मुख्य वार्ताकार

2024 के आम चुनाव के लिए विपक्ष को एकजुट करने का मुश्किल काम नीतीश कुमार के हाथ में है. क्षेत्रीय पार्टियों को साथ लाने के अलावा कांग्रेस को इसके लिए राजी करना बड़ी चुनौती हो सकती है.

एक साथ (बाएं से) तेजस्वी यादव, मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और नीतीश कुमार 12 अप्रैल को नई दिल्ली में
एक साथ (बाएं से) तेजस्वी यादव, मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और नीतीश कुमार 12 अप्रैल को नई दिल्ली में

अमिताभ श्रीवास्तव

बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल (यूनाइटेड) सुप्रीमो नीतीश कुमार को गरमागरम चाय की चुस्की लेना बहुत पसंद है. वे चाय में एक निश्चित मात्रा में शक्कर पसंद करते हैं—सिर्फ एक चौथाई चम्मच. इससे ''एक चुटकी भी अधिक नहीं’’ क्योंकि, उनका मानना है कि इससे ज्यादा शक्कर से चायका मजा खराब हो जाता है. उम्मीद की जा सकती है कि वह कुशलता जो चाय के सभी अवयवों के बीच परफेक्ट समिश्रण बना के सही जायका सुनिश्चित करती है, वही कौशल उन्हें 2024 के लोकसभा चुनावों से एक साल पहले उस खौलते हुए कड़ाहे में जिसमें विपक्ष के सभी दल निहित हैं, भी सही मिश्रण बनाने में मदद करेगी.

12 अप्रैल को, नीतीश अपने डिप्टी सीएम और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के साथ बंद कमरे में बैठक के लिए नई दिल्ली में थे. जैसा कि उन्होंने बताया कि इस मुलाकात का लक्ष्य 2024 के चुनाव से पहले ''विपक्षी दलों का यथासंभव विशाल गठबंधन’’ खड़ा करना है ताकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता से बेदखल किया जा सके.

सारी पार्टियों के बीच वैचारिक स्तर पर जितनी भिन्नता है, उसे देखते हुए यह एक बहुत बड़ा और चुनौतीपूर्ण काम होने वाला है. इसलिए काम का बंटवारा कर दिया गया है. खडग़े शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के उद्धव ठाकरे और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री डीएमके के एम.के. स्टालिन और समान विचारधारा वाले दलों को एक साथ लाने की कोशिश करेंगे तो नीतीश को कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण काम सौंपा गया है—उन पार्टियों को साथ लाना जो कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने में सहज नहीं हैं.

नीतीश का मुख्य लक्ष्य बड़े विपक्षी खेमे में चार प्रमुख खिलाड़ियों को शामिल करना है. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) और के. चंद्रशेखर राव की भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) क्रमश: पश्चिम बंगाल, दिल्ली और पंजाब और तेलंगाना में सत्ता में हैं, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में एक मजबूत विपक्षी ताकत हैं. इन पांच राज्यों में लोकसभा की कुल 159 सीटें हैं. यानी निचले सदन की कुल सीटों का लगभग 30 प्रतिशत. फिलहाल, उनमें से 94 यानी लगभग 60 प्रतिशत पर भाजपा का कब्जा है.

नीतीश और कई अन्य विपक्षी नेता समझते हैं कि इन राज्यों में भाजपा इसलिए इतनी सफल रही क्योंकि भाजपा विरोधी वोटों में विभाजन हो गया. इस प्रकार, विचार यह है कि कांग्रेस इन पांच राज्यों में क्षेत्रीय नेताओं की संयुक्त ताकत को पहचाने. ऐसा करने में, नीतीश के सामने एक और लक्ष्य यह होगा कि वे कांग्रेस को 'अब तक जितनी उदार’ रही है उससे कहीं अधिक उदार होने के लिए तैयार करें और यह कोई कम मुश्किल काम नहीं है. साथ ही उन्हें उन नेताओं को भी मनाना है जो अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते हैं-जैसे कि यादव और ममता, जिन्होंने पहले ही संकेत दे दिया है कि वे आगामी चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेंगे.

