खास रपटः आर्थिक बहाली को कैसे रखें बरकरार
दूसरी तिमाही के आंकड़े इशारा करते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था सुधार के रास्ते पर है लेकिन ऊंची महंगाई दर, मांग में सुस्ती और घटती नौकरियां अब भी चिंता का सबब हैं.

आर्थिक बहाली
नवंबर की 30 तारीख को जब इस वित्त वर्ष 2021-22 की दूसरी तिमाही के देश की जीडीपी के बहुप्रतीक्षित आंकड़े आए, तो अपने साथ खुश होने की वजह भी लाए. कोविड वायरस के अर्थव्यवस्था को चौपट करने के बाद से पहली बार दूसरी तिमाही के ग्रोथ के आंकड़े महामारी आने से पहले के स्तर पर पहुंचे हैं.
दूसरी तिमाही में रियल जीडीपी 8.4 प्रतिशत की दर से बढ़ी जो महामारी आने से पहले यानी वित्त वर्ष 2019-20 की इसी तिमाही के आंकड़ों से मेल खाती है. यह भारतीय अर्थव्यवस्था के सुधार के रास्ते पर होने का सूचक है. केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने नवंबर माह की अर्थव्यवस्था की मासिक समीक्षा में आशावादी ढंग से कहा, भारत उन कुछ देशों में है जिन्होंने कोविड-19 के बीच लगातार चार तिमाहियों में ग्रोथ हासिल की है (2020-21 की तीसरी और चौथी तिमाही, 2021-22 की पहली और दूसरी तिमाही) जो भारतीय अर्थव्यवस्था में वापसी के माद्दे को दर्शाती है.
इस बहाली का संचालन सेवा क्षेत्र के रफ्तार पकड़ने, विनिर्माण में पूर्ण सुधार और कृषि क्षेत्र में लगातार ग्रोथ ने किया है. अब चुनौती मजबूत और टिकाऊ रिकवरी सुनिश्चित करने की है तथा आगे का रास्ता भी कम मुश्किल नहीं है.
साल 2021-22 की पहली छमाही की वृद्धि भरोसेमंद रही है लेकिन जब इसकी महामारी के पूर्व के 2019-20 के स्तर से तुलना करें तो पता चलेगा कि अभी बहुत कुछ होना बाकी है. विशेषज्ञ बताते हैं कि महामारी आने से पहले भी जीडीपी घट रही थी और इसमें औसतन 4-5 प्रतिशत की गिरावट थी.
पूर्ण बहाली के लिए भारत को नए मानदंड तय करने होंगे. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इंडिया टुडे टीवी से एक इंटरव्यू में कहा, ''वी आकार की बहाली कोई ऐसी बात नहीं कि इतना शोर किया जाए. बहुत खराब गिरावट पैदा कर दो तो बहाली तो वी आकार की होगी ही. (अहम सवाल) यह है कि क्या हम रुग्णता से बाहर आ गए हैं और क्या हम वृद्धि के अपने प्रचलित स्तर पर वापस आएंगे? हमें 8 या 9 फीसद (की दर) से बढ़ना चाहिए?’’
कई क्षेत्रों का कारोबार दूसरी तिमाही के मध्य तक फिर अपने पैरों पर खड़ा हो गया. कम से कम पिछले साल की इसी अवधि में तहस-नहस कर देने वाले लॉकडाउन के दौरान अपने प्रदर्शन की तुलना में तो हो ही गया है. वहीं इस प्रत्यक्ष बहाली की निरंतरता को लेकर चिंताएं कायम हैं. सार्स-कोव2 वायरस का नवीनतम 'वैरिएंट ऑफ कंसर्न’ ओमिक्रॉन कुछ देशों में तेजी से बढ़ रहा है, वहीं भारत में इसका फैलाव सीमित जरूर है लेकिन इसके फैलाव के बारे में कुछ कह पाना या अनुमान लगा पाना मुश्किल है.
