कॉलेजियम पर बढ़ी किचकिच
एक न्यायाधीश का चयन साथी वरिष्ठ न्यायाधीशों को करना चाहिए या इस मामले में कार्यपालिका की चलनी चाहिए? शीर्ष अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार और न्यायपालिका के बीच छिड़ी तीखी लड़ाई

उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने 7 दिसंबर को सदन को अपने पहले ही संबोधन में सुप्रीम कोर्ट पर तीखा हमला बोल दिया. वे दरअसल शीर्ष अदालत के उस फैसले की आलोचना कर रहे थे जिसमें उसने 2014 के राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून को रद्द कर दिया था. संसद के दोनों सदनों से सर्वसम्मति से पारित एनजेएसी कानून में न्यायिक नियुक्तियों की कॉलेजियम व्यवस्था को उलटने की कोशिश की गई थी. इसे 'संसदीय संप्रभुता के साथ गंभीर समझौते' की मिसाल बताते हुए धनखड़ ने कहा कि ''लोकतांत्रिक इतिहास में इस घटना जैसा कोई उदाहरण नहीं है जिसमें समुचित रूप से वैध संवैधानिक उपाय को न्यायिक रूप से खारिज कर दिया गया हो.''
इसी के साथ वे ऊंची अदालतों में जजों की नियुक्ति को लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच चल रही बहस में शामिल होने वाले ताजातरीन शख्स बन गए. उपराष्ट्रपति ने लगभग वही दोहराया जो केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू ने कहा था. उन्होंने कॉलेजियम व्यवस्था पर कई बार सवाल खड़े करते हुए कहा था कि ''भारत के अलावा दुनिया में कहीं भी जजों की नियुक्ति जज नहीं करते.''
बीते दो महीनों में रिजिजू ने कॉलेजियम व्यवस्था को 'अपारदर्शी' और 'गैर-जवाबदेह' करार दिया और यहां तक कहा कि न्याय देने के अपने सबसे अहम काम की अनदेखी करके ''जज अक्सर यह तय करने में व्यस्त रहते हैं कि अगला जज कौन होगा.'' उन्होंने दावा किया कि जजों की नियुक्ति करना सरकार की जिम्मेदारी है और बेहतर विकल्प दिए बिना एनजेएसी को रद्द करने के लिए उन्होंने शीर्ष अदालत की आलोचना की. जैसी कि उम्मीद थी, न्यायपालिका कॉलेजियम व्यवस्था को लेकर बचाव की मुद्रा में है. अप्रैल में भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) न्यायमूर्ति एन.वी. रमण ने कहा था, ''भारत में धारणा है कि जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं. यह गलत धारणा है...नियुक्ति सलाह-मशविरे की लंबी प्रक्रिया के जरिए और सभी पक्षों से मशविरे के बाद की जाती है. मुझे नहीं लगता कि यह प्रक्रिया इससे ज्यादा लोकतांत्रिक हो सकती है.'' सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने रुख नरम किया और कहा कि कॉलेजियम प्रणाली के बारे में चिंताओं का हल निकाला जाना चाहिए.
हालांकि उनके उत्तराधिकारी यू.यू. ललित ने दावा किया कि जजों के हाथों संचालित व्यवस्था एनजेएसी से बेहतर है. मौजूदा जजों ने और भी मजबूती से बचाव किया. न्यायमूर्तिद्वय एम.आर. शाह और सी.टी. रविकुमार की पीठ ने 3 दिसंबर को कहा कि ''किसी दखलंदाज'' के बयानों के आधार पर कॉलेजियम व्यवस्था को पटरी से नहीं उतरना चाहिए.
