किस पर पड़ेगी पछुआ की मार
प्रधानमंत्री मोदी के घरेलू मैदान गुजरात में चुनावी प्रचार तेज हो गया है. सत्तारूढ़ भाजपा क्या कांग्रेस और आप की ओर से पेश की जा रही चुनौती से पार पा सकती है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 28 अगस्त को उस नर्मदा नहर का उद्घाटन करने भुज पहुंचे जो दक्षिण गुजरात से सूखे कच्छ में पानी पहुंचाएगी. राज्य में दिसंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं. उद्घाटन के बाद एक रैली में प्रधानमंत्री ने आश्चर्यजनक रूप से अपने मुख्यमंत्रित्व काल (2001-14) के दौरान 2002 के दंगों के बाद गुजरात को बदनाम करने की साजिशों का पुराना मुद्दा खड़ा कर दिया. पिछले कुछ वर्षों के उनके भाषणों को अगर देखें तो यह उनसे अप्रत्याशित रूप से अलग था. उन्होंने अतीत के बारे में बात करना बंद कर राज्य के लिए भविष्य के अवसरों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया था.
प्रधानमंत्री के दो-दिवसीय अति-व्यस्त दौरे में भुज में एक रोड शो (मार्च के बाद से राज्य में उनका चौथा), साबरमती नदी पर पैदल यात्रियों के लिए अटल पुल का उद्घाटन और एक खादी उत्सव कार्यक्रम में भाग लेते हुए पूरे गुजरात में फैली 7,500 महिला कारीगरों के साथ चरखा कातने के कार्यक्रम शामिल थे. उनका यह व्यस्त दौरा राज्य में दो महत्वपूर्ण घटनाओं की पृष्ठभूमि में हो रहा था.
बमुश्किल 10 दिन पहले, 19 अगस्त को मुख्यमंत्री भूपेंद्रभाई पटेल की अध्यक्षता में राज्य मंत्रिमंडल में एक बड़ा बदलाव हुआ था. इसके बाद पब्लिसिटी के लिहाज से एक बड़ा हादसा ही हो गया. स्वतंत्रता दिवस पर राज्य सरकार ने बिलकीस बानो प्रकरण के 11 सजायाफ्ता लोगों को रिहा कर दिया. इन्हें 2002 के दंगों के दौरान बिलकीस के साथ सामूहिक बलात्कार और उसके परिवार के 14 लोगों को मार डालने के जुर्म में जेल हुई थी. भाजपा के एक सूत्र की मानें तो मोदी राज्य के नेताओं से उन दोनों घटनाओं के असर की थाह लेने में लगे हुए थे.
पिछले 19 अगस्त को मुख्यमंत्री पटेल ने अपने दो मंत्रियों राजेंद्र त्रिवेदी से राजस्व विभाग और पूर्णेश मोदी से 'सड़क और भवन’ मंत्रालय छीन लिए थे. इस बारे में कोई आधिकारिक सफाई नहीं दी गई. भाजपा के एक सूत्र ने स्पष्ट किया कि चुनाव के इतने करीब पार्टी नेतृत्व विपक्षियों को ''अक्षमता और दोषियों को बचाने’’ जैसे मुद्दों पर उंगली उठाने का मौका देने के मूड में नहीं था.
कैबिनेट में दूसरे नंबर के नेता त्रिवेदी की सरकारी अधिकारियों पर ''छापे’’ के लाइव टेलीकास्ट की आदत थी (बताते हैं, कइयों से उन्होंने गलत पंगा ले लिया). उधर पूर्णेश पुलों पर घटिया काम के जिम्मेदार एक ठेकेदार को बचाने के लिए कठघरे में हैं. वैसे, दोनों मंत्रियों के पास अपेक्षाकृत कम महत्व वाले विभाग बरकरार हैं.
इस तरह की कार्रवाई कोई पहली बार नहीं हुई है. मार्च में प्रधानमंत्री कार्यालय ने मुख्यमंत्री से अपने ही निजी सहायक ध्रूमिल पटेल को हटाने के लिए कहा था. फिर, जुलाई में भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलने पर राज्य भाजपा अध्यक्ष सीआर पाटील को उनके सहायक सुधांशु मेहता को बर्खास्त करने के लिए कहा गया.
