समाजवादी पार्टी में अखिलेश के 'कमांडर’
घोसी विधानसभा उपचुनाव में सपा के चुनावी अभियान को सफलतापूर्वक अंजाम देकर शिवपाल सिंह यादव पार्टी के भीतर मुख्य रणनीतिकार के रूप में उभरे. सपा के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में कार्यकर्ता प्रशिक्षण की जिम्मेदारी देकर सपा सुप्रीमो ने जताया भरोसा

घोसी विधानसभा उपचुनाव में जैसे ही समाजवादी पार्टी (सपा) के उम्मीदवार सुधाकर सिंह ने भाजपा से निर्णायक बढ़त बनाई, लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग पर पार्टी कार्यालय के बाहर का नजारा ही बदल गया. देखते ही देखते पार्टी कार्यालय के मुख्य गेट और विक्रमादित्य मार्ग पर सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव की तस्वीरों वाली बड़ी-बड़ी होर्डिंग लगा दी गईं.
बड़े अक्षरों में ''टाइगर अभी जिंदा है’’, ''भतीजे को हराने से पहले चाचा को हराना होगा’’ और ''यह मुमकिन नहीं, नामुमकिन है’’, ''चाचा-भतीजे की यारी, भाजपा पर पड़ गई भारी’’ जैसे नारों से सजी होर्डिंग संकेत कर रही थीं कि सपा कार्यकर्ता शिवपाल सिंह यादव की भूमिका को लेकर कितना उत्साहित हैं.
घोसी विधानसभा उपचुनाव शिवपाल की संगठनात्मक क्षमता का इम्तिहान था. वैसे घोसी से नवनिर्वाचित विधायक सुधाकर सिंह और शिवपाल यादव दोनों 1996 के विधानसभा चुनाव में पहली बार जीतकर विधायक बने थे. इसके बाद दोनों का आपसी संपर्क बना. अगस्त में घोसी उपचुनाव की जब घोषणा हुई उस वक्त शिवपाल जौनपुर, आजमगढ़, मऊ और बलिया के दौरे पर थे.
कार्यकर्ताओं से वे घोसी में संभावित उम्मीदवार के बारे में फीडबैक ले रहे थे. ज्यादातर ने मऊ के वरिष्ठ सपा नेता सुधाकर सिंह के पक्ष में अपनी राय दी. इसी दौरान बलिया के एक 'कॉर्पोरेटर’ चंद्रशेखर के साथ सुधाकर सिंह ने शिवपाल से मुलाकात की. शिवपाल की सलाह पर अखिलेश ने सुधाकर सिंह को घोसी सपा का उम्मीदवार बना दिया.
इसके बाद 20 अगस्त से शिवपाल ने घोसी में डेरा डाल दिया. रोज कम से कम दस बैठकें की. बीच में रक्षाबंधन के मौके पर 30 और 31 अगस्त को ही इटावा और लखनऊ आए और फिर मतदान तक घोसी-मऊ में ही रहे. इस दौरान जब मऊ प्रशासन ने घोसी के लोगों को रेड और यलो कार्ड (एक तरह का नोटिस) बांटना शुरू किया तो शिवपाल ने डीएम और पुलिस अधीक्षक के सामने इसका पुरजोर विरोध किया. घोसी विधानसभा क्षेत्र में सत्तारूढ़ भाजपा के दो दर्जन से अधिक मंत्री डेरा जमाए हुए थे.
शिवपाल भी कार्यकर्ताओं से संवाद बनाकर सबका मनोबल बढ़ा रहे थे. चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद जब मऊ जिले में मौजूद सभी बाहरी लोगों को बाहर जाने का आदेश दिया गया तो शिवपाल कार्यकर्ताओं के साथ जिले की सीमा पर डट गए. उन्होंने मऊ से लगे जिलों आजमगढ़, गाजीपुर, गोरखपुर, बलिया के सपा नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी चुनाव आचार संहिता के हटने तक सीमा पर मौजूद रहने को कहा ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी होने पर तुरंत जरूरी कदम उठाया जा सके. शिवपाल की यह रणनीति सफल रही और सपा अपनी सीट बचाने में कामयाब रही.
बीते एक वर्ष के दौरान यह दूसरा मौका था जब शिवपाल ने अपनी संगठनात्मक क्षमता से सपा को भारी जीत दिलाई. सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के पिछले वर्ष 10 अक्तूबर को निधन के बाद खाली हुई मैनपुरी लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव पर सबकी नजरें गड़ी हुई थीं. सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और शिवपाल के संबंधों को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं.