बल्कि शीर्ष अदालत ने जजों की नियुक्ति के लिए चुने गए नामों को मंजूरी देने में देरी के लिए सरकार को दोषी ठहराया. मसलन, बंबई हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता को सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में पदोन्नत करने के लिए कॉलेजियम का फैसला 23 सितंबर से सरकार के पास अटका है. सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर को 11 नामों का जिक्र किया जिनकी सिफारिश कॉलेजियम ने सितंबर, 2021 और जुलाई, 2022 के बीच की थी और जो सरकार के पास अटके हुए हैं. कॉलेजियम की ओर से भेजे गए और भी नाम लंबित हैं. 28 नवंबर को न्यायमूर्ति संजय कृष्ण कौल की अगुआई में दो जजों की पीठ ने जजों की नियुक्ति में देरी करके ''समूची प्रक्रिया को नाकाम करने'' के खिलाफ केंद्र सरकार को चेताया और नियुक्ति में समयबद्ध कार्यवाही करने को कहा. अगले दिन सरकार ने बंबई हाइकोर्ट में दो जजों की नियुक्ति कर दी, पर 20 पुरानी सिफारिशें लौटा दीं, जिनमें कॉलेजियम की तरफ से दोबारा भेजे गए 10 नाम भी थे. न्यायमूर्ति दत्ता के लिए की गई सिफारिश अब भी लंबित है.
रिजिजू अलबत्ता देरी की जिम्मेदारी लेने से इनकार करते हैं. 25 नवंबर को उन्होंने कहा, ''यह मत कहिए कि हम फाइलें दबाकर बैठे हैं. और अगर आप ऐसा कहना ही चाहते हैं तो अपने दम पर जजों की नियुक्ति कर लें और अपनी चलाएं.'' आंकड़े कानून मंत्री के पक्ष में हैं. मौजूदा एनडीए सरकार ने साल में औसतन 92 जजों की नियुक्तियां कीं, जो 2006 और 2014 के बीच की गई 76 नियुक्तियों के औसत से हैं. खुद रिजिजू के कार्यकाल में उच्च न्यायालयों के 189 जज नियुक्त किए गए. केंद्र ने 2014 के बाद उच्च न्यायालयों में जजों के 198 नए पद बनाए.
इन नियुक्तियों के बावजूद 25 उच्च न्यायालयों में जजों के 1,104 स्वीकृत पदों में से 331 या 30 फीसद खाली हैं, हालांकि खाली पदों का प्रतिशत 2021 के 50 फीसद से कम हुआ है. शीर्ष अदालत में जजों के कुल 34 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से सात खाली हैं. इन खाली पदों की अहमियत सबसे बेहतर सुप्रीम कोर्ट और हाइ कोर्टों में लंबित मामलों से तुलना करके समझी जा सकती है—शीर्ष अदालत में करीब 70,000 और हाइ कोर्टों में 60 लाख. दोष कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों का है. अगर केंद्र को उच्च न्यायालयों की 148 नियुक्तियों के लिए नामों को मंजूरी देनी है, तो कॉलेजियम को 183 जजों की नियुक्ति के प्रस्ताव भेजने हैं. सुप्रीम कोर्ट में सात खाली पदों के बावजूद कॉलेजियम ने सितंबर ने 11 नामों पर विचार किया और उनमें से महज एक पर सर्वानुमति बनी. यह बताता है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच और ज्यादा सहयोग की जरूरत है, जैसा कि हाल में भारत के नए प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) डी.वाइ. चंद्रचूड़ ने कहा. वे बखूबी समझते हैं कि गतिरोध का खासा असर उनके कार्यकाल पर पड़ेगा—उनकी अगुआई में नए कॉलेजियम को अगले दो साल में सुप्रीम कोर्ट के 19 खाली पदों को भरना होगा.