भाजपा करीब तीन दशक से गुजरात में राज करती आई है, पर हाल के वर्षों में सत्ता विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के मामलों से उसकी छवि पर असर पड़ा है. इस चुनाव में अभी भी बहुत कुछ उनके पक्ष में है—हमेशा की तरह चमकदार छवि वाले मोदी, मजबूत पार्टी संगठन, एक अपेक्षाकृत कुशल प्रशासन और सबसे अहम बात, मुख्य विपक्षी कांग्रेस का लुंजपुंज हाल में होना.
इसकी एक वजह यह भी रही है कि भाजपा नियमित रूप से कांग्रेसी नेताओं को अपने पाले में खींचने में कामयाब होती आई है. पिछले साढ़े चार साल में कांग्रेस के 77 में से 13 विधायकों सहित कई सीनियर नेता पाला बदल चुके हैं. ताजा मामला अभी 18 अगस्त का है जब पूर्व विधायक और एआइसीसी के सदस्य रहे नरेश रावल ने पाला बदला.
एक साल से भी कम समय से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मौजूद भूपेंद्र पटेल ने खुद को आम लोगों के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है. चुनावी मौसम में बंटी रेवड़ियों में राज्य के कर्मचारियों को महंगाई भत्ते में तीन प्रतिशत की बढ़ोतरी और राज्य के 250 तालुकों में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत पंजीकृत 71 लाख राशन कार्ड धारकों को रियायती दर पर एक किलो दाल दिया जाना शामिल है. स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने कहा था, ''हमने ऐसी कार्य संस्कृति विकसित की है जिसमें लोगों को ज्यादा दिक्कत नहीं होती और उनके मुद्दों का जल्द से जल्द समाधान किया जाता है.’’
हमेशा की तरह, संगठनात्मक मोर्चे पर भाजपा ने कम से कम 150 सीटें जीतने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है (सन् 1985 में कांग्रेस के मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी के बनाए राज्य के रिकॉर्ड से एक ज्यादा). पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष सी.आर. पाटील ने 21 अगस्त को अहमदाबाद में पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि ''भाजपा सभी 182 सीटें जीतने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए चौबीसों घंटे काम कर रही है.’’
राज्य के तीन शीर्ष नेताओं—केंद्रीय मंत्री अमित शाह, मनसुख मांडविया और परषोत्तम रूपाला—की दिल्ली में व्यस्तता के बीच चर्चा है कि अगर पार्टी 127 सीटों का अपना पिछला रिकॉर्ड तोड़ती है तो भूपेंद्रभाई पर अपने प्रभाव के कारण ''सुपर सीएम’’ कहे जाने वाले पाटील मुख्यमंत्री पद के अगले उक्वमीदवार हो सकते हैं. हालांकि पाटील इससे इनकार करते हुए स्पष्ट कहते हैं, ''भूपेंद्रभाई ही सीएम का चेहरा होंगे.’’
इस बीच, विपक्षी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) मतदाताओं को अपने 'राजस्थान मॉडल’ और 'दिल्ली मॉडल’ से लुभाने की कोशिश कर रही हैं. कांग्रेस ने 2017 में पार्टी के प्रचार प्रमुख रहे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर फिर से दांव लगाया है. वे इस बार भी चुनाव प्रभारी हैं.
18 से 20 अगस्त तक गुजरात में डेरा डालकर उन्होंने सूरत, वडोदरा, राजकोट और अहमदाबाद में पार्टी पदाधिकारियों के साथ बातचीत की, पर चुनावी घोषणापत्र अभी रोक रखा है. पार्टी ने 'बोलो सरकार’ नाम से एक अभियान शुरू किया है जिसके तहत कांग्रेस कार्यकर्ता लगभग 2,000 बैठकें करके ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों से सुझाव प्राप्त करेंगे. सूत्रों का कहना है कि आलाकमान की समीक्षा के बाद बेहतर सुझाव घोषणापत्र में शामिल किए जा सकते हैं.
गुजरात कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के मोर्चे पर भाजपा सरकार की ''विफलताओं’’ पर ध्यान दिया जाएगा. गहलोत चाहते हैं कि पार्टी के लोग गुजरात में कोविड-19 की स्थिति से निबटने की स्थितियों के बरक्स राजस्थान सरकार की 'स्वास्थ्य का अधिकार’ विधेयक पेश करने की योजना का प्रचार करें.