ओमिक्रॉन के बढ़ते मामलों की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए वृद्धि के पूर्वानुमान घटा दिए गए हैं, जबकि सरकारें इस पर काबू पाने के नए उपाय लागू कर रही हैं या सीमाओं को खोलने और आर्थिक गतिविधियों को फिर शुरू करने की अपनी योजनाओं को फिलहाल टाल रही हैं. भारत में नियमित अंतरराष्ट्रीय उड़ानें फिर शुरू होने में देरी के चलते ट्रैवल और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र पर फिर आशंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं.
शेयर बाजार भारी उतार-चढ़ावों से दोचार है और निवेशक चौकन्ने हो गए हैं, जबकि वैज्ञानिक यह थाह लेने में जुटे हैं कि ओमिक्रॉन वैरिएंट कितना संक्रामक और गंभीर है. सबसे अव्वल बचाव अब भी टीके लगाना ही है. कइयों की आस केंद्र के इस दावे पर टिकी है कि करीब आधे देश को पूरी तरह टीके लगाए जा चुके हैं और इस पर भी कि राज्य सरकारें टीके लगाने की रफ्तार बढ़ाने पर जोर दे रही हैं.
दुनिया भर में तबाही मचाने वाली कोविड-19 की दो बड़ी लहरों के कई सबक भी सीख लिए गए हैं और उम्मीद की जा रही है कि सरकारों और व्यवसायों ने जोखिमों से निपटने के बेहतर तरीके खोज लिए हैं. अलबत्ता एमएसएमई (सूक्ष्म, छोटे और मध्यम उद्यम) के छोटे कारोबारों को बदतरीन मार सहनी पड़ी है, जिससे कई तो अब तक नहीं उबर पाए हैं और दूसरे कामकाजी पूंजी के अभाव, कच्चे माल और ढुलाई की बढ़ती लागतों और/या खराब मांग के चलते अब भी छटपटा रहे हैं.
भारत की बहाली के पीछे कौन-से कारक हैं और किन क्षेत्रों को ज्यादा बड़े प्रोत्साहन की जरूरत है? क्रमिक तुलना (इस वित्त वर्ष की पहली और दूसरी तिमाही के बीच) से पता चलता है कि पहली तिमाही के मुकाबले दूसरी तिमाही में निजी खपत या उपभोग और निवेश दोनों करीब 12 फीसद बढ़े. मैन्यूफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन में भी धीरे-धीरे सुधार आ रहा है और पिछली तिमाही के मुकाबले ये दोनों 8-9 फीसद ज्यादा हैं.
निर्यात में भी तेज बढ़ोतरी हुई, जो दूसरी तिमाही में 100 अरब डॉलर (7.6 लाख करोड़ रुपए) के स्तर के पार चला गया. 2019-20 की दूसरी तिमाही (महामारी से पहले की अवधि) के मुकाबले 2021-22 की दूसरी तिमाही के जीडीपी के पूर्ण आंकड़ों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि जीडीपी में मामूली बढ़ोतरी हुई है और यह 35.61 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 35.73 लाख करोड़ रुपए हो गया है.
एक क्षेत्र जो अच्छा प्रदर्शन करता मालूम देता है, वह है विशुद्ध निवेश (आर्थिक बोलचाल में सकल स्थिर पूंजी निर्माण, जो नई मशीनरी और उपकरणों में निवेश दर्शाता है). यह 2019-20 की दूसरी तिमाही के 11.26 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2021-22 की दूसरी तिमाही में 11.43 लाख करोड़ रुपए हो गया. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि बढ़त का यह रुझान अच्छा संकेत है और कारोबारी उम्मीदों में सुधार दर्शाता है.
अलबत्ता सरकारी खर्च इसी अवधि में 4.34 लाख करोड़ रुपए से घटकर 3.61 लाख करोड़ रुपए पर आ गया. उलझन में डालने वाली बात यह है कि जहां सरकार ने सुधारवादी कदम उठाए और बुनियादी ढांचे तथा रक्षा के लिए खर्च करने पर खासा जोर दिया, वहीं कुल खर्चों में कटौती की है. एक संभावित कारण यह हो सकता है कि महामारी के साल में राजस्व में कमी की भरपाई करने और सरकार की वित्तीय हालत पर दबाव आने देने से बचने के लिए उसने ऐसा किया हो.