कॉलेजियम की शुरुआत
यह दिलचस्प है कि संविधान कॉलेजियम का कोई जिक्र नहीं करता. अनुच्छेद 124 कहता है कि सुप्रीम कोर्ट के हरेक जज की नियुक्ति राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट और हाइ कोर्ट के जजों के साथ परामर्श करके करेगा. सीजेआइ की खुद की नियुक्ति के अलावा बाकी सभी जजों की नियुक्तियों के लिए सीजेआइ से परामर्श किया जाना चाहिए. अनुच्छेद 217 कहता है कि हाइ कोर्ट के हरेक जज की नियुक्ति राष्ट्रपति सीजेआइ, राज्य के राज्यपाल, और मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को छोड़कर, हाइ कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के साथ परामर्श करके करेगा. हालांकि राष्ट्रपति न्यायपालिका के परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं. चलन यही था कि सिफारिशों की शुरुआत सीजेआइ से होती थी और कानून मंत्री को भेजी जाती थी. मंत्री सहमत हुए तो वे प्रधानमंत्री की सहमति से इसके अनुरूप राष्ट्रपति को परामर्श देते, जो नियुक्ति करते थे. यह मोटे तौर पर कार्यपालिका के हाथों संचालित नियुक्ति व्यवस्था थी.
इस व्यवस्था की कई मुद्दों पर नुक्ताचीनी हुई. 1958 में भारत के विधि आयोग ने कहा कि इससे अदालतों में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं की नियुक्ति नहीं हो पाती और कई मामलों में कुछ जजों की नियुक्ति के लिए 'ऊंचे स्तर से डाला गया कार्यपालिका का प्रभाव' जिम्मेदार था. आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्तियों में 'सांप्रदायिक और क्षेत्रीय सोच-विचार' पर जोर दिए जाने की भी आलोचना की. बाद में 1973 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की इस बात के लिए व्यापक आलोचना हुई कि उन्होंने वरिष्ठ जजों की अनदेखी करके तीन जजों से जूनियर न्यायमूर्ति ए.एन. रे को भारत का प्रधान न्यायाधीश नियुक्त कर दिया.
जज नियुक्ति की इस व्यवस्था को 1981 में एस.पी. गुप्ता बनाम केंद्र सरकार मामले में चुनौती दी गई, जिसे फर्स्ट जजेज़ केस भी कहा जाता है. याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत में कहा कि अनुच्छेद 124 और 127 में 'परामर्श' शब्द का अर्थ 'सहमति' निकाला जाना चाहिए और न्यायिक नियुक्ति के मामले में न्यायपालिका को वीटो करने का अधिकार होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की पीठ ने फैसला दिया कि 'परामर्श' को 'सहमति' नहीं माना जा सकता. अदालत ने कहा कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच असहमति की स्थिति में कार्यपालिका की राय मानी जाएगी.
मगर 1993 में सेकंड जजेज़ केस (एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम संघीय सरकार) में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की पीठ ने इस फैसले को यह कहते हुए उलट दिया कि कार्यपालिका में निहित नियुक्ति की इस 'निर्णायक शक्ति' का दुरुपयोग किया जा रहा था और मौजूदा व्यवस्था में योग्यता की अनदेखी की जा रही थी. अदालत ने फैसला दिया कि न्यायिक स्वतंत्रता असल में संविधान के असंशोधनीय आधारभूत ढांचे का अंग है, जिसकी रक्षा के लिए न्यायपालिका को नियुक्ति की प्रक्रिया पर 'प्रमुखता' हासिल होनी चाहिए. प्रधान न्यायाधीश के साथ 'परामर्श' शब्द की व्याख्या इस तरह की गई, जिसका अर्थ यह निकलता था कि जज की नियुक्ति में उसका सहमत होना आवश्यक था. प्रधान न्यायाधीश की राय उनकी व्यक्तिगत राय नहीं थी, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जजों और जहां नियुक्ति की जानी है, उस हाइकोर्ट के दो वरिष्ठतम जजों के कॉलेजियम के साथ परामर्श करते हुए प्रधान न्यायाधीश की राय थी. इस फैसले ने कॉलेजियम की अगुआई वाली नियुक्ति व्यवस्था की शुरुआत की.
