पार्टी का वही पुराना ऊहापोह
पार्टी चुनावों और भारत जोड़ो यात्रा की तारीखों की अदला-बदली इसलिए की गई है ताकि राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वापसी के लिए मनाया जा सके. हालांकि उनके किसी गैर-गांधी को अध्यक्ष बनाने के अपने पुराने रुख से पीछे हटने की संभावना नहीं है.

यह ऐसा राजनैतिक संदेश था जिसने कांग्रेस को झकझोर कर रख दिया. 26 जुलाई को, पार्टी से अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए पांच पन्नों के अपने पत्र में, पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस के वास्तविक प्रमुख राहुल गांधी पर तीखा हमला किया.
उस चिट्ठी में उन्होंने पिछले आठ वर्षों में हुए चुनावों में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के लिए सीधे-सीधे राहुल को जिम्मेदार ठहराया. हालांकि पार्टी छोड़ने वाले कई नेता पहले भी अपने फैसले के लिए राहुल को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं लेकिन यह पहली बार था कि 50 साल का राजनैतिक अनुभव रखने वाले पार्टी के किसी दिग्गज नेता ने चुनावी हार के लिए राहुल को जिम्मेदार ठहराया.
आजाद की चिट्ठी कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की ओर से अगले कांग्रेस अध्यक्ष के निर्वाचन के लिए चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करने से दो दिन पहले आई. पार्टी के कई अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि इस चिट्ठी पत्र का मकसद राहुल को पार्टी की बागडोर फिर से हाथ में लेने की संभावना को रोकना था. वैसे, पूर्व कांग्रेस प्रमुख ने कई मौकों पर अपने सहयोगियों से कहा है कि वे एक गैर-गांधी को पार्टी अध्यक्ष के रूप में देखना चाहते हैं.
फिर भी, पिछले कुछ हफ्तों से—चुनाव कार्यक्रम का समय जैसे-जैसे पास आ रहा है—राहुल को मनाने के प्रयास किए जा रहे हैं. राज्यसभा में अपने तीसरे कार्यकाल का आनंद ले रहे सीडब्ल्यूसी सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, ''पूरे देश में समर्थन के साथ राहुल गांधी ही सबसे स्वीकार्य कांग्रेस नेता हैं. इसलिए सभी कांग्रेस कार्यकर्ता उन्हें वापस चाहते हैं. जो लोग पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की बात जोर-शोर से कहते रहे हैं, उनका राहुल की उम्मीदवारी पर सवाल उठाना अपने आप में अलोकतांत्रिक है.’’
लेकिन राहुल अडिग रहे हैं. 5 अगस्त को, जब गांधी परिवार सहित कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिल्ली की सड़कों पर महंगाई और बेरोजगारी का विरोध कर रहे थे, उनमें से कुछ ने राहुल को मनाने की कोशिश की. राहुल ने यह कहते हुए पलटवार किया, ''यह वह पार्टी नहीं है जिसका मैं नेतृत्व करना चाहता हूं.’’ सीडब्ल्यूसी के एक सदस्य का कहना है कि आजाद का पत्र उन्हें अध्यक्ष पद के चुनावों से दूर रहने का एक और बहाना देगा.
राहुल पार्टी का नेतृत्व करने के अनिच्छुक क्यों हैं?
राहुल की अनिच्छा के मूल में कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं के साथ उनका मोहभंग है. उनका मानना है कि ये नेता, जिनका पार्टी में काफी दबदबा है, किसी भी ऐसे फैसले को रद्द करा देने की क्षमता रखते हैं जो उनके हितों के खिलाफ हो. उन्होंने 2019 में लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया था, तब उन्होंने कहा था कि कुछ नेताओं की रुचि भाजपा और नरेंद्र मोदी से लड़ने की तुलना में अपने बच्चों के लिए टिकट सुनिश्चित कराने में अधिक थी.
राहुल ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वे मोदी के खिलाफ लड़ाई में एकदम अकेले खड़े थे और उन्हें वरिष्ठ नेताओं से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला. उनका कहना है कि वे इसीलिए नहीं चाहते कि उनके परिवार से कोई भी—मां सोनिया या बहन प्रियंका—आधिकारिक रूप से कांग्रेस की जिम्मेदारी लें. राहुल के एक करीबी सहयोगी कहते हैं, ''हर निर्णय गांधी परिवार के नाम पर लिया जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि गांधी हर निर्णय पर अपनी सहमति देते हैं.
जब वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि किसी निर्णय से उन्हें नुक्सान हो सकता है तो वे हील-हुज्जत करने लगते हैं जिससे फैसलों को लागू करना मुश्किल हो जाता है. लेकिन इसका सारा ठीकरा गांधी परिवार के ऊपर फोड़ा जाता है.’’