सरकार ने कोविड के खिलाफ लड़ाई में मुख्य भूमिका अदा नहीं करने वाले मंत्रालयों के खर्च की ऊपरी सीमा का भी ऐलान किया, ताकि आर्थिक पिरामिड के सबसे निचले हिस्से के लोगों के वास्ते बेहद अहम सब्सिडी के लिए धन दिया जा सके. सरकार ने 30 जून 2021 को खर्च कटौती के उपायों का भी ऐलान किया और 2021-22 की दूसरी तिमाही में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों पर अपने सालाना बजट आवंटन का 20 फीसद तक खर्च करने की सीमा आयद कर दी.
निवेश के अलावा अन्य आर्थिक चालक थे कृषि और बिजली उत्पादन, लोक प्रशासन और रक्षा सेवाएं. 2019-20 की दूसरी तिमाही के मुकाबले कृषि, वानिकी और मछलीपालन 7.7 फीसद बढ़े जबकि बिजली, गैस और जल आपूर्ति 11.4 फीसद बढ़े. मैन्यूफैक्चरिंग 3.9 फीसद बढ़ी. उपभोग (निजी अंतिम उपभोग व्यय) अब भी चिंता की बड़ी वजह बना हुआ है.
यह 2019-20 की दूसरी तिमाही के 20.19 लाख करोड़ रुपए के मुकाबले 2021-22 की दूसरी तिमाही में घटकर 19.48 लाख करोड़ रुपए पर आ गया, क्योंकि व्यवसायों ने कामकाज बंद कर दिया, कर्मचारियों की छंटनी या वेतन में कटौती करके किसी तरह काम चलाते रहे.
इससे उपभोक्ताओं के हाथ में कम पैसा बचा. निर्माण, होटल, परिवहन और वित्तीय सेवाओं सरीखे रोजगार पैदा करने वाले बड़े क्षेत्रों की वृद्धि अब भी सुस्त और महामारी से पहले के स्तरों से नीचे है और संपर्क-सघन क्षेत्र अब भी हाथ-पैर मार रहे हैं.
कंसल्टिंग और ऑडिट फर्म ईवाइ इंडिया के चीफ पॉलिसी एडवाइजर डी.के. श्रीवास्तव कहते हैं, ''घरेलू मांग के मामले में, 2021-22 की दूसरी तिमाही के अंत में केवल सकल स्थिर पूंजी निर्माण ही था जो 2019-20 की दूसरी तिमाही के मुकाबले सकारात्मक था.’’
वे कहते हैं कि निवेश में बढ़ोतरी जहां अच्छा संकेत है, खपत छोटे और मध्यम क्षेत्रों की रोजगार और आमदनी वृद्धि के साथ रफ्तार पकड़ेगी. बदले में यह सेवा क्षेत्रों और खासकर व्यापार और होटलों की बहाली से जुड़ा है. वे कहते हैं, ''यह इस वित्त वर्ष के दूसरे आधे हिस्से में हो सकता है, बशर्ते आर्थिक गतिविधियों को ओमिक्रॉन वैरिएंट से फिर झटका न लगे.’’
दबी-सहमी उम्मीदें
खासकर जब पिछला त्योहारी सीजन अच्छा बीता और पिछले साल के मुकाबले निश्चित ही अच्छा बीता, ऐसे में उम्मीद यही थी कि कारोबार उल्लास की भावना से सराबोर होंगे. फिर भी कई कारोबारी अगुआ सतर्क रहने की बात कहते हैं. एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) की बड़ी कंपनी डाबर के सीईओ मोहित मल्होत्रा कहते हैं, ''अगर मैं (बीते) दो सालों की चक्रवृद्धि सालाना वृद्धि दर देखूं, तो बाजार सपाट रहा है.
हम वृद्धि देख रहे हैं पर यह वृद्धि (निचले) आधार पर है.’’ वे कहते हैं कि शहरी इलाकों में ई-कॉमर्स में उछाल के कारण इस क्षेत्र की वृद्धि में सुधार आया है और ग्रामीण इलाकों में कारोबार में लोच दिखी है. इससे कारोबार चलते तो रहे, पर कई मुश्किलें भी हैं. मसलन, दवा, कपड़ा और इंजीनियरिंग सामानों सरीखे निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों में बीते सालों में वृद्धि दिखाई दी, पर तेजी से बढ़ती इनुपट लागतों की वजह से प्रतिस्पर्धा की क्षमता पर असर पड़ा.