राज्य के हर परिवार को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करने वाली राजस्थान सरकार की योजना 'चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना’ को गुजरात में भी लागू करने की बात अभियान के दौरान एक अहम मुद्दा होगी. गहलोत ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि ''महामारी के दौरान गुजरात की स्थिति को देखना बहुत दर्दनाक था. 27 साल तक सत्ता में रहने के बावजूद यहां की सरकार ने जानें बचाने के लिए कुछ नहीं किया.’’
चुनाव प्रभारी के रूप में गहलोत 2017 में कांग्रेस को 77 सीटें जिता सके थे जो 1995 के बाद से पार्टी का सबसे अच्छा प्रदर्शन था. पार्टी ने तब एक आकर्षक चुनावी नारा भी दिया था, 'विकास गांडो थायो छे’ (विकास पगला गया है). यह मोदी के पसंदीदा 'विकास’ मंत्र पर व्यंग्य था, पर यह भगवा पार्टी को पटरी से उतारने के लिए पर्याप्त साबित न हुआ.
पिछले दो वर्षों में आई गिरावट से कांग्रेस को उबारने में गहलोत को भी पसीने छूट सकते हैं. पार्टी के कई बड़े नेता खेमा बदलकर भाजपा में शामिल हो चुके हैं. लेकिन गहलोत माहौल गरमाने के लिए तैयार हैं. 20 अगस्त को अहमदाबाद में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को ''छंटा हुआ अभिनेता’’ बताया.
लेकिन, भाजपा से ज्यादा कांग्रेस को इस बात की चिंता है कि कहीं आम आदमी पार्टी (आप) उनकी सीटे न झटक ले. आप प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस बार सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात पर नजरें गड़ाए हैं. उन्होंने गुजरात में गुणवत्तापूर्ण सरकारी स्कूली शिक्षा मुहैया करने के 'दिल्ली मॉडल’ को दोहराने का वादा किया है. 16 अगस्त को भुज के एक टाउन हॉल में केजरीवाल ने इस संबंध में एक योजना बनाई जिसमें नए स्कूल खोलना, निजी स्कूलों का ऑडिट करना, फीस ढांचे को फ्रीज करना और संविदा शिक्षकों की नौकरियों को स्थायी करना शामिल था.
केजरीवाल मुफ्त सुविधाओं वाले अपने अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं. उन्होंने हर महीने 300 यूनिट मुफ्त बिजली, युवाओं को 3,000 रुपए महीना बेरोजगारी भत्ता और 18 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं को 1,000 रुपये देने के वादे का संदेश पार्टी के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर प्रसारित करने के लिए 1,100 स्थानीय युवाओं को नियमित काम पर रखा है.
दिल्ली के मुख्यमंत्री ने तो संविदा शिक्षकों और पुलिसकर्मियों से भी आग्रह किया है कि वे गुप्त रूप से आप का प्रचार करें. उन्होंने कहा, ''पुलिसकर्मी बेहतर वेतन की मांग कर रहे हैं. वे हमारे लिए काम करें. आप की सरकार बनाने में मदद करें और हम आपको ज्यादा वेतन देंगे.’’
कोई आश्चर्य नहीं कि केजरीवाल के शब्दों का आकर्षण कांग्रेस को परेशान कर रहा है. पूर्व केंद्रीय मंत्री तुषार चौधरी आप को ''भाजपा की बी-टीम’’ कहते हैं, जबकि पूर्व राज्य कांग्रेस प्रमुख अर्जुन मोढवाडिया हर श्रोता को बता रहे हैं कि उनकी पार्टी ने मई में ही किसानों को मुफ्त बिजली देने का वादा किया था.
आप के प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया ने इस पर पलटवार करते हुए कहा है कि कांग्रेस को पहले अपने वादों को उन राज्यों में लागू करना चाहिए जहां उसकी सरकार है—राजस्थान और छत्तीसगढ़. भाजपा आराम से इस हंगामे का मजा ले रही है. राज्य के उसके एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''अगर आप कांग्रेस के वोट काटती है तो इससे हमारे मार्जिन में सुधार होगा.’’
गुजरात में कांग्रेस के लिए गहलोत की योजना यही है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भाजपा सरकार की 'नाकामियों’ को बढ़-चढ़कर प्रचारित किया जाए.