उनके विरोधी इस तर्क को जवाबदेही से बचने की एक चाल बताते हुए खारिज करते हैं. वे पंजाब में गांधी भाई-बहनों के हस्तक्षेप की ओर इशारा करते हैं, जहां तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की आपत्ति के बावजूद नवजोत सिंह सिद्धू को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था. कैप्टन की जगह चरणजीत सिंह चन्नी को बैठाया गया, जिन्हें राहुल ने चुना था.
अगस्त 2020 में सोनिया से जवाबदेह, सुलभ नेतृत्व और संगठनात्मक सुधारों की मांग का एक पत्र लिखने वाले 23 वरिष्ठ कांग्रेसियों के समूह जिसे जी-23 भी कहा जाता है, में शामिल एक नेता कहते हैं, ''परिवार बस पार्टी अध्यक्ष के रूप में एक कठपुतली चाहता है. कुछ भी गलत होने पर सारा दोष उसके मत्थे मढ़ दिया जाएगा, जबकि सत्ता के असली केंद्र तीन गांधी ही होंगे.’’ जी-23 के दो सदस्य-आजाद और कपिल सिब्बल-पार्टी छोड़ चुके हैं.
टीम राहुल का दावा है कि पंजाब कांड इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे वरिष्ठ नेता बदलाव की किसी भी कोशिश में रोड़े अटकाते हैं. उनका कहना है कि अमरिंदर को कुर्सी छोड़ने को इसलिए कहा गया था क्योंकि तीन सर्वेक्षणों में उनके खिलाफ भारी सत्ता-विरोधी मिज़ाज होने का अनुमान लगाया गया था.
लेकिन उन्हें अपनी कुर्सी छोड़ने के लिए मनाने में 'परिवार’ को लगभग एक साल लग गया. उनका कहना है कि तब तक जो क्षति हो गई वह अपूरणीय थी. राहुल के एक करीबी लोकसभा सांसद कहते हैं, ''जब गांधी परिवार ने कार्रवाई की, तो उन्होंने चुनाव में पार्टी की संभावनाओं को खत्म करने के लिए भाजपा से हाथ मिला लिया. लेकिन उसका दोष गांधी परिवार को दिया गया.’’
उनके सहयोगी यह भी कहते हैं कि राहुल पार्टी अध्यक्ष के कार्यालय में ''अनावश्यक’’ कागजी कार्रवाई से बचना चाहते हैं और पूरा ध्यान पार्टी के निर्माण पर केंद्रित करना चाहते हैं. सीडब्ल्यूसी के एक सदस्य जो राज्यसभा सांसद हैं, कहते हैं, ''आधिकारिक जिम्मेदारियों के बिना, वे कांग्रेस के संदेश को जनता तक ले जाने के लिए अधिक समय दे सकते हैं. यह अकारण नहीं है कि मोदी और भाजपा उन्हें निशाना बना रहे हैं.
वे जनता के बीच राहुल गांधी की व्यापक अपील से घबराते हैं.’’ उनका कहना है कि गांधी परिवार के हाथ कांग्रेस की कमान नहीं होना भाजपा के लिए बहुत मुफीद होगा, क्योंकि उसके लिए शायद ऐसे प्रतिद्वंद्वी से मुकाबला करना आसान हो सकता है जो उस परिवार से नहीं है. लेकिन हर कोई इस तर्क से सहमत नहीं है. कई लोगों का मानना है कि कांग्रेस में राहुल की मौजूदगी से भाजपा के लिए वंशवादी राजनीति को निशाना बनाना आसान नहीं रह जाएगा.
क्या हृदय परिवर्तन हो सकता है?
सीडब्ल्यूसी ने 28 अगस्त को घोषणा की कि कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव 17 अक्तूबर को होगा. इससे पहले पार्टी ने अगले अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया 20 सितंबर तक पूरी करने और उससे पहले 21 से 28 अगस्त के बीच नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया पूरी कराने का फैसला किया था. अब नामांकन प्रक्रिया 30 सितंबर तक पूरी की जाएगी.
यह देरी अकारण नहीं है. जहां संगठनात्मक चुनाव को लगभग एक महीने के लिए टाल दिया गया है, वहीं पार्टी ने अपनी 'भारत जोड़ो यात्रा’ को पूर्व निर्धारित समय से पहले शुरू करने का फैसला किया है. इसे 2 अक्तूबर से शुरू किया जाना था. पैदल मार्च 7 सितंबर को कन्याकुमारी से शुरू होगा. 12 राज्यों में 3,570 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए यह पदयात्रा कश्मीर में, 160 दिनों में पूरी होगी. राहुल इसे हरी झंडी दिखाएंगे और 100-150 लोगों के एक कोर ग्रुप के साथ वे हर रोज लगभग 25 किलोमीटर की दूरी तय करेंगे.