वैश्विक बाजारों से मंगवाई जाने वाली चीजों और खासकर कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और कोयले सरीखे ईंधनों के दामों में बढ़ोतरी का प्रतिकूल असर कई उद्योगों पर पड़ा. साथ ही, छोटे और मध्यम कारोबार मांग में कमी, वित्तीय संसाधनों की सुलभता के अभाव और कर्जों से जूझ रहे हैं. महंगाई तो सबके लिए परेशानी की बात है. आरबीआइ के गवर्नर शक्तिकांत दास ने 8 दिसंबर को कहा कि इस वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में खुदरा मंहगाई 5.7 फीसद तक बढ़ जाएगी. अलबत्ता केंद्रीय बैंक ने वृद्धि को सहारा देने की गरज से अपनी हालिया मौद्रिक नीति समीक्षा में मुख्य ब्याज दरों में एक बार फिर बदलाव नहीं किया.
कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी ने भी एमएसएमई की कमर तोड़ दी. इस्पात मिलों ने जून से कीमतें कुल मिलाकर 4,500 रुपए प्रति टन बढ़ाईं. मुंबई में हॉट रोल्ड कॉइल की मानक कीमत अक्तूबर में करीब 68,000 करोड़ रुपए प्रति टन की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई. एल्यूमिनियम के भी दाम जनवरी से लगातार बढ़ रहे हैं.
फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो ऐंड स्मॉल ऐंड मीडियम एंटरप्राइजेज के सेक्रेटरी जनरल अनिल भारद्वाज कहते हैं कि स्टील, एल्यूमिनियम, तांबे और प्लास्टिक जैसे कच्चे माल पर निर्भर क्षेत्र बहुत मुश्किल से गुजर रहे हैं. आयात पर ऊंची कीमतों के अलावा माल लदाई के लिए जहाजों की कमी और ढुलाई की ऊंची लागतों का भी बुरा असर पड़ा है.
अच्छी बात यह है कि आइटी (इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) सरीखे निम्न-संपर्क क्षेत्रों में शानदार तेजी कायम है. इसमें बढ़ते ऑर्डर, वेतन बढ़ोतरी और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी को कुछ लोग एक किस्म का टेक रेनेसां या प्रौद्योगिक पुनर्जागरण कह रहे हैं. ई-कॉमर्स की खास तौर पर बल्ले-बल्ले है. अक्तूबर 2021 तक भारत के यूनिकॉर्न (1 अरब डॉलर या 7,600 करोड़ रुपए अधिक मूल्य के स्टार्ट-अप) में 33 नए जुड़े.
90 देशों में फैले 1,00,000 से ज्यादा कर्मचारियों वाली 5.2 अरब डॉलर (39,000 करोड़ रुपए) की कंपनी टेक महिंद्रा के सीईओ और एमडी सी.पी. गुरनानी कहते हैं, ''हमारे सौदों की पाइपलाइन बीते कुछ वर्षों के मुकाबले इस वक्त सबसे अच्छी है.’’ दूसरी तिमाही में 75 करोड़ डॉलर (7,625 करोड़ रुपए) के सौदों के साथ फर्म की क्रमिक वृद्धि एक दशक के सबसे ऊंचे मुकाम पर है. गुरनानी कहते हैं कि नवाचार और नौकरियों में वृद्धि के चालक के तौर पर आइटी क्षेत्र की वृद्धि को लेकर उन्हें बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं.
भारत को कई वैश्विक फर्मों द्वारा लागू की जा रही 'चाइना प्लस वन’ नीति का फायदा भी मिला है. इस नीति के तहत वे अपने स्रोतों को व्यापक आधार देकर आपूर्ति शृंखला के जोखिम कम कर रही हैं, जिसका फायदा परोक्ष रूप से भारतीय फर्मों को मिला है. फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस के डायरेक्टर जनरल और सीईओ अजय साहनी कहते हैं, ''अप्रैल-मई की अवधि में निर्यात ऑर्डरों में 20-25 फीसद बढ़ोतरी हुई.’’ वे कहते हैं कि इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो, ऑटो कलपुर्जों, चमड़ा और कृषि निर्यातों ने अच्छा प्रदर्शन किया और इस वित्त वर्ष में देश का कुल निर्यात 400 अरब डॉलर (30 लाख करोड़ रु.) पर पहुंच जाने की उम्मीद है.