इन सबको धता बताते हुए अखिलेश पिछले वर्ष 17 नवंबर को अचानक पत्नी डिंपल यादव के साथ सैफई में शिवपाल से मिलने उनके आवास पर पहुंचे. मुलाकात के बाद डिंपल एवं अखिलेश यादव ने फोटो ट्वीट करते हुए लिखा ''नेता जी (मुलायम सिंह यादव) और घर के बड़ों के साथ-साथ मैनपुरी की जनता का भी आशीर्वाद साथ है.’’ कुछ देर बाद शिवपाल ने भी मुलाकात की फोटो के साथ ट्वीट किया. इसमें लिखा ''जिस बाग को सींचा हो खुद नेता जी ने, उस बाग को अब हम सीचेंगे अपने खून, पसीने से.’’
सभी आशंकाओं को पूर्णविराम लगाते हुए शिवपाल-अखिलेश की जोड़ी मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव के प्रचार के दौरान सपा के मंच की ताकत बनकर उभरी. अखिलेश यादव के सपा की सदारत हासिल करने के बाद यह पहला मौका था जब पूरा मुलायम कुनबा एक साथ था. इस एकता पर मुहर 8 दिसंबर को मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव के नतीजों ने लगाई जब डिंपल यादव ने भाजपा उम्मीदवार को रिकॉर्ड 2.88 लाख वोटों से हराया.
शिवपाल यादव ने भी मैनपुरी लोकसभा सीट के तहत आने वाली अपनी जसवंतनगर विधानसभा सीट सपा को एक लाख से अधिक मतों से बढ़त दिलाकर मुलायम की विरासत बहू डिंपल को सौंपने में बड़ी भूमिका निभाई. मतगणना के दिन जैसे ही डिंपल ने निर्णायक बढ़त ली, शिवपाल ने जरा भी देर किए बगैर अपनी चार साल पुरानी पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) का अखिलेश की मौजूदगी में सपा में विलय कर दिया. इस प्रकार मुलायम परिवार के भीतर एकता के एक नए दौर का सूत्रपात हुआ.
मैनपुरी में राजकीय इंटरमीडियट कॉलेज में प्रवक्ता विजय प्रकाश कहते हैं, ''तकरीबन छह साल बाद अब शिवपाल यादव अखिलेश यादव के मिशन में पूरी तन्मयता और समन्वय के साथ जुट गए हैं. अखिलेश ने भी उन्हें राष्ट्रीय महासचिव का महत्वपूर्ण पद देने के बाद पार्टी के कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविरों के लिए विशेष जिम्मेदारी दी है. इससे स्पष्ट है कि अखिलेश और शिवपाल के बीच के रिश्ते नए दौर में पहुंच चुके हैं.’’
मुलायम परिवार को एक रखने की शिवपाल की मंशा उस वक्त भी जाहिर हुई जब 20 अगस्त को उन्होंने सोशल मीडिया पर ऐलान किया कि अगले लोकसभा चुनाव में वे फिरोजाबाद संसदीय क्षेत्र में भतीजे अक्षय यादव (शिवपाल के चचेरे भाई रामगोपाल यादव के पुत्र) की जीत का निमित्त बनेंगे. इस तरह शिवपाल यादव ने रामगोपाल के साथ रिश्तों पर जमी धूल झाड़ने की भरसक कोशिश की.
सपा सुप्रीमो अपने चाचा शिवपाल यादव के संगठनात्मक अनुभव का पूरा लाभ लेने की कोशिश में हैं. अखिलेश ने 13 अगस्त को पार्टी के प्रदेश संगठन की जिस 182 सदस्यीय कमेटी का गठन किया उसमें चाचा के करीबी नेताओं को भी जगह दी. आशीष चौबे, लल्लन राय, प्रेमप्रकाश वर्मा, विष्णुगोपाल आदि शिवपाल के करीबी माने जाते हैं, इन्हें संगठन में जगह देकर अखिलेश ने शिवपाल पर ही भरोसा जताया है.
बीते छह वर्षों के दौरान पहली बार 19 फरवरी को शिवपाल विक्रमादित्य मार्ग स्थित पार्टी कार्यालय पहुंचे थे. यहां शिवपाल ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की गैरमौजूदगी में पार्टी के विधायक दल की बैठक की अध्यक्षता की थी. इसके बाद अखिलेश की पार्टी संगठन की बैठकों में शिवपाल एक मुख्य किरदार बनकर उभरे हैं.