1998 में थर्ड जजेज़ केस के दौरान सलाह के तौर पर राय देते हुए सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने इस व्यवस्था में फेरबदल करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत में नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रधान न्यायाधीश और अदालत के चार वरिष्ठतम जजों से मिलकर बना होगा. हाइ कोर्ट में नियुक्ति के लिए कॉलेजियम में सीजेआइ और दो वरिष्ठतम जज होंगे. 1993 और 1998 के फैसलों में अदालत ने कहा कि शीर्ष अदालत में नियुक्ति के लिए एक तो अपने-अपने हाइ कोर्ट में जजों की परस्पर वरिष्ठता और फिर उनकी अखिल भारतीय वरिष्ठता प्राथमिक आधार होनी चाहिए. हां, असाधारण योग्यता और क्षेत्रीय तथा अन्य विविधता को सुनिश्चित करने के लिए इस नियम में रियायत हो सकती है.
कॉलेजियम प्रणाली सरकार की तरफ से स्थापित एक मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) से निर्देशित होती है. इसके मुताबिक, हाइ कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए वहां के चीफ जस्टिस को पद खाली होने के छह महीने पहले हाइ कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश मुख्यमंत्री को, और उसकी एक प्रति सीजेआइ और केंद्रीय कानून मंत्री को भेजनी होती है. मुख्यमंत्री को छह महीने के भीतर सिफारिश पर अपनी टिप्पणी कानून मंत्री को भेजनी होती है. अगर समय सीमा के भीतर मुख्यमंत्री की राय नहीं मिली तो यह मान लिया जाता है कि उसे इस पर कुछ नहीं कहना है. फिर कानून मंत्री हाइ कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश राज्य सरकार, इंटेलिजेंस ब्यूरो (आइबी) और खुद अपनी राय के साथ सीजेआइ को भेजते हैं.
अब सीजेआइ सुप्रीम कोर्ट में मौजूद उस जज (या जजों) की राय लेता है जो उसी हाइकोर्ट के हैं जहां नियुक्तियां की जानी हैं. सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम फिर सिफारिश को चार हफ्तों के भीतर वापस कानून मंत्री को भेजता है. कानून मंत्री निश्चित कारण बताते हुए नाम पुनर्विचार के लिए सीजेआइ को लौटा सकते हैं या फाइल तीन हफ्तों के भीतर प्रधानमंत्री के सामने रख सकते हैं. अंतत: प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को नियुक्ति करने की सलाह देते हैं पर इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं है.
उच्च न्यायालयों में खाली पदों की बढ़ती संख्या से परेशान सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में नियुक्तियों के लिए नई समय सीमा निर्धारित की. आइबी रिपोर्ट पेश करने के लिए उसने 4-6 हक्रते तय किए. कानून मंत्री को राज्य सरकार और आइबी की रिपोर्ट मिलने के बाद सिफारिश 8-12 हफ्तों के भीतर सीजेआइ को भेजनी होगी. भारत सरकार अगर उसे वापस नहीं भेजती है तो उसे सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की तरफ से सिफारिश भेजे जाने के 3-4 हफ्तों के भीतर नियुक्ति करनी होगी. अब कागज पर तो यह प्रक्रिया ऐसी बन गई है लेकिन कोई भी पक्ष समय सीमा का पालन नहीं करता. कानूनी पर्यवेक्षक मानते हैं कि नामों पर एक राय बनाना समय साध्य काम है. देरी हाइ कोर्ट के कॉलेजियमों से ही शुरू हो जाती है. पद खाली होने से छह महीने पहले नामों की सिफारिश करने का विरले ही पालन होता दिखाई देता है.
विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के रिसर्च डायरेक्टर अर्घ्य सेनगुप्ता मानते हैं कि इसका दोष जजों को नहीं दिया जा सकता. वे कहते हैं, ''जजों से इस बात पर नजर रखने की उम्मीद नहीं की जा सकती कि कौन कब रिटायर हो रहा है. यह प्रशासनिक काम है जो हाइ कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पेशेवर ढंग से नहीं किया जाता. न्यायिक प्रशासन को पेशेवर बनाना ही इसका समाधान है.''
देरी कार्यपालिका की सुस्ती से भी होती है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति जस्ती चेलमेश्वर याद करते हैं कि 2017 मं आंध्र प्रदेश सरकार किस तरह राज्य के हाइ कोर्ट की तरफ से सिफारिश किए गए छह नामों को 10 महीने तक दबाए बैठी रही. वे कहते हैं, ''अगर राज्य सरकार हाइ कोर्ट से सिफारिश मिलने के छह हफ्तों के भीतर कोई टिप्पणी नहीं देती, तो सिफारिशों को स्वीकृत माना जाता है. मगर चूंकि राज्य सरकार ने कोई राय नहीं दी, ऐसे में केंद्रीय कानून मंत्री ने भी सुप्रीम कोर्ट को सिफारिश आगे नहीं बढ़ाई.''
अगर शीर्ष अदालत का कॉलेजियम सरकार की आपत्ति पर विचार करने के बाद किसी नाम को दोबारा भेजता है, तो कागज पर तो राष्ट्रपति उन नामों को सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट के जजों के रूप में नियुक्त करने को बाध्य है. पर ऐसे कई नजीरें हैं जिनमें कॉलेजियम की तरफ से नामों को दोहराए जाने के बावजूद नियुक्ति के आदेश जारी नहीं किए गए. फरवरी में वकील आदित्य सोंधी ने कर्नाटक हाइ कोर्ट में जज के रूप में पदोन्नति के लिए दी गई सहमति अंतत: वापस ले ली. सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 4 फरवरी, 2021 को उनके नाम की सिफारिश की थी और पिछले साल 1 सितंबर को उसे फिर दोहराया था. फिर भी प्रस्ताव केंद्र के पास लटका रहा. होता यह है कि खारिज कर दिए गए जजों के नाम सार्वजनिक क्षेत्र में लीक हो जाते हैं, जैसा कि हाल में 20 नामों को खारिज कर दिए जाने के मामले में देखा गया, ऐसे में कई संभावनाशील वकील और निचली अदालतों के जज ऊंची अदालतों में जजों के रूप में अपने नामों की सिफारिश के लिए सहमति देने से एहतियात बरतने लगे हैं.
हाल ही में केंद्र ने खुद को खुलेआम समलैंगिक बताने वाले वरिष्ठ वकील सौरभ कृपाल को दिल्ली हाइकोर्ट के जज के रूप में पदोन्नत करने की अपनी दोहराई सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से पुनर्विचार करने को कहा. सूत्रों के मुताबिक, खारिज करने का कारण कृपाल की यौन उन्मुखता नहीं बल्कि उनके यूरोपीय साथी की वजह से पैदा हो सकने वाला सुरक्षा जोखिम था. पिछले साल लोकसभा में रिजिजू ने कहा कि केंद्र न्यायिक नियुक्तियों के लिए सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की तरफ से की गई सिफारिशों को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं कर सकता.