हालांकि, इन अड़चनों के बावजूद, अन्य दलों से बातचीत के लिए नीतीश ने जो समय चुना है वह बिल्कुल सही लगता है. पिछले महीने लोकसभा से राहुल गांधी को अयोग्य ठहराए जाने के बाद, कांग्रेस के साथ अन्य विपक्षी नेता भी अपनी 'अहंकार की कोठरी’ से बाहर आए हैं. जद (यू) के एक सूत्र का कहना है, ''कांग्रेस अब यह बात ठीक से समझ चुकी है कि विपक्षी एकता के मुद्दे पर किसी भी तरह की टाल-मटोल से उसकी अपनी जड़ें और कमजोर होती जाएंगी. विपक्षी नेताओं को भी ऐसा ही खतरा नजर आने लगा है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि विपक्ष के हर प्रमुख नेता ने राहुल की संसद से अयोग्यता की निंदा की.’’

केजरीवाल, जिनसे नीतीश राहुल और खड़गे से मुलाकात के एक दिन बाद मिले थे, के सुर भी बदले नजर आ रहे हैं. बैठक के बाद, दिल्ली के सीएम, जिनके कांग्रेस से अच्छे संबंध नहीं रहे हैं, ने मीडिया को बताया कि वे 'पूरी तरह से नीतीश के साथ’ हैं और विपक्ष के लिए ''एकजुट होना और केंद्र की सरकार को बदलना बेहद आवश्यक’’ है. कांग्रेस ने भी केजरीवाल के प्रति गर्मजोशी दिखानी शुरू कर दी है. शराब नीति घोटाले में सीबीआई के समन के बाद खड़गे ने केजरीवाल को फोन किया और इस मामले पर उनके साथ एकजुटता दर्शाई. 

गणित क्या कहता है

नीतीश और उनके दोस्तों को लगता है कि भाजपा में बेशक जबरदस्त उछाल हुआ है, फिर भी उसे मजबूती से घेरा जा सकता है क्योंकि अभी उसकी जड़ें पूरे भारत में नहीं पहुंच पाई हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा अपनी लोकप्रियता के चरम पर थी, तब उसने जो 303 सीटें जीतीं, उनमें से 87 प्रतिशत सिर्फ 12 राज्यों—उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और हरियाणा—से आईं. इन राज्यों में से प्रत्येक में भाजपा की लोकसभा में कम से कम 10 सीटें थीं, फिर भी इनमें से पांच राज्यों में विपक्षी दलों ने सरकारें बनाईं.

राज्य के चुनावों में, महाराष्ट्र और कर्नाटक ने दिखाया कि अगर मिलकर प्रयास किए जाएं तो सफलता मिल सकती है. जबकि महाराष्ट्र में, कांग्रेस ने 2019 में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) गठबंधन के तहत शासन करने के लिए अपनी पूर्व प्रतिद्वंद्वी, तत्कालीन शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) से हाथ मिलाया, कर्नाटक में इसने एच.डी. कुमारस्वामी के जनता दल (सेक्युलर) के साथ 2018 में गठबंधन किया. यह सच है दोनों राज्यों में विपक्षी गठबंधन की सरकारें गिर गईं क्योंकि उनके विधायकों ने दलबदल कर लिया (कथित तौर पर भाजपा के उकसाने के कारण), लेकिन वे शुरुआती सफलता हासिल करने में कामयाब रहे. माना जाता है कि नीतीश ने कांग्रेस से कहा कि वह इस प्रयोग को आम चुनाव में दोहराने का जज्बा दिखाए.