कांग्रेस नेता यात्रा को इस उम्मीद के साथ तयशुदा समय से पहले शुरू कराना चाहते हैं कि जन संपर्क कार्यक्रम और लोगों की अपेक्षित सकारात्मक प्रतिक्रिया राहुल को हृदय परिवर्तन के लिए प्रेरित कर सकती है. अध्यक्ष पद के लिए नामांकन की अंतिम तिथि 30 सितंबर तक, राहुल तमिलनाडु और केरल, दो राज्य जहां कांग्रेस ने 2019 के चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया था, को कवर करने के बाद कर्नाटक में प्रवेश करेंगे. राहुल केरल के वायनाड से सांसद हैं. राज्यसभा के एक नेता कहते हैं, ''राहुल पहली बार देखेंगे कि कैसे आम लोग चाहते हैं कि वे न केवल कांग्रेस बल्कि मोदी के खिलाफ लड़ने को इच्छुक सभी ताकतों का नेतृत्व करें.’’
चुनाव टालने से पार्टी को तकनीकी रूप से शर्मनाक स्थिति से बचने में भी मदद मिलेगी. बीमार सोनिया की गैरहाजिरी में राहुल यात्रा को हरी झंडी दिखाएंगे. अगर कोई गैर-गांधी यात्रा से पहले अध्यक्ष बन जाता है, तो राहुल के पास इसके शुभारंभ का कोई अधिकार नहीं होगा, और अगर वे फिर भी हरी झंडी दिखाते हैं, तो उनके विरोधियों के पास गांधी परिवार के खिलाफ रिमोट से पार्टी चलाने के पुराने आरोपों को दोहराने का भरपूर मसाला होगा.
अगर गांधी नहीं तो फिर कौन?
परिवार में से किसी के अध्यक्ष बनने के इच्छुक नहीं होने के कारण, कांग्रेस के पास 24 साल बाद एक गैर-गांधी अध्यक्ष हो सकता है. यह पद 1998 से गांधी परिवार के पास है, जब सोनिया ने पदभार संभाला था. वे 2017 में राहुल के पदभार संभालने तक शीर्ष पद पर रहीं. गांधी परिवार किसी ऐसे व्यक्ति को नेतृत्व नहीं सौंपेगा जिस पर उसे भरोसा नहीं हो और इस तरह पार्टी पर नियंत्रण खो दे. वे ऐसी स्थिति से पहले गुजर चुके हैं.
1991 में राजीव गांधी की मृत्यु के बाद, जब सोनिया राजनीति में शामिल होने के लिए अनिच्छुक थीं, नरसिंह राव प्रधानमंत्री के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष भी बने. गांधी परिवार ने यह मानते हुए राव का समर्थन किया था कि न तो उनका सक्रिय राजनीति में अब ज्यादा समय शेष है और न ही पार्टी पर भी उनकी ज्यादा पकड़ है. हालांकि, राव ने जल्द ही खुद फैसले लेने शुरू कर दिए. उनके उत्तराधिकारी, सीताराम केसरी भी गांधी परिवार के बहुत भरोसेमंद नहीं थे. अंतत: तख्तापलट करके उन्हें बाहर किया गया जिसके बाद सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान संभाली.
इस बार कांग्रेस का प्रथम परिवार इस बात से सावधान है कि उनकी गैर-मौजूदगी में कौन कमान संभालेगा. बताया जाता है कि सोनिया ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से अध्यक्ष का चुनाव लड़ने का अनुरोध किया, लेकिन 71 वर्षीय गहलोत इसके लिए तैयार नहीं हैं. कांग्रेस सूत्रों का दावा है कि उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए दो शर्तें रखी हैं—या तो उन्हें राजस्थान का मुख्यमंत्री बने रहने दिया जाए या उनकी पसंद के किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया जाए. हालांकि गहलोत या सोनिया की ओर से कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन किसी भी शर्त को पूरा करना आसान नहीं होगा.
गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी बनाए रखने की पहली शर्त के आड़े मई में कांग्रेस का उदयपुर सम्मेलन आता है जिसमें 'एक व्यक्ति, एक पद’ की नीति का प्रस्ताव रखा गया था. उनकी दूसरी शर्त के पीछे असली मकसद अपने धुर विरोधी और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट को किसी भी तरह मुख्यमंत्री की कुर्सी से वंचित रखना है.
हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि 2020 में उनके असफल विद्रोह के बाद, गांधी भाई-बहनों ने 2023 में राज्य में चुनाव होने से एक साल पहले पायलट को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था. गहलोत को अध्यक्ष पद संभालने के प्रस्ताव की वजह यही वादा माना जा रहा है.