मांग की गुत्थी
भारत के लिए बड़ी चुनौती घरेलू मांग को बढ़ाना और उसमें तेजी लाना है. मगर बढ़ती महंगाई की वजह से यह काम पेचीदा हो गया है. भारत का डब्ल्यूपीआइ (थोक मूल्य सूचकांक) अक्तूबर के 12.54 फीसद से छलांग लगाकर नवंबर में 14.2 फीसद (साल-दर-साल) पर पहुंच गया. इसकी मुख्य वजह खाने-पीने की चीजों और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी थी.
नवंबर लगातार आठवां महीना था जब थोक महंगाई दहाई अंकों में बनी रही और 12 महीनों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई. फिर भी सरकार चाहेगी कि भारतीय उपभोक्ता खर्च करने के रंग-ढंग में लौट आए, क्योंकि यही अर्थव्यवस्था में मांग का प्रमुख चालक है. बड़ी तस्वीर के स्तर पर जब आमदनी कम और नौकरियां अभी भी बहुत थोड़ी हैं, तो मांग की खातिर खर्च करने पर जोर दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता.
उद्योग के लिए ज्यादा मांग का मतलब है बिक्री से ज्यादा राजस्व मिलना. इनमें से कुछ कारकों को प्रभावित करने के लिए केंद्र और आरबीआइ के हाथ में कुछ साधन हैं पर वैश्विक बाजार में वस्तुओं की कीमतों (जिनसे इनपुट लागत बढ़ रही है) सरीखे कुछ दूसरे कारकों को प्रभावित कर पाना मुश्किल है.
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल में अर्थव्यवस्था में फिर भरोसा जताया. उन्होंने कहा कि कर संग्रह, ई-वे बिल और पीएमआइ (खरीद प्रबंधकों का सूचकांक) सरीखे करीब 20 उच्च-आवृत्ति संकेतक महामारी से पहले के स्तर पर लौट आए हैं या उसके पार निकल गए हैं.
उन्हें यकीन है कि यह रफ्तार आगे भी कायम रहेगी. बिजनेस एनालिटिक्स फर्म डन ऐंड ब्रैडस्ट्रीट में ग्लोबल चीफ इकॉनोमिस्ट अरुण सिंह कहते हैं कि फर्मों में आशावादी माहौल है, जो मौजूदा स्थिति को कोविड-19 की दस्तक से कुछ महीने पहले दिसंबर 2019 में किए गए कारोबारी आशावाद सर्वे से जोड़ता है. वे कहते हैं, ''उस वक्त अर्थव्यवस्था के बढ़ने की उम्मीद थी, पर बदकिस्मती से महामारी आ गई. आज हम फिर दिसंबर 2019 जैसी स्थिति में हैं. कारोबारी माहौल सूचकांक 2014 के बाद अपने सबसे ऊंचे स्तर पर है.’’
अलबत्ता यह आशावाद जमीन पर बड़े निवेशों में नहीं बदला. कुछ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि कॉरपोरेट की ओर से हो रहे खर्च महज कुछ बड़े कारोबारों तक सीमित हैं. औद्योगिक उत्पादन नरम बना हुआ है. अक्तूबर में आइआइपी (औद्योगिक उत्पादन सूचकांक) की वृद्धि साल-दर-साल 3.2 फीसद रही, जो आठ महीनों में इसका सबसे निचला स्तर है.
सेमीकंडक्टरों की कमी की वजह से त्योहारी मौसम में ऑटोमोबाइल उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ. उद्योग की संस्था एसआइएएम या सियाम (सोसायटी फॉर इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्यूफैक्चर्स) के मुताबिक सवारी वाहनों की बिक्री नवंबर में सात साल के सबसे निचले स्तर पर आ गई.