क्यों की जाती है कॉलेजियम की आलोचना
कॉलेजियम प्रणाली की अच्छी-खासी आलोचना होती आई है. आलोचक इसके पारदर्शी न होने की तरफ इशारा करते हैं. खासकर इसमें उन कारणों का सार्वजनिक खुलासा नहीं किया जाता कि कोई उम्मीदवार नियुक्ति के लायक या नाकाबिल क्यों है. हालांकि कॉलेजियम के संकल्प सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किए जाते हैं पर वे इसका ज्यादा खुलासा नहीं करते कि अमुक के नाम की सिफारिश क्यों की गई. आरटीआइ के तहत एक अपील दाखिल करके पूछा गया कि कॉलेजियम के प्रस्तावों का औचित्य सार्वजनिक नहीं करने के पीछे क्या वजह है. जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतिम राय का खुलासा किया जा सकता है पर कार्मिक (पर्सनेल) डेटा या ब्योरे नहीं दिए जा सकते क्योंकि यह निजता के अधिकार और गोपनीयता का उल्लंघन है. संवैधानिक कानून विशेषज्ञ फैजान मुस्तफा कहते हैं, ''उनके फैसले कई बार मौसम की तरह अप्रत्याशित होते हैं. पिछले तीन दशकों में कई जजों को सुपरसीड किया गया. हाइ कोर्टों के कई वरिष्ठतम मुख्य न्यायाधीशों को पदोन्नत नहीं किया गया.''
एडिशनल जजों के कार्यकाल के विस्तार या स्थायी जजों के रूप में उनकी पदोन्नति के मामलों में भी संदेहास्पद फैसले लिए गए. संविधान का अनुच्छेद 224 कहता है कि अगर हाइ कोर्ट में काम अस्थायी तौर पर बढ़ गया या लंबित हो गया हो तो राष्ट्रपति अतिरिक्त जजों की नियुक्ति कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने 20 जनवरी 2021 को बंबई हाइकोर्ट की एडिशनल जज न्यायमूर्ति पुष्पा वीरेंद्र गनेदीवाला को स्थायी जज के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की. यह इस तथ्य के बावजूद किया गया कि 2020 में एक विवादास्पद फैसले की वजह से उन्हें जबरदस्त आक्रोश का सामना करना पड़ा था, जब उन्होंने पॉक्सो कानून के तहत पकड़े गए एक आरोपी को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि यौन इरादे से त्वचा से त्वचा का कोई संपर्क नहीं हुआ. बाद में शीर्ष अदालत ने वह सिफारिश वापस ली.
कई आलोचकों का यह भी दावा है कि कॉलेजियम प्रणाली ज्यादा योग्य वकीलों के दावों को अनदेखा करके भाई-भतीजावाद—अंकल जज सिंड्रोम—को बढ़ावा देती है. हालांकि न्यायमूर्ति लोकुर, जो एनजेएसी को रद्द करने देने वाली पीठ का हिस्सा थे, कॉलेजियम प्रणाली की लानत-मलानत करने से पहले सावधानी बरतने की सलाह देते हैं. वे कहते हैं, ''यह 1990 के दशक से पहले की प्रणाली से बेहतर है. पहले यह समझने की जरूरत है कि कॉलेजियम प्रणाली कैसे काम करती है और नियुक्ति की प्रक्रिया में राज्य सरकार और केंद्र सरकार की भूमिका क्या है. केवल तभी न केवल सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर बल्कि राज्य और केंद्र सरकारों के स्तर भी सुधार किए जा सकते हैं.'' यह अलग बात है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच चर्चा और संवाद की जगह एक दूसरे पर सार्वजनिक छींटाकशी ने ले ली है.
विकल्प क्या हैं?
संसद ने 2014 में न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया में आमूलचूल बदलाव के लिए संविधान में संशोधन करते हुए एक कानून पारित किया. इसने एनजेएसी की स्थापना की. इस कमीशन में भारत के प्रधान न्यायाधीश, सीजेआइ के बाद सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जजों और केंद्रीय कानून मंत्री के अलावा और दो ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होने थे जिनका चुना प्रधानमंत्री और लोकसभा में नेता विपक्ष की समिति करती. कम से कम एक प्रतिष्ठित व्यक्ति एससी/एसटी/ओबीसी/धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों का सदस्य या महिला को होना था. कमीशन के दो सदस्यों के भी किसी की नियुक्ति के खिलाफ वोट देने पर नियुक्ति नहीं की जाती.