गौरतलब है कि तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना, जहां भाजपा को एक कमजोर खिलाड़ी माना जाता है, में कुल मिलाकर 101 लोकसभा सीटें हैं. इनमें से भाजपा 2019 के चुनाव में सिर्फ चार सीटें जीत सकी और वे चारों सीटें तेलंगाना से थीं. इस प्रकार नीतीश की रणनीति में विविधता है लेकिन वह राज्य-विशिष्ट भी है. वे चाहते हैं कि उन राज्यों में पार्टियां एकजुट हों जहां भाजपा मजबूत खिलाड़ी है, और साथ ही उन राज्यों में, जहां यह पहले से ही कमजोर है, वे चाहते हैं कि पार्टियां अपने आधार को मजबूती से संभालें ताकि भगवा पार्टी उसमें सेंध न लगा सके. 

जद (यू) के एक नेता कहते हैं, ''यह सुनने में चुनावी आंकड़ों का एक अति सरलीकरण जैसा लग सकता है, लेकिन तथ्य यह है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में जब भाजपा लोकप्रियता के चरम पर थी, उसे लगभग 38 प्रतिशत वोट मिले यानी 62 फीसदी वोटरों ने उसके खिलाफ मतदान किया. हमारी रणनीति है कि भाजपा के खिलाफ जाने वाले इन मतदाताओं को जितना संभव हो उतना एकजुट किया जाए’’ 

माना जाता है कि नीतीश ने वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के प्रमुख और आंध्र प्रदेश के सीएम वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी केसाथ ही बीजू जनता दल प्रमुख और ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक को भी साधने का जिम्मा लिया है. अब तक, दोनों नेताओं ने विपक्षी गठबंधन में शामिल होने की उत्सुकता नहीं दिखाई है, उन तक पहुंचने का समेकित प्रयास विपक्ष के लिए चुनाव से पहले और चुनाव के बाद, दोनों ही परिदृश्यों में मददगार हो सकता है.

कांग्रेस धुरी बनेगी?

बिहार के मुख्यमंत्री लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि कांग्रेस के बिना संयुक्त विपक्षी मोर्चा नहीं हो सकता. पिछले साल अगस्त से जब उन्होंने बिहार में भाजपा को छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस और चार अन्य दलों से हाथ मिलाकर नई सरकार बनाई, तब से वे एक व्यापक आधार वाला विपक्षी गठबंधन बनाने के लिए काम कर रहे हैं जिसकी धुरी कांग्रेस हो सकती है. सरकार के लिए नए गठबंधन के एक महीने बाद नीतीश ने राहुल और सोनिया गांधी से भी मुलाकात की थी और उनसे इस दिशा में काम करने को कहा था. सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस ने शुरू में उनके प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दिया और वे इसके लिए कांग्रेस से नाखुश भी थे, लेकिन अंतत: अब बात आगे बढ़ रही है.

उनके तर्क के साथ सहमति बनती दिख रही है. 10 से अधिक राज्यों में जहां भाजपा की मजबूत उपस्थिति है, वहां कांग्रेस अपने सहयोगी के साथ या अकेले भी, प्रमुख खिलाड़ियों में से एक है. गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में उसका सीधा मुकाबला भाजपा से है. कर्नाटक, असम और हरियाणा में, यह प्रमुख विपक्षी दल है, जबकि पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र और झारखंड में, इसकी महत्वपूर्ण उपस्थिति है. इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि कांग्रेस अन्य मजबूत विपक्षी खिलाड़ियों की संभावनाओं को नुक्सान पहुंचाते हुए, भाजपा विरोधी वोटों का हिस्सा हड़प सकती है.