अर्थशास्त्री फिर जोर देकर कहते हैं कि दूसरी तिमाही की प्रत्यक्ष ऊंची जीडीपी वृद्धि दर मोटे तौर पर पिछले साल की निचली आधार रेखा की वजह से है और यह भी कि 2020-21 के संकुचन से उबरना अभी बाकी है. टिकाऊ बहाली के लिए भारत को इस वित्त वर्ष की तीसरी और चौथी तिमाही में मजबूत वृद्धि की जरूरत है. श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘अगर हम इस वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में छह फीसद की वृद्धि हासिल कर सकें तो हमें थोड़े अच्छे ढंग से उभरकर आना चाहिए.’’
दूसरा कारक ओमिक्रॉन है जिसके असर का अभी सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता. अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाले केवल उम्मीद ही कर सकते हैं कि सब अच्छा होगा. अगर खतरा बढ़ता है, तो जिन क्षेत्रों को बीते दो सालों में सबसे ज्यादा नुक्सान हुआ, उन्हीं पर फिर मार पड़ेगी.
तब सरकार को शहरी गरीबों और होटल तथा परिवहन सरीखे सेवा क्षेत्रों पर निर्भर लोगों को सहारा देने की जरूरत होगी. यही वे क्षेत्र हैं जो अभी महामारी से पहले के स्तर से कमतर प्रदर्शन कर रहे हैं. केयर रेटिंग्ज के चीफ इकॉनोमिस्ट मदन सबनवीस कहते हैं, ''अगर कड़े उपाय लागू किए जाते हैं और सेवा क्षेत्रों पर असर पड़ता है तो हम अब तक हासिल प्रगति भी गंवा बैठेंगे.’’
आगे टिकाऊ बहाली इस पर भी निर्भर करेगी कि केंद्र नए प्रोत्साहन उपाय लेकर आता है या बुनियादी ढांचे पर खर्च से वृद्धि को बढ़ावा देता है. हॉस्पिटैलिटी सेक्टर, एसएमई (छोटे और मध्यम उद्योग) और अनौपचारिक क्षेत्र को ध्यान में रखकर प्रोत्साहन लाभों के लिए चीख-पुकार बढ़ रही है. ऐसा पैकेज मनरेगा (महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून) से मिलती-जुलती शहरी रोजगार योजना की शक्ल में हो सकता है.
कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सरकार को खर्च बढ़ाने के लिए राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी से हिचकिचाना नहीं चाहिए. क्रिसिल के चीफ इकॉनोमिस्ट डी.के. जोशी कहते हैं, ''निजी खपत में उछाल के लिए सरकार को (छोटे वक्त में) मनरेगा के विस्तार की जरूरत है.’’ उनका यह भी कहना है कि सरकारी निवेश पर ज्यादा जोर देना चाहिए. वे कहते हैं, ''केंद्रीय स्तर पर सरकारी निवेश की रफ्तार राज्य स्तर के मुकाबले बेहतर है. केंद्र को चाहिए कि वह राज्यों के लिए निवेश करना ज्यादा लाभदायक बनाए या उनके लिए उधार लेना ज्यादा आसान बनाए.’’
मध्यम अवधि में सरकार को नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (एनआइपी), जिसमें उसने 2024-25 तक 111 लाख करोड़ रु. खर्च करने की योजना का ऐलान किया है और 2 लाख करोड़ रुपए की धनराशि से 13 क्षेत्रों को सहारा देने वाली उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजनाओं पर जोर देने की जरूरत है. जोशी कहते हैं कि एनआइपी का 50-60 फीसद लक्ष्य भी हासिल करने का बहुत असर पड़ेगा.
साथ ही, पीएलआइ प्रोत्साहन लाभों को जल्द से जल्द बांटने की जरूरत है. सरकार को जिस एक और सेक्टर पर ध्यान देना चाहिए, वह है विनिवेश. टाटा ग्रुप को एयर इंडिया की बिक्री बड़ी राहत की बात है, पर यह विनिवेश योजनाओं का महज एक हिस्सा है. केंद्र ने 2021-22 के लिए विनिवेश, निजीकरण और संपत्ति मौद्रिकीकरण से 1.75 लाख करोड़ रुपए उगाहने का लक्ष्य रखा है, पर प्रगति धीमी ही रही है.