वैसे, राजस्थान के मुख्यमंत्री लगभग उन सभी मानकों पर फिट बैठते हैं जो कांग्रेस अध्यक्ष में गांधी परिवार को चाहिए. वे उत्तर भारत के प्रमुख नेता हैं, जहां पार्टी ने पिछले दो लोकसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन किया है. वे पूर्व केंद्रीय मंत्री, राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं और उन्हें संगठन निर्माण का अनुभव है. पार्टी के इस पूर्व महासचिव (संगठन) ने 2017 में मोदी के गृह राज्य गुजरात में विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के शानदार प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. गहलोत को इस साल के अंत में होने वाले गुजरात चुनाव के लिए कांग्रेस का चुनाव पर्यवेक्षक बनाया गया है.
गहलोत के साथ दो अन्य फायदे भी हैं—वे प्रधानमंत्री मोदी की तरह ओबीसी नेता हैं, और ऐसे व्यन्न्ति हैं जो कांग्रेस में सामान्य कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत करके यहां तक पहुंचे हैं. लगभग सभी दल ओबीसी वोट बैंक को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं जो किसी भी चुनाव में बड़ा स्विंग फैक्टर है, और कांग्रेस के खिलाफ सबसे दमदार आलोचना गांधी खानदान को लेकर उसका जरूरत से ज्यादा झुकाव है. कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में गहलोत की नियुन्न्ति उन लोगों को माकूल जवाब होगी जो कांग्रेस को महज एक परिवार की पार्टी बताकर उसे खारिज करते हैं.
गहलोत के अधिकांश विपक्षी नेताओं के साथ अच्छे संबंध भी हैं. आम चुनावों में भाजपा को चुनौती देने के लिए कांग्रेस को विपक्षी दलों का गठबंधन बनाने की जरूरत है. जहां सोनिया ने अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं, वहीं कई विपक्षी नेता राहुल की कार्यशैली से सहज नहीं हैं.
वैसे अध्यक्ष पद के लिए मल्लिकार्जुन खडग़े, मीरा कुमार और मुकुल वासनिक के नाम भी चर्चा में हैं, लेकिन व्यापारिक घरानों तक अच्छी पहुंच के कारण गहलोत को बढ़त हासिल है. कांग्रेस को वर्तमान में संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ रहा है और राजस्थान के मुख्यमंत्री कॉर्पोरेट जगत में अपने संपर्कों का इस्तेमाल धन जुटाने के लिए कर सकते हैं. एक राज्यसभा सदस्य कहते हैं, ''इस बात की संभावना नहीं है कि गांधी परिवार दृढ़ता से उन्हें कुछ करने को कहे और वे उसे मना कर दें. अगर गहलोत को राजी करने के लिए पायलट की बलि देनी पड़े तो गांधी परिवार इसको लेकर ज्यादा हिचकेगा नहीं.’’
क्या प्रतिस्पर्धा होगी?
परिवार से बाहर चाहे जो व्यक्ति चुनाव लड़ें, उन्हें 2017 के विपरीत चुनावी चुनौती का सामना करना पड़ेगा, जब राहुल गांधी मैदान में एकमात्र उम्मीदवार थे. कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव आखिरी बार 2001 में हुआ था जब जितेंद्र प्रसाद सोनिया गांधी के खिलाफ मैदान में उतरे थे. 7,542 वैध मतों में से, उन्हें केवल 94 ही मिले थे. हालांकि गांधी परिवार समर्थित उम्मीदवार के पास बढ़त होगी पर ऐसी अटकलें हैं कि तीन बार के लोकसभा सदस्य और जी23 नेताओं में से एक, शशि थरूर भी अध्यक्ष पद पर दावेदारी ठोक सकते हैं.
वैसे, उन्होंने इस विषय पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, पर कुछ नेताओं का कहना है कि वे नेतृत्व के मुद्दे को सुलझाने के लिए एक निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया की आवश्यकता को लेकर ''एक चर्चा को बढ़ावा देने’’ की कोशिश कर रहे हैं. थरूर ने 29 अगस्त को एक समाचार पत्र में लिखा था, ''मुझे उम्मीद है कि कई उम्मीदवार आगे आएंगे. पार्टी और राष्ट्र के लिए अपने दृष्टिकोण को सामने रखना निश्चित रूप से जनहित को बढ़ावा देगा.’’
इन सभी अटकलों के बीच, जो निश्चित है वह यह है कि 17 अक्तूबर तक कांग्रेस को एक नया निर्वाचित अध्यक्ष मिल जाएगा. सांसद सिंघवी कहते हैं, ''चाहे पार्टी का मुखिया कोई भी हो, यह एक संयुक्त परिवार और देश में विपक्षी ताकत की धुरी रहेगा.’’ यह उस पार्टी के लिए महत्वाकांक्षी है जो विघटन से बचने के लिए बार-बार गांधी उपनाम का सहारा ले लेती है.