2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन को यह कहकर रद्द कर दिया कि यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है, इस आधार पर कि इस नई कार्यप्रणाली में राजनैतिक दखल का अंदेशा है, जो न्यायिक स्वतंत्रता में बाधक है. न्यायिक स्वतंत्रता संविधान के असंशोधनीय मूल ढांचे का हिस्सा है, इसलिए संशोधन अमान्य है. दिग्गज वकील और अब किंग्स काउंसल हरीश साल्वे कॉलेजियम सिस्टम के सबसे बड़े आलोचक हैं और वे इस फैसले को खामियों से भरा मानते हैं. नियुक्तियों में कार्यपालिका के दखल के हिमायती साल्वे कहते हैं, ''भारत के कुछ बेहतरीन जज उस प्रणाली से निकले जहां कार्यपालिका नियुक्तियां करती थी. कार्यपालिका ने सीमा लांघी तो वह प्रणाली नाकाम हो गई.''
सूत्रों की मानें तो केंद्र सरकार एनजेएसी के एक नए संस्करण पर काम कर रही है, जिसमें शीर्ष अदालत की तरफ से प्रतिकूल फैसले के खिलाफ बचाव के पर्याप्त उपाय किए जाएंगे. केंद्रीय कानून मंत्री के हालिया बयान दरअसल कॉलेजियम प्रणाली के खिलाफ सार्वजनिक नैरेटिव खड़ा करने की ज्यादा बड़ी योजना का हिस्सा हैं. बहरहाल, सरकार और न्यायपालिका की अपनी-अपनी दलीलें हैं, पर जरूरत जजों के चयन की ज्यादा प्रभावी और पारदर्शी प्रक्रिया खोजने की है ताकि लोकतंत्र मजबूत बने.
न्यायिक नियुक्तियों का संक्षिप्त इतिहास
कॉलेजियम प्रणाली से पहले उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते थे. यह काम वे मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह तथा भारत के प्रधान न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट और हाइ कोर्टों के दूसरे न्यायाधीशों के साथ परामर्श पर करते थे. लेकिन न्यायाधीशों की सलाह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं थी.
1958 में भारत के विधि आयोग ने तर्क दिया कि नियुक्ति की इस प्रणाली से सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को न्यायालयों में नियुक्ति के अवसर नहीं मिलते.
1981में नियुक्ति की इस प्रणाली को इस आधार पर चुनौती दी गई कि इससे न्यायिक स्वतंत्रता बाधित होती है. उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि कार्यपालिका और चीफ जस्टिस के बीच असहमति की स्थिति में कार्यपालिका के विचार मान्य होंगे.
1993 में इस प्रणाली को एक और बार चुनौती दी गई. इस पर उच्चतम न्यायालय ने अपने पिछले फैसले को पलटते हुए कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता संविधान के असंशोधनीय बुनियादी ढांचे का हिस्सा थी और इस सिद्धांत की रक्षा के लिए नियुक्तियों की प्रक्रिया में न्यायपालिका की 'प्रधानता' होनी चाहिए. इस फैसले से कॉलेजियम के नेतृत्व वाली नियुक्ति प्रणाली की शुरुआत हुई.
1998 में जारी अपनी एक एडवाइजरी में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि कॉलेजियम में भारत के प्रधान न्यायाधीश और शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होंगे.
2014 में संसद ने न्यायिक नियुक्तियों के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) की स्थापना की थी. इस आयोग में भारत के प्रधान न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के दो अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीशों और केंद्रीय कानून मंत्री के अलावा दो ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होने थे जिनका चुनाव प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता की दो-सदस्यीय समिति करती. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन को संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करने वाला माना. साथ ही एनजेएसी को इस आधार पर खारिज कर दिया कि नई प्रक्रिया न्यायिक नियुक्तियों में राजनीतिक हस्तक्षेप के अंदेशे को जन्म देती है और न्यायिक स्वतंत्रता में अवरोध पैदा करती है.