विशेषज्ञ सूक्ष्म स्तर पर टिकाऊ बहाली को आमदनी और रोजगार में बढ़ोतरी से जोड़कर देखते हैं. सबनवीस कहते हैं, ''एक बार आप खपत करने लगते हैं, तो निवेश भी ज्यादा होगा और अच्छा चक्र फिर शुरू हो जाएगा.’’ प्रोत्साहन उपायों को लेकर वे आशावादी नहीं हैं: ''भारत का जीडीपी 220 लाख करोड़ रुपए है. 1-2 लाख करोड़ रुपए के प्रोत्साहन लाभों से बहुत ज्यादा मदद नहीं मिलेगी और राजकोषीय घाटे पर दबाव ही आएगा. जरूरत हमें निजी निवेश की है.’’
भारत की आर्थिक बहाली के आकार को अंग्रेजी वर्णमाला का कौन-सा अक्षर—वी या के या डब्ल्यू—सबसे अच्छे ढंग से बयान करता है, इस बारे में चर्चाएं थोड़ा ध्यान भटकाने वाली हैं, जैसा कि आरबीआइ के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी कहते हैं. पते की बात यह है कि अर्थव्यवस्था यहां से आगे सही दिशा में आगे बढ़ना समय पर नीतिगत हस्तक्षेपों और कुछ बड़े खर्च करने पर निर्भर करेगा. इसमें सरकार को अगुआई करनी होगी. वह अपनी कोशिशें मुश्किल सेक्टरों पर एकाग्र करे, यह आने वाली तिमाहियों में ज्यादा टिकाऊ वृद्धि के लिए बेहद अहम होगा.
निर्मला सीतारमण
केंद्रीय वित्त मंत्री
हम मजबूत आर्थिक वृद्धि देख रहे हैं और इसे बरकरार रखने के तरीके खोज रहे हैं तथा इसे दहाई की ग्रोथ तक ले जाना चाहते हैं
रघुराम राजन, पूर्व गवर्नर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया
अहम सवाल यह है कि न्न्या हम रुग्णता से बाहर आ गए हैं और क्या हम वृद्धि के अपने प्रचलित स्तर पर वापस आएंगे?
सी.पी. गुरनानी, सीईओ और एमडी टेक महिंद्रा
हमारे सौदों की पाइपलाइन बीते कुछ वर्षों के मुकाबले इस वक्त सबसे अच्छी है
मोहित मल्होत्रा, सीईओ, डाबर इंडिया
अगर मैं बीते दो सालों की चक्रवृद्धि सालाना वृद्धि दर देखूं तो बाजार सपाट रहा है. हम ग्रोथ तो देख रहे हैं लेकिन यह निचले आधार (लो बेस) पर है
रफ्तार को कैसे बरकरार रखा जाए
पर्यटन, हॉस्पिटेलिटी और रिटेल जैसे सबसे कमजोर क्षेत्रों की मदद के लिए सरकार को बारीक और नपा-तुला नजरिया अपनाना चाहिए
कर्ज तक पहुंच के अभाव में उत्पादन का वचन निभाने में मुश्किल का सामना कर रहे एमएसएमई के लिए सरकार को लक्षित सहयोग का रास्ता अपनाना चाहिए
शहरी गरीबों को मदद चाहिए-इससे मांग में तेजी आ सकती है और ये निजी क्षेत्र से निवेश आने का सबब बन सकता है
केंद्र को विनिवेश का अपना एजेंडा आगे बढ़ाना चाहिए जिससे बहुत जरूरी पूंजी हासिल होगी
सरकार को नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन जिसमें उसने 2024-25 तक 111 लाख करोड़ रु. के निवेश की योजना बनाई है और इसकी 2 लाख करोड़ रु. से 13 क्षेत्रों को सहारा देने वाली प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम पर ध्यान देना चाहिए
कुछ अर्थशास्त्री कहते है कि सरकार को खर्च बढ़ाने के लिए राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी से हिचकिचाना नहीं चाहिए.