लखनऊ में मॉल एवेन्यु पर प्रसपा के लिए आवंटित दफ्तर अब शिवपाल के कैंप कार्यालय के रूप में तब्दील हो गया है. लखनऊ में रहने के दौरान शिवपाल रोज करीब 10 बजे अपने इस कार्यालय में जनता दर्शन करके लोगों और पार्टी कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनकर अपने स्तर पर उनके निराकरण का प्रयास करते हैं. फिलहाल चाचा-भतीजे की जोड़ी के सामने 2024 के लोकसभा चुनाव की कठिन चुनौती है.
बातचीत :
''मेरा एकमात्र लक्ष्य है कि अखिलेश के नेतृत्व में सपा जीते’’ - शिवपाल सिंह यादव
समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव अब पार्टी में अपनी उसी पुरानी रंगत में लौट चुके हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं. वरिष्ठ सपा नेता ने एसोसिएट एडिटर आशीष मिश्र से बातचीत कर कई प्रकार की अटकलों से परदा उठाया.
● अखिलेश यादव और आपके बीच जो मनमुटाव था, उसे दूर करने की पहल किस तरफ से हुई?
नेता जी (मुलायम सिंह यादव) की जब तबियत खराब हुई तो अस्पताल में पूरा परिवार इकट्ठा था. नेता जी के न रहने पर भी सैफई में भी परिवार एक साथ था. सपा के सभी नेता भी चाहते थे कि हम सब एक रहें और अखिलेश के नेतृत्व में काम करें. हम सबने इसे स्वीकारा.
● मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव में समर्थन मांगने के लिए अखिलेश आपके घर गए थे?
मैनपुरी उपचुनाव में भाजपा की तरफ से प्रयास तो यही था कि हम अलग रहें. मुझे लालच देने की कोशिश भी हुई. इसी दौरान अखिलेश और डिंपल मेरे घर आए. अखिलेश ने पूछा, कौन ठीक प्रत्याशी रहेगा. मैंने कहा आप डिंपल को चुनाव लड़वाइए, मैं साथ दूंगा.
● आपके साथ बहुत नेता आपकी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) में चले गए थे. अब उनका क्या भविष्य है?
ज्यादातर नेता-कार्यकर्ता वापस सपा में आ गए हैं. बहुत लंबी सूची है इनकी, क्योंकि पीएसपी का संगठन तो प्रदेश के हर जिले में फैला था. अब सभी सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी का काम कर रहे हैं.
● मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के कामकाज की आप कैसे तुलना करेंगे?
हम तो नेता जी के साथ शुरू से संगठन में रहे. नेता जी का एकमात्र लक्ष्य नेताओं, कार्यकर्ताओं का सम्मान करते हुए सपा को विजयी बनाना होता था, यही अब अखिलेश का है.
● आपको सपा का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है. अब आप अखिलेश के 'सेनापति’ के रूप में अपनी क्या जिम्मेदारियां देखते हैं?
संगठन में बूथ कमेटियां बहुत जरूरी हैं. बूथ कमेटियों से सेक्टर, सेक्टर से ब्लॉक, ब्लॉक से विधानसभा क्षेत्रवार और विधानसभा क्षेत्रवार से जिले का संगठन बनता है जो जिला प्रभारी की देखरेख में काम करता है. महत्वपूर्ण है बूथ कमेटियां. इन कमेटियों पर प्रभारी, सह प्रभारी और कम से कम दस कार्यकर्ताओं की एक टीम तैयार की जा रही है. कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि वे विरोधी पार्टी की साजिशों का सामना कर सकें.
● सुभासपा के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर दावा कर रहे हैं कि हार मान कर आप भी भाजपा में ही आएंगे?
नेता जी के साथ मेरी जो विचारधारा थी, वह कभी नहीं बदली और न ही बदलेगी. मैंने जो अलग दल बनाया उसके नाम में भी समाजवादी था. राजभर को भाजपा ने मंत्री नहीं बनाया इसलिए वे इधर-उधर की बात कर रहे हैं.
● आप 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ेंगे?
नहीं, मैं लोकसभा चुनाव नहीं लड़ूंगा. मेरा एक लक्ष्य है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी जीते.