्स के कार्यकारी उपाध्यक्ष पॉल रोवले ने यह कहकर इस आंकड़े की पुष्टि की है कि कॉर्पोरेशन ''बोत्सवाना में 29 कारखानों को सहयोग दे रहा है और उनमें अधिकांश भारत के हैं.'' वे आगे कहते हैं, ''आने वाले सालों में हीरा उपभोक्ता बाजार बढ़ने ही वाला है; इसलिए हमारी राय में यह कोई समस्या नहीं है. हमारा 70 फीसद कच्चा हीरा भारत आता है और 90 फीसद पॉलिश हीरे भारत के रास्ते से ही होकर जाते हैं. यह सूरत बदलने वाली नहीं है.''

हालांकि, जमीनी तस्वीर एकदम अलग नजर आती है. एक तरफ तो सूरत के हीरा व्यापारियों के लिए कच्चे हीरे महंगे हो गए हैं, दूसरी तरफ खरीदार घटने से बाजार में पॉलिश्ड हीरों की भरमार है. नतीजतन, खनन के बाद तैयार किए गए हीरों की कीमत में गिरावट आई है. ऐसी स्थिति में पूरी व्यवस्था को 'विनियमित' करने की जरूरत है और उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि ऐसे में छंटनी या काम के घंटों में कमी स्वाभाविक है. जीजेईपीसी चेयरमैन विपुल शाह कहते हैं, "किसी को नौकरी से नहीं निकाला गया है. बाजार में असली (खान से निकले) हीरों की आपूर्ति को पटरी पर बनाए रखने के लिए केवल काम के घंटे कम किए गए हैं." एक अन्य पदाधिकारी मानते हैं कि अगर उन्होंने गिरती कीमतों को रोकने के लिए ऐसे उपाय न किए होते तो उद्योग में "15,000 के बजाए 50,000 नौकरियां जाती."

वहीं, ढोलकिया हालिया आत्महत्या और आर्थिक संकट के बीच कोई संबंध होने से इनकार करते हैं. उनके मुताबिक, ''असली हीरों के कारोबार में नुक्सान की भरपाई लैब में तैयार हीरों (एलजीडी) से की जा रही है. बड़े पैमाने पर कोई छंटनी नहीं हुई है.'' वैश्विक हीरा कारोबार विश्लेषक पॉल जिम्निस्की की जनवरी 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी कीमतों में करीब 75 फीसद की गिरावट आई है, उदाहरण के तौर पर जिस एक कैरेट जेनेरिक पॉलिश्ड एलजीडी की कीमत 2016 में करीब 5,500 डॉलर (4.5 लाख रु.) थी, वह इस साल के शुरू में करीब 1,500 डॉलर (1.2 लाख रु.) में उपलब्ध था. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इसी अवधि में इतने ही कैरेट वाले प्राकृतिक हीरे की कीमत करीब 20 फीसद घटकर 6,500 डॉलर (5.4 लाख रु.) की तुलना में 5,200 डॉलर (4.3 लाख रु.) हो गई है. उसके बाद भी इन कीमतों में और गिरावट ही आई है.

हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि असली हीरों के कारोबार की चमक को बरकरार रखने के लिए एलजीडी उद्योग को विनियमित किया जाना आवश्यक है, लेकिन प्रमुख हीरा निर्यातकों और पॉलिशिंग से जुड़े कारोबारियों का मानना है कि एलजीडी से असली हीरों के कारोबार पर कोई असर नहीं पड़ेगा. इसमें कोई दो राय नहीं कि सूरत के हीरा कारोबारी पहले भी न जाने कितनी बार ऐसे संकटों का सामना कर चुके हैं. लेकिन मौजूदा संकट समय-समय पर आने वाले ऐसे संकटों की तुलना में ज्यादा गंभीर लगता है.

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