और उसे ऐसा करने से बचना चाहिए. बताया जाता है कि नीतीश ने कांग्रेस नेतृत्व से कहा है कि पार्टी को उन राज्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहां वह मजबूत है और जहां दूसरों के पास भाजपा के खिलाफ बेहतर मौके हैं, वहां उसे सहायक की भूमिका निभानी चाहिए- जैसे, बिहार में उसे जद (यू) और राजद को सीटों के बंटवारे पर फैसला करने देना चाहिए जबकि उत्तर प्रदेश में उसे अखिलेश यादव के साथ सहयोग करना चाहिए. इसी तरह, पश्चिम बंगाल में, कांग्रेस को टीएमसी की छोटी सहयोगी की भूमिका निभाने से नहीं झिझकना चाहिए.

विपक्ष यह मानता है कि कांग्रेस जितनी सीटों पर चुनाव लड़ती है, उसे कुछ सीटें अन्य दलों के लिए छोडऩे की जरूरत है. इसका वोटर आधार कुछ राज्यों में क्षेत्रीय खिलाड़ियों के साथ टकरा सकता है, लेकिन सीटों का बंटवारा इस तरह होना चाहिए जिससे भाजपा विरोधी वोट किसी हाल में न बिखरे. जद (यू) के एक सूत्र का कहना है, ''कांग्रेस अब भंग हो चुके संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को पुनर्जीवित करने पर विचार कर सकती है. नीतीश को उसका संयोजक बनाकर अन्य क्षेत्रीय प्रमुखों तक पहुंचने की जिम्मेदारी दी जा सकती है. ऐसी भूमिका जॉर्ज फर्नांडीस ने पहले एनडीए के लिए निभाई थी.’’

हालांकि, इस चुनावी ताने-बाने को धरातल पर उतारने में कांग्रेस नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती आ सकती है. पार्टी का एक वर्ग मानता है कि क्षेत्रीय पार्टियों को जगह देने और कम सीटों पर चुनाव लड़ने से पहले से ही मुरझा रहा संगठन और कमजोर हो जाएगा. यह कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित करता है, अक्सर, ''अप्राकृतिक गठबंधन’’ पार्टी के लिए उलटे पड़ते हैं जैसा कि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में वाम दलों के साथ हुआ था.

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य के नेता आम तौर पर अन्य दलों के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन के खिलाफ होते हैं क्योंकि उन्हें अपनी प्रासंगिकता खोने का डर होता है. कांग्रेस के एक वरिष्ठ सांसद कहते हैं, ''शीर्ष नेताओं के लिए फोटो सेशन की खातिर विपक्षी नेताओं से हाथ मिलाना आसान है, लेकिन इसे जमीन पर उतारने के लिए राज्य इकाइयों के समर्थन की जरूरत है. यह लगभग असंभव है क्योंकि राज्य के नेता जानते हैं कि एक बार खोई जमीन फिर से हासिल नहीं की जा सकती.’’

स्वाभाविक रूप से, उस भाजपा के खिलाफ जो उम्दा प्रदर्शन करने वाली चुनाव मशीन बन गई है, विपक्ष को एकजुट करने के भगीरथ कार्य- विशेष रूप से कांग्रेस को आम शर्तों को स्वीकार करने के लिए राजी करने- के लिए एक बहुत चतुर चुनावी अंकगणित और सामंजस्यपूर्ण आपसी बातचीत की रूत है. और नीतीश जिन्हें मुख्यमंत्री के रूप में 17 वर्षों के साथ-साथ लोकसभा में छह कार्यकालों का अनुभव है और जिनकी कई नेताओं के साथ बड़ी घनिष्ठता है, ही विपक्ष में एका के सबसे अच्छे सूत्रधार हो सकते हैं.

जहां तक अपने व्यक्तिगत लक्ष्यों की बात है, नीतीश ने अब तक तो यही कहा है कि उनकी प्रधानमंत्री बनने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है. हालांकि यह रुख बदल भी सकता है, लेकिन अभी तक तो उनकी भूमिका विपक्ष को एक मंच पर लाने के लिए मुख्य वार्ताकार की ही है और यह प्रधानमंत्री बनने से कम टेढ़ा काम नहीं है.

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